प्रियंका सिंह, मुंबई। टीवी, सिनेमा और डिजिटल प्लेटफार्म पर सक्रिय कलाकारों में अभिनेत्री अनन्या खरे का नाम भी शुमार है। देवदास, चांदनी बार जैसी फिल्मों में अभिनय कर चुकीं अनन्या ने पुर्नविवाह, रंग रसिया जैसे कई शो में भी काम किया है। अब वह स्टार भारत के नए शो लक्ष्मी घर आई में सास की भूमिका निभा रही हैं... प्रियंका सिंह

आप शो में एक सख्त सास का किरदार निभा रही हैं, जो दहेज लेने में यकीन रखती है। वास्तविक जीवन में आप दहेज के खिलाफ हैं, ऐसे में किरदार निभाना कितना मुश्किल होता है?

हर किरदार चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन चुनौती तब और बढ़ जाती है, जब आप लगातार एक ही तरह के किरदार निभाते हैं। मैं कई निगेटिव किरदार कर चुकी हूं। निगेटिव किरदारों में अंतर रखने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। इस शो में मेरे किरदार में कई शेड्स हैं। कई जगह वह निगेटिव है, कई जगह मजाकिया। आज भी हर किरदार को निभाते वक्त मैं नर्वस होती हूं। हर किरदार की दुनिया अलग होती है। किरदार के पीछे के इंसान के जीवन को दर्शाना जटिल काम होता है।

दहेज जैसी कुप्रथा को पूरी तरह से खत्म करने के लिए आपके मुताबिक क्या कदम उठाए जाने जरूरी हैं?

यह एक लंबी लड़ाई है। जिस तरह की सास शो में दिखाई गई है, ऐसी सास वास्तविक जीवन में भी होती हैं। माता-पिता जब अपनी बेटी की शादी की तैयारियां करते हैं तो उनके जेहन में यही चलता रहता है कि बेटी को क्या-क्या देना है। वह अपनी बेटी के लिए सारी जिंदगी की जमा पूंजी लगा देते हैं। वे यह शायद दहेज की दिशा में सोचकर न कर रहे हों, लेकिन वह कई बार दहेज की शक्ल ले लेती है। बदलाव के लिए जरूरी है कि लड़के के माता-पिता दहेज की मांग न करें। बेटे को पढ़ा-लिखा दिया, इसका मतलब यह नहीं कि उसकी वसूली लड़की वालों से करेंगे। जब तक लड़की और लड़के की परवरिश का तरीका, माता-पिता और समाज के सोचने का नजरिया नहीं बदलेगा, तब तक बदलाव आसान नहीं है।

आपकी परवरिश कैसे माहौल में हुई है?

मेरे माता-पिता आजाद ख्याल के रहे हैं। पढ़े-लिखे थे, उनकी सोच जमाने से आगे की थी। उन्होंने खुद ही तय किया था कि एक-दूसरे से शादी करनी है। दोनों में प्रेम था तो दहेज का सवाल ही नहीं उठता था। मेरी परवरिश भी आजाद खयालों के बीच हुई है। शादी करनी है या नहीं करनी है, यह निर्णय भी हम पर छोड़ दिया गया था।

शो में आपका किरदार प्रयागराज से ताल्लुक रखता है। उत्तर प्रदेश की संस्कृति में ढलने के लिए क्या कुछ करना पड़ा?

मैंने अपने करियर की शुरुआत 13-14 साल की उम्र में थिएटर से की थी। मैंने जिनके साथ थिएटर किया वह बहुत गुणी थे। मैं उनसे सीख सकती थी कि नहीं, यह नहीं पता, लेकिन उन्होंने मुझे जरूर सिखाया। हर किसी की अपने काम को करने की एक प्रक्रिया होती है। लोग जब खाना पकाते हैं तो वे भी अपने ढंग से पकाते हैं। हर किसी की रेसिपी एक जैसी नहीं होती है। किरदार को करते वक्त भी सबकी अपनी रेसिपी बन जाती है। अनुभवों के आधार पर उसमें हम चीजें घटाते-बढ़ाते रहते हैं। एक्टिंग कई चीजों का मिश्रण होती है। आपके पास वक्त कितना है, स्क्रिप्ट में क्या लिखा है, आपको कैसे निभाना है, आपके खुद के अनुभव क्या हैं...।

आप सशक्त महिला हैं। क्या आपके इस व्यक्तित्व का असर मिलने वाले किरदार पर हुआ है?

हां, ऐसा हुआ है, जैसे हम दिखते हैं, उसी के मुताबिक किरदार भी आफर होते हैं। मेरे साथ अच्छी बात यह रही कि मुझे पाजिटिव और निगेटिव दोनों ही तरह के किरदार आफर होते रहे हैं। करियर के शुरुआती दौर में पत्नी, मां के किरदार आफर होते थे। फिर मैंने अपनी परफार्मेंस में बदलाव किया। पहले ज्यादातर अभिनेत्रियां निगेटिव किरदार करने से मना कर देती थीं, लेकिन जब मुझे निगेटिव रोल आफर हुए तो मैंने उन्हेंं अपनाया। यह मेरी अपनी पसंद थी।

फिल्म देवदास के बाद आपको निगेटिव रोल काफी आफर होने लगे थे?

दरअसल, टीवी पर आपको महिलाओं के कई रूप नजर आते हैं, लेकिन फिल्मों में ऐसा कम ही होता है। जहां तक बात देवदास फिल्म की है तो कम ही लोगों को पता है कि पहले मुझे इस किरदार के लिए रिजेक्ट कर दिया गया था। मैं जब संजय लीला भंसाली से मिली तो उन्होंने कहा कि जिस उम्र की महिला इस किरदार के लिए चाहिए आप उससे छोटी लगती हैं। आपका चेहरा भी मासूम है। हमें थोड़ी सख्त दिखने वाली अभिनेत्री की तलाश है। फिर पता नहीं क्या हुआ, उन्होंने मेरा गेटअप बदलने के लिए कहा। बड़ी बिंदी, साड़ी पहनने और मेकअप करने के बाद उन्होंने मुझे देखकर कहा कि आप जैसी हैं, उससे बिल्कुल उलट व्यवहार कैमरे के सामने करें। इसके बाद मैं आडिशन में पास हो गई।

टीवी, फिल्म और डिजिटल प्लेटफार्म पर आप काम कर रही हैं। इसे लक मानती हैं या इसके पीछे मेहनत है?

यह दोनों चीजों का मिश्रण है। किस्मत और आपके अपने निर्णय कलाकार को एक मुकाम तक पहुंचाते हैं। काम तो काम होता है। अगर कोई काम इज्जत से करने का मौका मिल रहा है तो मना करने का तुक नहीं बनता है। ईमानदारी के साथ काम करना ज्यादा जरूरी है।

आज की पीढ़ी से अपने अनुभवों को साझा करती हैं?

आज की पीढ़ी को हम वही बता सकते हैं, जो वे खुद से सीखना चाहते हैं। अगर कोई पूछता है तो मैं जरूर अपने अनुभव बांटती हूं। आजकल तो चैनल की तरफ से हर चीज इतनी स्पष्ट लिखकर आती है कि अगर कलाकार उसका एक चौथाई भी निभा लें तो उतना ही काफी है। मैं अपने से बेहतर कलाकारों को देखकर सीखती आई हूं। जीवन में सीखेंगे नहीं, तब तक आगे नहीं बढ़ेंगे।

Edited By: Priti Kushwaha