मुंबई ब्यूरो, स्मिता श्रीवास्तव। देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मनाने के साथ ही 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में विजय की 50वीं वर्षगांठ मना रहा है। वीरता का पर्याय माने जाने वाले फील्ड मार्शल सैम मानेकशा को उस युद्ध का मुख्य नायक माना जाता है। उनकी शौर्यगाथा को सिनेमा के पर्दे पर पेश करने की बागडोर संभाली है मेघना गुलजार ने। साहस और दुस्साहस, दोनों के धनी सैम बहादुर पर स्मिता श्रीवास्तव का आलेख...

देश के सबसे सशक्त आर्मी चीफ और पहले फील्ड मार्शल सैम मानेकशा आज भी देश और सेना के जवानों के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। उनकी बहादुरी के कारण उन्हें सैम बहादुर के तौर पर भी संबोधित किया जाता है। चार दशक के करियर में वह द्वितीय विश्व युद्ध समेत पांच युद्ध का हिस्सा बने। इनमें वर्ष 1971 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध में वह महानायक के तौर पर उभरे। उनके जज्बे और अनसुनी कहानियों को बड़े पर्दे पर लाने की तैयारी कर रहीं मेघना गुलजार ने फिल्म ‘सैम बहादुर’ बनाने की घोषणा की है। इसकी शूटिंग अगले वर्ष से आरंभ होगी। फिल्म में सैम की भूमिका में विकी कौशल होंगे।

बन गए सेना का हिस्सा

भारतीय सेना के गौरवशाली इतिहास का अभिन्न अंग रहे सैम मानेकशा का पूरा नाम होरमुसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशा था। उन्होंने अपने कार्य, ओजपूर्ण व्यक्तित्व और प्रतिभा के बल पर अपना लोहा मनवाया। छह भाई-बहनों में पांचवें नंबर के सैम बचपन से ही बहुत शरारती थे। सैम पिता की तरह डाक्टर बनना चाहते थे मगर उनकी पढ़ाई के खर्च को वहन करना ही पिता के लिए आसान नहीं था। सो, उन्होंने सैम का दाखिला अमृतसर के सभा कालेज में करा दिया। साल 1932 में अंग्रेजों ने सेना में भर्ती होने के इच्छुक युवाओं के लिए देहरादून में इंडियन मिलिट्री एकेडमी (आएमए) की स्थापना की। मां से पैसे लेकर सैम दिल्ली में आइएमए की परीक्षा देने गए। मेरिट सूची में उनका नाम छठवें स्थान पर था। एक अक्टूबर, 1932 को उन्हें बतौर जेंटलमैन कैडेट भर्ती किया गया। बेहतरीन खिलाड़ी होने के साथ ही सैम अच्छे बाक्सर और लीडर थे।

बौखला गया पाकिस्तान

यह वह दौर था जब बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान के तौर पर जाना जाता था। वर्ष 1970 में पूर्वी पाकिस्तान की अवामी लीग पार्टी ने पाकिस्तान के संघीय चुनाव में पश्चिमी पाकिस्तान की पीपुल्स पार्टी के जुल्फिकार अली भुट्टो को हराकर बहुमत से जीत हासिल की थी। भुट्टो ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। इससे पूर्वी पाकिस्तान में विरोध की चिंगारी सुलग उठी। उसे नियंत्रित करने के लिए पाकिस्तान के सेना प्रमुख ने 27 मार्च, 1971 को सैन्य कार्रवाई का आदेश दिया। अवामी लीग के बंगाली मुस्लिम नेता शेख मुजीबुर रहमान को उनके ढाका स्थित घर से गिरफ्तार कर लिया गया। इससे पूर्वी पाकिस्तान में राजनीतिक विरोध प्रदर्शन प्रत्यक्ष तौर पर होने लगे। पाकिस्तान से आजादी को लेकर इस आंदोलन को वैचारिक तौर पर भारत का समर्थन हासिल था। इन बातों से बौखलाए पाकिस्तान ने तब ‘आपरेशन सर्चलाइट’ चलाकर पूर्वी पाकिस्तान में निहत्थे और मासूम लोगों को मारना शुरू कर दिया। इस सैन्य कार्रवाई पर लगाम लगाने की भारत की अपील को भी पाकिस्तान ने अनसुना कर दिया।

प्रधानमंत्री का आदेश किया खारिज

अप्रैल 1971 के आखिर तक जब सभी कूटनीतिक प्रयास विफल हो गए, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनका कैबिनेट चाहता था कि पाकिस्तान के खिलाफ तुरंत आक्रामक कार्रवाई की जाए। हालांकि सैम जानते थे कि आधी-अधूरी तैयारी के साथ जंग के मैदान में उतरना ठीक नहीं होगा। सैम ने स्पष्ट मना करते हुए इंदिरा गांधी को बताया कि भारतीय आर्मर्ड डिवीजन के पास 189 में सिर्फ 11 टैंक युद्ध के लिए तैयार हैं। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि मानसून शुरू होने वाला है, जब बाढ़ एक बड़ी समस्या बन जाती। ‘फील्ड मार्शल सैम मानेकशा: ए मैन एंड हिज टाइम्स’ किताब के मुताबिक, सैम ने इंदिरा गांधी को 1962 के युद्ध में (तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की नीतियों की वजह से) चीन से हुई हार का हवाला भी दिया। नतीजतन गुस्से में आईं इंदिरा गांधी के मिजाज को भांपते हुए सैम ने पूछा कि आप मेरा त्यागपत्र स्वास्थ्य, मानसिक या शारीरिक, किस आधार पर स्वीकार करेंगी? तब इंदिरा गांधी ने त्यागपत्र को ठुकराकर उनसे आगे की योजना बनाने को कहा तो सैम मानेकशा ने दो टूक कहा कि यदि उपाय के तौर पर युद्ध ही अंतिम विकल्प होगा तो यह उनके आह्वान पर होगा और वह सिर्फ प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करेंगे।

ऐतिहासिक युद्ध

इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर सबसे अहम सैन्य समर की तैयारियां शुरू हुईं। 30 नवंबर, 1971 को सैन्य संचालन के कार्यवाहक निदेशक मेजर जनरल इंदर गिल को संदेश मिला कि पाकिस्तान हमले की तैयारी में है। तीन दिसंबर, 1971 को अपराह्न 3.50 बजे पाकिस्तान वायु सेना ने श्रीनगर से जोधपुर तक भारतीय हवाई क्षेत्रों पर लगातार 11 हमले किए। यह सैम के युद्ध कौशल का नतीजा था कि 16 दिसंबर को भारतीय सेना के इतिहास की सबसे बड़ी घटना हुई, जब 90 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने हथियार डाल दिए। भारत ने पाकिस्तान को पूर्वी व पश्चिमी दोनों ही मोर्चों पर मुंहतोड़ जवाब दिया था। युद्ध के परिणामस्वरूप बांग्लादेश का जन्म हुआ। युद्ध के करीब दो साल बाद तीन जनवरी, 1973 को राष्ट्रपति वी.वी. गिरी ने सैम मानेकशा को फील्ड मार्शल का तमगा दिया। इस तरह भारतीय सेना को पहला फील्ड मार्शल मिला। 

Edited By: Ruchi Vajpayee