प्रियंका सिंह, जेएनएन। कोरोना काल में तमाम पाबंदियों के चलते सफर और घूमने-फिरने के शौकीन लोगों को अपनी तमाम योजनाओं को रद्द करना पड़ा। फिलहाल दूसरे शहर या विदेश यात्रा को लेकर कई तरह के दिशा-निर्देशों का पालन करना अनिवार्य है। सफर के दौरान अलग-अलग जगह की बोली, सभ्यता-संस्कृति व इतिहास से परिचय होता है और बहुत कुछ सीखने को मिलता है। हिंदी सिनेमा में 'जिंदगी ना मिलेगी दोबारा’, 'क्वीन’, 'दिल चाहता है’, 'बांबे टू गोवा’, 'बजरंगी भाईजान’, 'कारवां’, 'ये जवानी है दीवानी’, 'तमाशा’, 'हाइवे’, 'जब वी मेट’ जैसी तमाम फिल्में सफर के बैकड्राप पर बनी हैं।

अब कोरोना काल में रोड ट्रिप पर बनने वाली फिल्मों को बनाने के तरीकों में क्या बदलाव देखने को मिलेगा, साथ ही ट्रैवलिंग को सितारे कितना मिस कर रहे हैं इन बातों की पड़ताल कर रही हैं प्रियंका सिंह, सफर ट्रेन से हो, कार से या मोटरसाइकिल से हर सफर का अपना मजा होता है। इस दौरान नई-नई चीजों को जाने, देखने और समझने का मौका मिलता है। हिंदी सिनेमा में रोड ट्रिप के बैकग्राउंड में गढ़ी कहानी में सेल्फ डिस्कवरी, एक-दूसरे को समझने, प्यार-दोस्ती, दुनियादारी जैसे मुद्दे छाए रहते हैं। जब वी मेट, हाईवे, जब हैरी मेट सेजल जैसी फिल्मों के निर्देशक इम्तियाज अली की खूबी है कि वे अपनी कथा और किरदारों के लिए नयनाभिराम लोकेशन चुनते हैं। फिल्म 'जब हैरी मेट सेजल’ के जरिए उन्होंने छह देशों की यात्रा कराई थी। देखा जाए तो उनकी हर फिल्म में जर्नी होती है। इस बाबत वह कहते हैं कि मेरी फिल्मों में किरदार बहुत ट्रैवल करते हैं। ट्रैवल में उन्हें कुछ नई चीजें पता चलती हैं। कई नई संभावना अपने अंदर नजर आती है।

आमिर खान अभिनीत आगामी फिल्म 'लाल सिंह चड्ढा’ सेल्फ डिस्कवरी पर है। उसमें देश के अलग-अलग हिस्सों को एक्सप्लोर किया गया है। कीर्ति कुल्हारी अभिनीत फिल्म 'शादिस्तान’ भी रोड ट्रिप पर आधारित है। रोड ट्रिप के अनुभवों को बयां करते हुए कीर्ति कहती हैं कि पिछले साल अगस्त से देश में काम के सिलसिले में घूमने का मौका मिल रहा है। पहले की तरह अब ट्रैवलिंग आसान नहीं है, लेकिन सुरक्षा का ध्यान रखते हुए बाहर तो निकलना होगा ही। सफर मेरे जीवन का इतना महत्वपूर्ण हिस्सा है कि मैं हर तीन महीने में घूमने निकल जाती थी। मानसिक स्वास्थ्य के लिए घूमना जरूरी हो जाता है। ट्रैवलिंग मुझे पॉजिटिव रखती है। सफर से बहुत सारी पॉजिटिव एनर्जी लेकर लौटती हूं।

नया नजरिया मिलता है

'स्टूडेंट ऑफ द ईयर 2’ और 'इंदू की जवानी’ फिल्म के अभिनेता आदित्य सील हाल ही में आर्मेनिया से शूटिंग करके लौटे हैं। आदित्य कहते हैं कि मुझे एक साल के बाद वहां शॉपिंग करने का मौका मिला। मैं देश से मास्क पहनकर निकला था। जब आर्मेनिया पहुंचा, तो सब बिना मास्क के घूम रहे थे। हम अर्मेनिया की राजधानी येरवान में थे। वहां कोरोना के मामले बहुत कम हो गए हैं। जीवन सामान्य हो गया है। मैं फिर भी लोगों से दूर बैठा था। मैंने वहां जाकर एक पार्क में अपना मास्क निकाला, खुली हवा में सांस लेने का अनुभव ही बहुत सुकून पहुंचाने वाला था। मुझे वहां जो वैन दी गई थी, उसमें सारी सुविधाएं थीं। मेरा सपना रहा है कि इस तरह की वैन लेकर छह महीनों के लिए कहीं घूमने निकल जाऊं। मुझे सफर करने से खुद को लेकर, दूसरों को लेकर नया नजरिया मिला। जब हम अविकसित देश में जाते हैं, तो उनकी दिक्कतें सिखाती हैं कि हमें किन बातों का ख्याल अपने देश में रखने की जरूरत है। विकसित देश में जाकर समझ आता है कि वह अपनी जिंदगी को कैसे समृद्ध बना रहे हैं।

अपनी समस्याएं छोटी लगती हैं

'लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ की अभिनेत्री आहना कुमरा भी ट्रैवलिंग की काफी शौकीन हैं। वह कहती हैं कि पहले मुझे लगता था कि मेरी समस्या ही सबसे बड़ी है, लेकिन जब मैंने अकेले सफर करना शुरू किया तो पता चला कि दुनिया में लोग किन मुश्किलों से जूझ रहे हैं। मैं एक बार अमेरिका में एक महिला से मिली थी। उनकी कहानी ने मुझे इतना प्रभावित किया है कि मैं उन पर एक किताब भी लिखना चाह रही हूं। मैं जिस होटल में रुकी थी, वहां कि जनरल मैनेजर से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी। वह मुझे अक्सर काफी और शॉपिंग पर लेकर जाती थीं। एक बार मैंने उनसे पूछा कि मैं तो अजनबी हूं, आप मेरे लिए इतना क्यों कर रही हैं। उन्होंने फिर मुझे बताया कि मेरी उम्र की उनकी बेटी है, जिससे वह मिल नहीं पाती हैं। दरअसल, उनके पति ने किसी और महिला के लिए उन्हें छोड़ दिया था। वह गुजरात से आई थीं, उन्हें न अंग्रेजी आती थी, न ठीक से हिंदी बोल पाती थीं। उन्होंने कई जगहों पर काम किया। जिनके घर में वह बच्चों को संभालने का काम करती थीं, वहां उन्होंने अंग्रेजी भी सीखनी शुरू की। लाइब्रेरी में काम करके वहां कि किताबों से ज्ञान हासिल किया। पढ़ाई की और अब वह पांच सितारा होटल की जनरल मैनेजर हैं। उनके संघर्ष के सामने मुझे अपनी समस्याएं छोटी लगने लगीं।

हर मुश्किल में रहने की कला

अभिनेत्री जरीन खान ने ट्रैवलिंग पर आधारित शो और फिल्में की हैं। वह कहती हैं कि मेरे लिए सफर करना, जीवन को समझने का एक अच्छा तरीका है। मैं जुनूनी मुसाफिर हूं। यही वजह है कि मैंने एक ट्रैवल शो भी किया था। मैं खुद कार चलाकार लद्दाख के मुश्किल रास्तों से गुजरी हूं। सफर करना आपको चुनौतियों से लडऩा सिखाता है। मैं हमेशा से टाम ब्वॉय रही हूं। दोस्तों के साथ रोड ट्रिप्स किए हैं। आप जब सफर करते हैं, तो हर तरह की मुश्किल में रहना सीख जाते हैं। जो लक्जरी मुझे पहले चाहिए थी, वह अब नहीं चाहिए। यही वजह है कि अब जब मैं ट्रैवल करती हूं तो बड़े होटलों में नहीं रुकती हूं। न ही इंटरनेट मीडिया पर उसका दिखावा तस्वीरें पोस्ट करके करती हूं। आंखों से उस जगह को महसूस करती हूं। ट्रैवलिंग से जिंदगी को बेहतर समझा जा सकता है। वाराणसी में गंगा घाट पर आरती के दौरान जो ऊर्जा महसूस की थी, वैसा पहले कभी महसूस नहीं किया।

रोड ट्रिप पर फिल्म बनाना आसान नहीं

हाल ही में निर्देशक हरीश व्यास की फिल्म 'हम भी अकेले तुम भी अकेले’ डिजिटल प्लेटफार्म पर रिलीज हुई है। ट्रैवलिंग फिल्म का अहम हिस्सा था। हरीश कहते हैं कि यह फिल्म मैंने महामारी से पहले बनाई थी, लेकिन अब रोड ट्रिप्स पर फिल्में बनाना पहले जैसा आसान नहीं होगा। आपको पूरी यूनिट को साथ में लेकर चलना पड़ता है। रूट पहले से तय करने होते हैं, परमिशन लेनी होती है, सफर का सारा सामान साथ रखना पड़ता है। पहले हम इस फिल्म को नार्थ ईस्ट में शूट करने वाले थे। बनारस से कोलकाता और शिलांग तक का सफर था, लेकिन वह लंबा रूट था। फिर हमने इसे धर्मशाला में शूट किया।

सफर पर बनी फिल्मों की खूबसूरती यह होती है कि हर फ्रेम के साथ उनके विजुअल्स बदल जाते हैं। हालांकि रोड ट्रिप पर आधारित फिल्में बनाने का अपना मजा है। भीड़ फिल्म की शूटिंग देखती है, लेकिन अब रोड ट्रिप की सबसे बड़ी दिक्कत भीड़ ही है, अगर सेट लगेगा तो भीड़ आएगी। मैंने अपनी फिल्म के लिए ढाबा वाला सीन हाइवे पर लगाया था। वहां लोग शूटिंग देखने के लिए एकत्र हो गए थे। ट्रैवलिंग पर फिल्में बनाने के दौरान प्रोडक्शन को लेकर भी काफी जानकारी बढ़ जाती है कि आप कितनी कम चीजों में काम चला लेंगे। छोटी बजट की फिल्मों को बनाना इतना मुश्किल नहीं होगा, लेकिन बड़े बजट की फिल्मों का स्केल व क्रू बड़ा होता है। सफर पर फिल्में बनाने के लिए उन्हें इंतजार करना होगा, क्योंकि इनडोर या क्रोमा (पर्दे के बैकग्राउंड पर शूटिंग करने के बाद एडिटिंग के जरिए पर्दे को निकालकर दूसरा बैकग्राउंड लगा दिया जाता है) पर शूटिंग नेचुरल नहीं लगती है।

कल्पनाओं को न रोकें

'गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के सह लेखक और 'बावरी छोरी’ फिल्म के निर्देशक अखिलेश जायसवाल कहते हैं कि मैंने अपनी फिल्म 'बावरी छोरी’ की शूटिंग लंदन की कई जगहों पर महामारी से पहले की थी। अब तो इतनी पाबंदियां हैं, अगले साल तक वैक्सीनेशन के बाद ही चीजें तय होंगी। लेखन की प्रक्रिया ट्रैवलिंग की कहानियों को लेकर मुश्किल जरूर है, क्योंकि एक साल से कहीं आना जाना नहीं हो पाया है, लेकिन कल्पनाओं को रोका नहीं जा सकता है। यह सोचकर नहीं बैठा जा सकता है कि किस लोकेशन में कहानी को सेट किया जाए। लिखते रहना चाहिए। सीखने का सबसे अच्छा तरीका है कि आप सफर करें। नए विचार, नई जगह की

कहानियां सुनने के बाद ही आते हैं।

फिल्में देती हैं घूमने का मौका अभिनेता मनोज बाजपेयी कहते हैं कि मैं छोटे गांव से हूं। मैं अलग जगह पर जब शूटिंग के लिए जाता हूं तो कोशिश यही होती है कि जिस दिन काम न हो, उस दिन उस जगह को घूम लिया जाए। अब भले ही यह थोड़ा मुश्किल हो, लेकिन मैं लोकेशन की संकरी गलियों, वहां की संस्कृति को देखने का कोई मौका नहीं छोड़ता हूं। उन जगहों की लोकल डिश भी ट्राई करता हूं। यह अभिनेता होने का फायदा है। फिल्मों की शूटिंग के लिए आप उन जगहों तक पहुंच जाते हैं, जहां शायद आम जीवन में घूमने के लिए शायद ही जाएं।