दीपेश पांडेय, मुंबई। देश पर आने वाले खतरों से आगाह करना, उसकी सुरक्षा के लिए सर्वस्व न्योछावर कर देना, बड़ी से बड़ी मुश्किलों से टकरा जाना और कई बार गुमनामी की मौत सो जाना, कुछ ऐसी ही होती है जांबाज जासूसों की जिंदगी। जासूसी की कहानियों में रोमांस, रोमांच, एक्शन और इमोशन के साथ देशभक्ति की भावनाएं जुड़ी होती हैं। हाल ही में अक्षय कुमार अभिनीत स्पाई थ्रिलर फिल्म ‘बेल बाटम’ रिलीज हुई। आगामी दिनों में ‘पठान’, ‘टाइगर 3’, ‘धाकड़’ और ‘मिशन मजनू’ समेत इस जोनर की कई फिल्में कतार में हैं। इनमें दर्शकों व फिल्मकारों की बढ़ती रुचि के साथ ही इनके निर्माण की चुनौतियों की पड़ताल कर रहे हैं दीपेश पांडेय...

हालीवुड में जेम्स बांड फ्रेंचाइजी की फिल्मों समेत कई स्पाई थ्रिलर फिल्में बनी हैं, लेकिन हिंदी सिनेमा में जासूसों की इस रहस्यमयी दुनिया को सीमित एक्सप्लोर किया गया है। इनमें सबसे मशहूर रही साल 1968 में रामानंद सागर निर्देशित व धर्मेंद्र, माला सिन्हा, महमूद अभिनीत फिल्म ‘आंखें’। वर्ष 2002 में आई फिल्म ‘16 दिसंबर’ में देशभक्ति के साथ दर्शकों को बांधने वाला सस्पेंस था। अनिल शर्मा ने साल 2003 में फिल्म ‘द हीरो- लव स्टोरी ऑफ ए स्पाई’ से इस दुनिया को खंगालने की कोशिश की। इस बीच कुछ और फिल्में भी बनी, लेकिन वे बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हो पाईं। साल 2012 में सैफ अली खान अभिनीत ‘एजेंट विनोद’ व सलमान खान अभिनीत फिल्म ‘एक था टाइगर’ रिलीज हुईं। सलमान की फिल्म ने लगभग 186 करोड़ रुपये की कमाई की। इसी तरह ‘मद्रास कैफे’, ‘फैंटम’, ‘राजी’, ‘वॉर’ सहित कई स्पाई थ्रिलर फिल्में आईं और अब यह बॉक्स ऑफिस के पसंदीदा जोनर्स में से एक बन चुका है।

नई है यह दुनिया

फिल्म ‘नाम शबाना’ के निर्देशक शिवम नायर के अनुसार, ‘हमारे सिनेमा में जासूसी दुनिया को ज्यादा नहीं दिखाया गया है। यह दौर अभी शुरू हुआ है। डिजिटल प्लेटफार्म पर भी इसका प्रभाव देखा जा सकता है। स्पाई थ्रिलर की दुनिया में कहानियां बहुत हैं। हम लोग लव स्टोरी या मर्डर मिस्ट्री सिनेमा देखकर बड़े हुए हैं, ऐसे में यह दुनिया ज्यादातर दर्शकों के लिए नई है। फिल्मकारों के साथ-साथ दर्शक भी अभी इस दुनिया को एक्सप्लोर कर

रहे हैं। स्पाई थ्रिलर कहानियों में जासूस अपने देश की सुरक्षा के लिए जासूसी करते हैं तो फिल्म में देशभक्ति की भावना आना भी स्वाभाविक है।’

गुमनाम नायकों की कहानियां बताना जरूरी

सेना या पुलिस के जवानों के शहीद होने पर उनकी वीरता की कहानियां दिखाई जाती हैं, लेकिन देश के लिए कुर्बान होने वाले जासूसों के बारे में लोगों को कुछ भी पता नहीं चलता है। ऐसे में फिल्मकार फिल्मों के माध्यम से ऐसे गुमनाम नायकों की कहानियां लोगों को बताना जरूरी समझते हैं। अभिनेता अक्षय कुमार कहते हैं, ‘रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) एजेंट्स ऐसे लोग होते हैं, जो कई बार हमारे बीच होते हैं, लेकिन उनके बारे में कोई जानता नहीं है। ‘बेल बॉटम’ में साल 1984 में हुए प्लेन हाइजैक का जिक्र है। साल 1979 से लेकर 1984 तक कितने हवाई जहाज हाइजैक हुए थे, कौन उन्हें हाइजैक कर रहा था, कैसे इसे रोका गया था, उससे जुड़ी कई ऐसी जानकारियां हैं, जो समान्यत: लोगों को नहीं पता। फिल्म बनाते वक्त काफी रिसर्च की गई थी। बतौर एक्टर मुझे अच्छा लगा कि इन हीरोज की कहानियां और इनके साहस के बारे में जान पाया। जिन नायकों की कहानियां किताबों तक नहीं पहुंच पाती हैं, मुझे उन्हें लोगों के सामने लाने का मौका सिनेमा के जरिए मिलता है।’

जासूसी की दुनिया को समझना बड़ी चुनौती

स्पाई थ्रिलर फिल्मों के निर्माण की राह में कई चुनौतियां होती हैं। जासूसों के बारे में किसी को ज्यादा पता या लिखित जानकारी नहीं होती है, इसलिए उनकी दुनिया के बारे में रिसर्च करना और प्रामाणिकता के साथ लिखना सबसे बड़ी चुनौती होती हैं। फिल्म ‘बेल बॉटम’ और ‘मिशन मजनू’ के लेखक असीम अरोड़ा बताते हैं, ‘स्पाई थ्रिलर फिल्में लिखने के लिए सबसे जरूरी होती है प्रामाणिकता। कभी-कभी घटनाओं के मामले में ज्यादा चीजें लिखित में नहीं मौजूद होती हैं, वहां पर हमें कल्पना के आधार पर घटनाएं नाटकीय तरीके से तैयार करनी पड़ती हैं। दृश्य और भाषा संबंधित फिल्म की कहानी और दौर के लिए प्रासंगिक होना जरूरी हैं। मैंने ‘बेल बॉटम’ की कहानी एक किताब में सिर्फ आधे पन्ने में पढ़ी थी। फिर मुझे एक ‘एयर इंडिया हाइजैक्स’ नामक किताब मिली, जिसमें एयर इंडिया के हाइजैक हुए विमानों की घटनाओं का जिक्र है। हमने इंटरनेट खंगाला व कुछ जासूसों से मिलकर जानकारी जुटाई। ‘मिशन मजनू’ की कहानी के लिए काफी कंटेंट मौजूद है। ऐसी फिल्मों के लिए कभी-कभी एक छोटी सी कहानी पर ही पूरी रिसर्च करनी पड़ती है तो कभी-कभी पूरी कहानी लिखित तौर पर मिल जाती है।’

एक्शन की अहमियत

विपरीत परिस्थितियों से खुद को निकालने की क्षमता रखने वाले जासूसों के लिए शारीरिक और मानसिक मजबूती मायने रखती है। इस लिहाज से स्पाई थ्रिलर फिल्मों के लिए एक्शन अहम है। साल 2019 में रिलीज हुई स्पाई

थ्रिलर फिल्म ‘वॉर’ ने हिंदी सिनेमा में एक्शन के नए मानक स्थापित किए। ऐसी फिल्मों के एक्शन लिखने पर असीम कहते हैं, ‘एक्शन को दो तरीके से लिखा जा सकता है, पहला आप उसे लार्जर दैन लाइफ बना दो और दूसरा, अगर फिल्म वास्तविक घटना से प्रेरित है तो एक्शन सीक्वेंस को भी उसी के दायरे में लिखना पड़ता है। सच्ची कहानी होने की स्थिति में एक्शन की कोरियोग्राफी से लेकर परफार्मेंस तक सारी चीजें रियलिस्टिक रखनी पड़ती हैं।’

लोकेशन का महत्व

जासूसों को अपने काम के सिलसिले में एक देश से दूसरे देश में जाना पड़ता है। ऐसे में स्पाई थ्रिलर फिल्मों में राष्ट्रीय के साथ ही अंतरराष्ट्रीय लोकेशंस अहम होती हैं। इस बारे में शिवम नायर कहते हैं, ‘लोकेशन जितनी वास्तविक दिखाई जाए, उतना ही बेहतर होता है। स्पाई थ्रिलर कहानी हमारे पड़ोसी देशों पाकिस्तान, नेपाल, चीन, बांग्लादेश और श्रीलंका समेत अन्य महाद्वीपों के दूसरे देशों में भी फैली हो सकती है। पाकिस्तान के लोकेशन अक्सर हिंदुस्तान में ही सेट लगाकर शूट कर लिए जाते हैं। ‘नाम शबाना’ को हमने मलेशिया में शूट किया था। हमने एक्शन कोरियोग्राफर भी वहीं से लिया था, एक्शन एक अलग एंगल से दिखाया गया था, जिससे सीन और एक्शन दोनों वास्तविक लग रहे थे। ऐसी फिल्मों में कॉस्ट्यूम, कास्टिंग और मेकअप का भी अहम स्थान होता है।’

तकनीक से आसानी

सिनेमेटोग्राफी से लेकर, वीएफएक्स और सुरक्षा उपकरणों की दिशा में काफी विकास हुआ है। जिसका लाभ फिल्मकारों को मिला है। फिल्म ‘बेल बॉटम’ में अबू धाबी की लोकेशन दिखाई गई। कोरोना की वजह से अबू धाबी में शूटिंग करना संभव नहीं था, इसलिए टीम ने स्कॉटलैंड में ही शूटिंग की। स्कॉटलैंड के ग्लासगो में बहुत हरियाली है। वहां पूरे बैकग्राउंड को तकनीक की मदद से बदलकर स्कॉटलैंड को पिछली सदी के आठवें दशक के अबू धाबी के तौर पर दिखाया गया। तकनीक के इस्तेमाल पर फिल्म ‘द हीरो- लव स्टोरी ऑफ ए स्पाई’ के

निर्देशक अनिल शर्मा कहते हैं, ‘जब मैंने अपनी फिल्म बनाई थी उस दौर में तकनीक इतनी उन्नत नहीं थी, इसलिए स्पाई वर्ल्ड को दिखाना काफी मुश्किल होता था। अब ज्यादातर काम वीएफएक्स के जरिए हो जाता है।’

बजट अधिक चाहिए

स्पाई थ्रिलर फिल्मों की शूटिंग देश के साथ विदेश में भी होती है। एक्शन, वीएफएक्स और एक्टर्स की ट्रेनिंग जैसी चीजों को मिलाकर इनका बजट सामान्य ड्रामा फिल्मों की तुलना में काफी बड़ा हो जाता है। इस बारे में शिवम नायर का कहना है, ‘सामान्यत: अगर नवोदित एक्टर को लेकर हम लव स्टोरी फिल्म बनाते हैं तो 10-12 करोड़ के अंदर आसानी से अच्छी फिल्म बन सकती है, लेकिन उसी एक्टर और क्रू के साथ स्पाई थ्रिलर का बजट बीस करोड़ रुपए से ऊपर पहुंच जाता है। इस तरह सामान्य ड्रामा फिल्मों की तुलना में स्पाई थ्रिलर फिल्मों का बजट करीब डबल हो जाता है।’

फायदे का सौदा

पिछले कुछ वर्षों में स्पाई थ्रिलर फिल्में बॉक्स ऑफिस पर फायदे का सौदा साबित हुई हैं। इस बारे में फिल्म निर्माता और ट्रेड एनालिस्ट गिरीश जौहर कहते हैं, ‘स्पाई थ्रिलर जोनर हमेशा से दर्शकों को आकर्षित करता रहा है। पहले भी ‘एक था टाइगर’, ‘नाम शबाना’ और ‘वॉर’ जैसी फिल्में सफल रही हैं। यह काफी स्ट्रांग जोनर है। हालीवुड की जेम्स बांड फ्रेंचाइजी और ‘किंग्समैन इलेवन’ जैसी फिल्में दुनियाभर में लोकप्रिय हुई हैं। कहानी की मांग के अनुसार इन फिल्मों को निर्माता विदेश में शूट करते हैं। कई देशों में शूटिंग के लिए निर्माताओं को सहूलियतें मिलती हैं। मौजूदा दौर में घोषित फिल्मों के अलावा इस जोनर की कई अन्य फिल्मों के लेखन का काम चल रहा है। जल्द ही उनकी घोषणा संभव है।

डिजिटल पर भी हिट

स्पाई थ्रिलर कंटेंट बड़े पर्दे के साथ डिजिटल प्लेटफार्म के लिए भी काफी हिट रहा है। ‘द फैमिली मैन’, ‘बार्ड आफ ब्लड’ और ‘स्पेशल ऑप्स’ जैसी भारतीय वेब सीरीज इस जोनर में काफी लोकप्रिय हुईं। वेब सीरीज ‘द फैमिली मैन’ में मनोज बाजपेयी स्पेशल एजेंट के रूप में आतंकवादी साजिश को नाकाम करते नजर आते हैं। विदेशी वेब सीरीज ‘जैक रायन’, ‘द नाइट मैनेजर’, ‘एजेंट आफ शील्ड’ और ‘ब्लैकलिस्ट’भी काफी लोकप्रिय रही हैं।

Edited By: Pratiksha Ranawat