मुंबई। बॉलीवुड ट्रेंड अपराध की दुनिया गढऩा आसान नहीं अंडरवर्ल्ड की कहानियों में एक्शन, रोमांच और इमोशन सभी कुछ है। यही वजह है कि इन्हें अपने अंदाज में कहने में फिल्मकारों की रुचि रही है। हालांकि माफिया की दुनिया व ऐसी कहानियों को रचना आसान नहीं, पर यही चुनौती तो इन्हें खास बनाती है। आने वाले दिनों में अंडरवर्ल्ड पर 'मुंबई सागा', 'गंगूबाई काठियावाड़ी' और 'डी कंपनी' सहित कई फिल्में आएंगी। अंडरवर्ल्ड के राज खोलती फिल्मों के प्रति फिल्मकारों व दर्शकों के आकर्षण की पड़ताल कर रही हैं स्मिता श्रीवास्तव व प्रियंका सिंह...

फिल्ममेकर राम गोपाल वर्मा की साल 1998 में आई फिल्म 'सत्या' से पहले मुंबई के अंडरवर्ल्ड को इतने विश्वसनीय तरीके से शायद सिल्वर स्क्रीन पर नहीं उतारा गया था। 'सत्या' की सफलता से अंडरवर्ल्ड पर फिल्म बनाने के चलन ने जोर पकड़ा। इनमें न केवल अंडरवर्ल्ड की खौफनाक दुनिया की सच्चाई को दर्शाया गया, बल्कि कानून व्यवस्था की मिलीभगत से होते काले धंधे, ईमानदार पुलिसकर्मियों की कठिनाइयों और आम आदमी की विवशता का भी चित्रण किया गया।

 

 

 

 

 

 

 

 

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अंडरवर्ल्ड और गैंगस्टर की दुनिया के इर्दगिर्द बनीं 'गॉड मदर', 'वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई', 'सरकार', 'वास्तव', 'शूटआउट एट लोखंडवाला', 'शूटआउट एट वडाला' समेत कई हिट फिल्में बनीं हैं। गैंगस्टर अरुण गवली की जिंदगी पर 'डैडी', दाऊद इब्राहिम की बहन हसीना पारकर पर 'हसीना' जैसी बायोपिक भी बनीं। आने वाले दिनों में अंडरवर्ल्ड पर 'मुंबई सागा', 'गंगूबाई काठियावाड़ी', 'डी कंपनी' सहित कई फिल्में आ रही हैं। सभी का पसंदीदा जॉनर: एस हुसैन जैदी की किताबों पर 'ब्लैक फ्राइडे', 'शूटआउट एट वडाला', 'क्लास ऑफ 83' जैसी फिल्में बन चुकी हैं। अब उनकी किताब माफिया क्वींस ऑफ मुंबई पर 'गंगूबाई काठियावाड़ी' आ रही है। हुसैन जैदी ने कहा था कि क्राइम की कहानियों में 16 साल से 60 साल के लोगों की दिलचस्पी होती है। अन्य जॉनर की कहानियों को एक्सपोजर मिल सकता है, लेकिन अपराध का विषय हर जगह सभी का पसंदीदा रहेगा। 

अंडरवर्ल्ड पर फिल्म बनाने के चलन पर फिल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे कहते हैं, 'सबसे पहले अमेरिका ने इसपर फिल्में बनाना शुरू किया था। हमारे फिल्मकारों ने उनकी कॉपी करने की कोशिश की। फिरोज खान ने 'धर्मात्मा' बनाई जो हॉलीवुड फिल्म 'गॉड फादर' का देसी संस्करण थी। अंडरवर्ल्ड की पहुंच राजनीति तक है। 'गॉड फादर' में अपराध जगत से जुड़े लोगों की पत्नियों या प्रेमिकाओं के किरदार भी बहुत मायने रखते हैं। 'गॉॅॅड फादर' के तीसरे पार्ट में नायक की पत्नी गर्भपात कराने जा रही होती है। वह उसकी वजह पूछता है तो वह कहती हैं क्या फायदा बड़ा होकर यह भी क्रिमिनल बनेगा। यह फांसी चढ़े उससे पहले मैं ही इसे मार देती हूं। वहां से उसमें बहुत बदलाव आता है। इस प्रकार की कहानियों में हिंसा होता है। दोनों ही बिकता है।'  

मनोविज्ञान को समझने व समझाने की कोशिश:  

अंडरवर्ल्ड पर 'सत्या', 'कंपनी', 'अब तक छप्पन' जैसी फिल्में बना चुके राम गोपाल वर्मा का कहना है कि अंडरवर्ल्ड किसी भी कहानी का बैकड्रॉप हो सकता है। मैं यह नहीं जानता हूं कि अंडरवर्ल्ड फिल्में क्या होती हैं। 'कंपनी' की कहानी को मैं कारपोरेट बैकग्राउंड में भी बना सकता हूं। अंडरवर्ल्ड का जब मैं बैकड्रॉप फिल्म में लेता हूं तो वह कहानी ज्यादा शार्प और हार्ड हिंटिंग बन जाती है। 'सत्या', 'सरकार' की बात करें तो जिन कहानियों ने मुझे उस वक्त पर एक्साइट किया, मैंने उन्हें बनाया। जब मैं साल 1995 में मुंबई आया था, तब मैं इस शहर से बेहद आकर्षित था। यहां झुग्गियां, बड़ी बिल्डिंग्स अमीरी-गरीबी के साथ ही बहुत कुछ बयां कर रही थी। उसी वक्तअपराध की समांतर दुनिया मुंबई में चल रही थी।

मैं अखबारों में उसके बारे में पढ़ता था। जब गुलशन कुमार को मारा गया था, मेरे लिये वह शॉकिंग था। शहर में डर का माहौल था। मैं निर्माता चंद्रसुधन के ऑफिस में बैठा था। उनके बारे में बात हो रही थी, मेरे मन में ख्याल आया कि गुलशन जी सुबह उठकर मंदिर गए थे। वो किलर कितने बजे उठा होगा, उसकी क्या तैयारी होगी। वह भी इंसान था, लेकिन उसका दिमाग अलग था, वह लाइफ उसने अपने लिए चुनी थी। मैं वे चीजें कैप्चर करना चाहता था 'सत्या' फिल्म में। ऐसे लोग जिनके बारे में हमने सिर्फ सुना है। वे किसी को मारते हैं या मरते हैं, पर निजी जिंदगी में वे क्या करते हैं। वह चीज मुझे 'सत्या' में दिखानी थी। हनीफ लकड़ावाला से मिला तो वह दाऊद को शुरुआती दौर में जानता था। उससे बात करने के बाद 'कंपनी' बनाने का विचार आया था।'

 

 

 

 

 

 

 

 

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हमारे बीच से ही निकलती हैं कहानियां:  

'वास्तव' फिल्म के निर्देशक महेश मांजरेकर का कहना हैं, 'मैं कंटेंट कहीं से भी चुन सकता हूं। अखबार की कोई खबर मुझे कहानी कहने के लिए प्रेरित कर सकती है। मैंने जब 'वास्तव' बनाई थी, वह एक गुस्सा ही था। मुंबई की मिल्स बंद हो गई थीं, मिल मजदूर रास्ते पर आ गए थे। तीन लाख लोग रोड पर आ गए थे। आज मिल की जगह पर मॉल्स खड़े हैं। मिल वर्कर्स और उनके परिवार वालों का क्या हुआ, वे किस रास्ते पर बढ़ गए। वह दिखाने की कोशिश मैंने 'वास्तव' में की थी। वह पैदाइशी गैंगस्टर नहीं था। हालात ने उसे वैसा बनाया था। ये कहानियां हमारे बीच से ही निकलती हैं।'  

असलियत से जोडऩा कठिन:  

'डी डे' के सहलेखक रितेश शाह कहते हैं, 'अंडरवर्ल्ड की कहानी मूल रूप से मुंबई में ही केंद्रित होती हैं। बाद में उसका कनेक्शन देश और आंतकवाद से भी डेवलप हुआ। इस वजह से उसे वृहद तरीके से हमें लिखने का मौका मिला। यह भी चैलेंज रहता है कि किरदारों का ग्लोरीफिकेशन न हो। अनावश्यक रूप से किरदारों को खूंखार नहीं दिखाया जा सकता है। वे मोगैंबो या शाकाल नहीं हो सकते हैं। 'परिंदा' और सत्या में किरदार रियल लगते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

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मनोरंजन के सारे मसाले:  

अंडरवर्ल्ड का दबदबा पिछली सदी के आठवें और नौवें दशक में ज्यादा रहा है। आज के दर्शकों के लिए अंडरवर्ल्ड की कहानियां कितनी प्रासंगिक होंगी, इसे लेकर 'शूटआउट एट लोखंडवाला' और 'मुंबई सागा' के अभिनेता रोहित रॉय कहते हैं कि आज के किशोर व युवा दर्शकों ने अंडरवर्ल्ड के दौर को इतना करीब से महसूस नहीं किया है, जितना हमने करीब से देखा है और महसूस किया है। जब उन्हें सच्ची घटनाओं पर फिल्में दिखाई जाएंगी तो उनके लिए वह प्रभावशाली है। सिंगल स्क्रीन में जाने वाले दर्शकों के लिए इस विषय की फिल्में एक ट्रीट की तरह होंगी, क्योंकि इनमें मनोरंजन के सारे मसाले होते हैं। मैंने दो फिल्मों में गैंगस्टर का किरदार निभाया है। वे अलग किस्म के होते हैं। वे आपसे तहजीब से बात करेंगे, पर उनके बोलने के टोन से डर लगेगा।'

 

 

 

 

 

 

 

 

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चुनौतियां भी कम नहीं: 

अंडरवर्ल्ड पर लगातार फिल्में बन रही हैं। इन फिल्मों की चुनौतियों के संबंध में 'मुंबई सागा' के लेखक और निर्देशक संजय गुप्ता कहते हैं कि काम अगर चैलेंजिंग नहीं होगा तो उसमें मजा नहीं आएगा। अंडरवर्ल्ड की कहानी को नए तरीके से कहना पड़ता है। किरदारों को अलग तरीके से गढऩा पड़ता है। 'मुंबई सागा' की कहानी अंडरवर्ल्ड के साथ बांबे से मुंबई शहर कैसे बना, क्यों बना, किसने बनाया? इसके इर्दगिर्द है। यह सत्य घटना से प्रेरित है, लेकिन किरदार काल्पनिक हैं। उस दौर को क्रिएट करना मुश्किल होता है। आज मुंबई शहर पूरी तरह से बदल चुका है। पिछली सदी के आठवें दशक को दिखाना है तो छोटी-छोटी चीजों का ध्यान रखना पड़ता है। समकालीन फिल्मों की तुलना में इनकी शूटिंग ज्यादा कठिन होती है। 

बॉक्स अंडरवर्ल्ड की बानगी गुजरात के गैंगस्टर अब्दुल लतीफ की जिंदगी पर राहुल ढोलकिया निर्देशित फिल्म 'रईस' में शाहरुख खान ने शराब माफिया मुख्य किरदार निभाया था। अब्दुल लतीफ का दबदबा पूरे गुजरात में था। मिलन लूथरिया निर्देशित फिल्म 'वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई' हाजी मस्तान के जीवन पर आधारित थी। इसमें अजय देवगन और कंगना रनोट प्रमुख भूमिका में थे। इस फिल्म ने अंडरवर्ल्ड की काली दुनिया पर राज करने वाले डॉन की अच्छाई और उसूलों को दर्शाया था।

'शूटआउट एट वडाला' देश के पहले दर्ज एनकाउंटर पर आधारित थी। मुंबई पुलिस ने सबसे पहला एनकाउंटर मान्या सुर्वे का डॉं अंबेडकर कॉलेज, वडाला में जनवरी 11, 1982 को किया था। निर्देशक विनय शुक्ला की फिल्म 'गॉड मदर' लेडी डॉन संतोकबेन जडेजा की असल जिंदगी पर आधारित थी। फिल्म में शबाना आजमी के अभिनय  की काफी प्रशंसा हुई। साथ ही इस फिल्म ने छह नेशनल अवॉर्ड भी जीते। 

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