प्रियंका सिंह । फिल्में और वेब सीरीज करने के साथ ही मनोज बाजपेयी एंकरिंग के लिए भी वक्त निकाल लेते हैं। हाल ही में मनोज डिस्कवरी प्लस के शो सीक्रेट्स ऑफ सिनौली : डिस्कवरी ऑफ द सेंचुरी के प्रस्तोता बने। उनकी फिल्मों की पसंद, फिटनेस, बॉक्स ऑफिस के बदलते समीकरण को लेकर उनसे हुई बातचीत के अंश।

डॉक्यूमेंट्री के लिए वक्त निकालना कैसे हो पाया?

जब भी नीरज पांडे की तरफ से मुझे फोन आता है, तो मैं मना नहीं करता हूं। 10-11 साल पहले जब मेरे करियर में ढलान आया था, जब लोग मुझे काम देने से कतरा रहे थे, तब नीरज ने काम दिया था। मैं निर्देशकों को काम मांगने के लिए फोन किया करता था। अ वेडनेसडे! फिल्म देखने के बाद मैंने नीरज को फोन किया था। जिस उत्साह से उन्होंने मुझसे बात की, उसके बाद जो संबंध बना, वह आज तक कायम है। मैं नीरज के निर्देशन का बहुत बड़ा प्रशंसक हूं। मेनस्ट्रीम सिनेमा में जिस तरह के प्रतिभा की जरुरत है, वह उसमें सर्वोपरि हैं। साथ ही सिनौली के बारे में जो पढ़ा था, उसने चौंकाया था। मैं जानना चाहता था कि सिनौली की खुदाई में क्या मिला, इतिहासकार इसके बारे में क्या राय रखते हैं।

एंकरिंग का काम अभिनय से कितना अलग हो जाता है?

एंकरिंग में दो चीजों का ख्य़ाल रखना पड़ता है। एक तथ्य सही तरह से लोगों के सामने रखना। दूसरा आपकी खुद की तैयारी पूरी होनी चाहिए, क्योंकि आपके जरिए वह जानकारी दर्शक तक पहुंचेगी। उन तथ्यों को रोचक तरीके से पेश करना एंकर का काम है, ताकि लोग बोर न हो।   

आप कहते आए हैं कि बॉक्स ऑफिस से संबंध बनाने की बजाय कलाकार को लोगों से संबंध बनाना चाहिए। बॉक्स ऑफिस की सफलता पहले कलाकारों को आगे फिल्में पाने में मदद करती थी। लेकिन क्या वह नजरिया अब बदला है?

हां, वह नजरिया मेरे लिए बदला है। कुछ बुरे दौर को अगर छोड़ दे तो मुझे लगातार काम मिलता रहा है। अपने विचारों के साथ मेहनत करते रहने के बाद,मैं अपनी शर्तों पर काम करता रहा हूं। अच्छी बात यह है कि लोग उस पर विश्वास करते आए हैं।मेरे काम की सराहना करते हैं और काम भी देते हैं।

कभी ख्याल नहीं आता कि अगर कोई गॉड फादर होता तो इस मुकाम तक पहुंचना आसान होता?

जो जीवन मैंने देखा है और जिस यात्रा का मैं हिस्सा रहा हूं वह अनोखा रहा है। कभी यह ख्याल नहीं आया कि काश मेरा कोई गॉड फादर होता। जब मैं संघर्ष कर रहा था, तब जरूर मन करता था कि कोई उंगली पकड़कर जल्द से जल्द आगे पहुंचा दे। अब जब इस मोड़  कापर पहुंचा हूं, तो लगता है कि बड़ा रोचक और कमाल सफर रहा है। हजारों लोगों से संबंध बने। सबने मुझ पर विश्वास दिखाया। हाथ पकड़कर यहां तक लेकर आए हैं। हर पल इतना कुछ सीखा है, उन अनुभवों को अभिनय में डालता हूं।

आपने कहा था कि आप सम्राट अशोक का किरदार निभाना चाहते हैं, इससे पहले की उम्र निकल जाए। क्या कभी उम्र किसी किरदार के आड़े आई है?

उम्र जैसे-जैसे बढ़ती है, उसके लिए कई त्याग करने पड़ते हैं। उस त्याग का फल यह है कि अभी भी तंदुरुस्त लगता हूं। यह एक कलाकार की जीवनशैली होती है, जिसे हम छोड़ते नहीं हैं। सुबह साढ़े चार बजे उठना, पौष्टिक खाना, वर्जिश करना अच्छा लगता है। यह सब चीजें जीवन का हिस्सा बन गई हैं। लेकिन उसके साथ यह भी जरूरी है कि जो किरदार हम करना चाहते हैं, वह हमें सही समय पर मिले, क्योंकि किस उम्र में हम सम्राट अशोक की कहानी कहेंगे, उस पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है। उनकी जीवन यात्रा बहुत ही नाटकीय, उतार-चढ़ाव से गुजरी है। मुझे उनके जीवन सफर ने काफी आकर्षित किया है।

जीवन से जुड़े किरदारों के बीच कभी लार्जर दैन लाइफ वाले किरदार करने का मन करता है?

वह काम कुछ कलाकार बहुत अच्छा कर लेते हैं। शायद मेरे भीतर वह काबिलियत नहीं है। कई फिल्म बन रही हैं, जो इस पैटर्न पर काम कर रही हैं। दर्शक भी उन्हें पसंद करते हैं, तभी हिट होती हैं। लेकिन मैं उसे और यथार्थ की तरफ ले जाकर जीवंत करना चाहूंगा।

आप छोटे बजट की फिल्में भी करते हैं। अपनी फीस के मुताबिक इन फिल्मों में कैसे काम कर पाते हैं? उन फिल्मों के निर्माता आपको कैसे अफोर्ड कर पाते हैं?

मैं जब ऐसी फिल्में करता हूं तो यह सोचकर करता हूं कि कई कारणों से उसे थिएटर में कम जगह मिलेगी। उस हिसाब से ही मेरा मेहताना भी तय होता है। चूंकि मेरा मानना है कि सिनेमा मनोरंजन से पहले एक कला है, तो मैं उस कला के साथ जुड़ना चाहता हूं, उस कला के साथ न्याय करना चाहता हूं। कलाकार होने के नाते यह मेरा धर्म है कि मैं अपना योगदान इस माध्यम में दूं। इसमें योगदान हम इस तरीके की इंडिपेंडेंट फिल्में करके ही दे सकते हैं। यह मेरा धर्म है कि मैं नए प्रतिभाशाली निर्देशकों को अपना सहारा दूं, ताकि वह आगे बढ़ें। यह जरूरी नहीं है कि यह हर कोई समझे। मैं चाहता हूं कि मैं अपनी स्थिति को इस काम में लेकर आऊं कि बहुत सारे लोग मेरे जरिए आगे बढ़ें और मैं उनका हाथ थाम कर चलूं। मुझे यह मौका नहीं मिला था। ओटीटी के मनोरंजन जगत में एतिहासिक बदलाव आया है। अब सिनेमा और कला किसी बॉक्स ऑफिस, डिस्ट्रीब्यूटर का मोहताज नहीं है। भोसले फिल्म जब ओटीटी पर आई और उसे जिस तरह से लोगों का प्यार मिला, उससे यह धारणा हटी की इंडिपेंडेंट फिल्मों को दर्शक नहीं मिलते। इन फिल्मों को भले ही थिएटर में जगह न मिले, लेकिन दर्शक ऐसी फिल्में देखना चाहते हैं। इस फिल्म के लिए मिले पुरस्कार को मैंने सिर झुकाकर स्वीकार किया है। साथ ही इस निर्णय को बरकरार रखा है कि आगे भी ऐसे काम करता रहूंगा, ताकि लोगों का मनोरंजन करके सिनेमा को कला के रूप में पेश कर सकूं। 

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