मुंबई। भारत में सिनेमा की शुरुआत ही देशभक्ति या स्वाभिमान की भावना के साथ हुई थी। अंग्रेजी राज की कठोर सेंसर व्यवस्था के बीच अपनी राजनीतिक भावनाओं की सीधी अभिव्यक्ति संभव नहीं थी, लेकिन दादा साहब फाल्के सहित उस समय के फिल्मकारों ने पौराणिक, ऐतिहासिक कथानकों के माध्यम से दर्शकों में देशप्रेम और स्वाभिमान की भावना जगाए रखने की सफल कोशिशें की। गीतकारों व संगीतकारों ने देशप्रेम में पगे अपने फिल्मी गीतों से देशवासियों को स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के मौके पर उनके योगदान को रेखांकित कर रहे हैं विनोद अनुपम...

वर्ष 1931 में सिनेमा को आवाज मिलने के साथ ही फिल्मकारों को गीतों के रूप में एक और माध्यम मिल गया जिससे आम जन से सीधे जुड़ा जा सकता था, जो सिनेमा से भी अधिक संप्रेष्य थी। यह वह समय था जब स्वाधीनता आंदोलन चरम पर था, हर किसी को आजादी सामने दिख रही थी और हर कोई आजादी के संघर्ष में अपने योगदान के लिए तत्पर था, सिनेमा भी।

आश्चर्य नहीं कि उस समय की सबसे बड़ी फिल्म कंपनी बांबे टाकीज ने एक युवा कवि के देशभक्ति गीतों की गूंज सुनकर उसे मासिक वेतन पर रख लिया। उस समय बांबे टाकीज के मालिक हिमांशु राय को शायद ही एहसास होगा कि आने वाले वर्षों तक इस पतले-दुबले कवि की आवाज देश की आवाज बनकर गूंजती रहेगी। ये थे

कवि प्रदीप (रामचंद्र नारायण द्विवेदी), जिन्हें सिनेमा में गीतों के माध्यम से आजादी के आंदोलन में सीधे योगदान की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है। उनकी वह फिल्म थी 1940 में बनी 'बंधन'।

बांबे टाकीज के स्थायी कलाकार अशोक कुमार, लीला चिटणिस के साथ यह एक सामाजिक कथानक पर बनने वाली फिल्म थी। प्रदीप ने नायक नायिका पर फिल्माते हुए एक गीत लिखा, 'चल चल रे नौजवान...दूर तेरा गांव और थके हैं पांव...तुम हो मेरे संग, आशा है मेरे संग। तुम हो मेरे संग, हिम्मत है मेरे संग। मेरे साथ साथ रहो तुम कदम कदम...।' इस गीत के लिए संगीत दिया था रामचंद्र पाल ने। अंग्रेज सेंसर बोर्ड तक इस गीत के निहितार्थ भले ही नहीं पहुंच सके, लेकिन स्वाधीनता सेनानियों के उत्साह में इस गीत ने उस समय उत्प्रेरक की

भूमिका निभाने की शुरुआत कर दी थी। कहते हैं कि उस समय कांग्रेस के सम्मेलनों में इस गीत को गाया जाता था।

इस गीत का प्रभाव इतना था कि 1944 में फिल्मिस्तान ने 'चल चल रे नौजवान' टाइटल से एक फिल्म भी बनायी। इस गीत ने सिनेमा के सामने देश के साथ खड़े होने की नई राह खोली, यह भरोसा दिया कि यदि जज्बा और काबिलियत हो तो सेंसरशिप के बावजूद अपनी बात रखी जा सकती है।

बांबे टाकीज की अगली ही फिल्म ‘किस्मत’ के लिए कवि प्रदीप को एक और चुनौती मिली। फिल्म अपराध कथा थी, निर्देशक ज्ञान मुखर्जी ने सिचुएशन निकाली और प्रदीप की कलम से एक अमर रचना निकली, ‘आज हिमालय की चोटी से हमने ललकारा है, दूर हटो ऐ दुनिया वालो, हिंदुस्तान हमारा है...’। अमीर बाई कर्नाटकी और खान मस्ताना के गाए इस गीत ने अंग्रेजी हुकूमत को भी डरा दिया था। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 1943 में आया यह गीत गली-कूचों में गूंजने लगा था।

अंग्रेज सरकार के कान खडे़ हो गए और कवि प्रदीप के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हो गया, लेकिन अंग्रेज सरकार कवि की इस दलील से संतुष्ट हो गई कि यह गीत विश्वयुद्ध में अंग्रेजों को साथ देने का संदेश देती है। गीत की आखिरी पंक्तियों में था, ‘शुरू हुई है जंग तुम्हारी, जाग उठो हर हिंदुस्तानी। तुम न किसी के आगे झुकना, जर्मन हो या जापानी...’, लेकिन प्रदीप अपनी आवाज जहां पहुंचाना चाह रहे थे, वहां पहुंच रही थी, ‘जहां हमारा ताजमहल है और कुतुब मीनार है। जहां हमारे मंदिर मस्जिद सिखों का गुरुद्वारा है...’।

प्रदीप ने अंग्रेजी राज में देशप्रेम की एक मशाल जलायी, जिसे लेकर और भी लोग बढे़। 1941 में सोहराब मोदी ने ‘सिकंदर’ बनायी, जिसके लिए गीत पं. सुदर्शन ने लिखे थे। मीर साहब और रफीक गजनवी ने संगीत दिया था। पं. सुदर्शन का गीत, ‘जीते देश हमारा, भारत है घरबार हमारा, भारत है संसार हमारा’। यह गीत उस दौर मे देशप्रेमियों की जुबान पर था। यह संयोग नहीं कि मोहम्मद रफी जैसे राष्ट्रवादी गायक के पहले गीत के बोल थे, ‘हिंदुस्तान के हम हैं, हिंदुस्तान हमारा। हिंदू मुस्लिम दोनों की आंखों का तारा...’। 1944 में ए आर कारदार की फिल्म ‘पहले आप’ के लिए यह गीत लिखा था, डी एन मधोक ने और संगीतकार थे नौशाद। 1946 में ‘हमजोली’ में नूरजहां की आवाज में आए इस गीत के साथ स्वाधीनता की आहट भी सुनाई देने लगी थी, आजादी का संकल्प और भी मजबूत होने लगा था। ‘ये देश हमारा प्यारा, हिंदुस्तान जहां से न्यारा। ले के रहेंगे हम आजादी, वो दिन आनेवाला है, झंडा अपना सारी दुनिया पर लहराने वाला है...।’

1947 में स्वाधीनता के बाद तो कुछ दिनों के लिए देशप्रेम मुख्य स्वर बन गया, कई फिल्में बनीं, कई गीत रचे गए, लेकिन अंग्रेजी राज में सेंसर की जद्दोजहद के बीच जिन्होंने स्वाधीनता आंदोलन के बीच अपना योगदान अर्पित किया उनके संघर्ष और संकल्प को पहचानने की जरूरत है। (लेखक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित हैं)

Edited By: Pratiksha Ranawat