स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। प्रतिष्ठित 93वें ऑस्कर अवॉर्ड्स में लाइव एक्शन शॉर्ट फिल्म कैटेगरी में दुनियाभर की 174 फिल्मों में से चुनी गई 10 प्रविष्टियों में स्थान बनाने में सफल रही है निर्देशक करिश्मा देव दुबे की 'बिट्टू'। सीमित संसाधनों के साथ अल्प अवधि में अपनी बात कहने की यह सिने विधा शॉर्ट फिल्म इन दिनों काफी लोकप्रिय हो रही है। न सिर्फ नवोदित फिल्मकार, बल्कि सुजॉय घोष, फरहान अख्तर, नीरज पांडे जैसे बड़े फिल्मकार शॉर्ट फिल्में बनाने में रुचि ले रहे हैं। यही नहीं,विद्या बालन व मनोज बाजपेयी जैसे चर्चित कलाकार भी इनका हिस्सा बनने में रुचि रखते हैं। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने भी शॉर्ट फिल्म्स को अपने कंटेंट में शामिल किया है। शॉर्ट फिल्मों के प्रति बढ़ते रुझान व इसके निर्माण में आने वाली चुनौतियों की पड़ताल कर रही हैं स्मिता श्रीवास्तव...

कम अवधि, सीमित बजट और संसाधनों में बनने वाली शॉर्ट फिल्मों को पहले मीडिया और सिनेमा के छात्र बनाते थे। इन्हें खास मौकों पर दर्शाया जाता था। कॅरियर की शुरुआत में फिल्ममेकर विधु विनोद चोपड़ा को ख्याति अपनी शॉर्ट फिल्म 'मर्डर एट मंकी हिल' से मिली थी। साल 1976 में बनाई इस शॉर्ट फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्र्रीय पुरस्कार मिला था। शॉर्ट फिल्म बनाने को लेकर विधु बताते हैं, 'वह मेरी डिप्लोमा फिल्म थी। हमें फिल्म इंस्टीट्यूट में फुटेज दिया जाता था। छह दिन में उसे बनाना होता था। अगर आप मेरी शॉर्ट फिल्म का अंत देखें तो पाएंगे कि उसके अंत में फुटेज ही खत्म हो गई थी। मैंने कहा भी था कि इतना कम फुटेज देते हो, अगर ज्यादा फुटेज दो तो अच्छा काम हो जाए। उस फिल्म को राष्ट्र्रीय पुरस्कार समेत कई पुस्कार मिले थे। शार्ट फिल्म का निर्माण अपनी क्षमता परखने का अहम जरिया है। इनके माध्यम से आपकी काबिलियत दूसरों के सामने भी उजागर होती है।' 

'बिट्टू' की कहानी: 

'बिट्टू' से पहले करिश्मा देव दुबे पांच शॉर्ट फिल्म का निर्देशन कर चुकी हैं। न्यू यॉर्क में रह रही करिश्मा कहती हैं, 'बतौर डायरेक्टर मैं शॉर्ट फिल्म से अपनी जुबान खोज रही थी कि क्या कहना चाहती हूं। मेरा क्या स्टाइल होगा। 'बिट्टू' सच्ची घटना से प्रेरित है। हालांकि उस घटना के बजाय दोस्ती पर ही फोकस रखा गया है, क्योंकि मैं इंवेस्टिगेटिव फिल्ममेकर नहीं हूं। बच्चों को जहर देने के पीछे जो कारण है उसकी पड़ताल करूं। बिट्टू का गांव बहुत साधारण है। वे सब खुश थे। उन्हें बाहरी दुनिया से ज्यादा अपेक्षाएं नहीं थीं। उस हादसे में 22 बच्चों की मौत हो गई थी। मैं उन सभी बच्चों की कहानी नहीं बता सकती, लेकिन जब लोग इस कहानी को देखें तो उस हादसे के बारे में जरूर सोचें। यही कोशिश की है।'  

संभावनाओं के द्वार खोलती हैं शॉर्ट फिल्में:  

पिछली सदी के सातवें दशक से लेकर मौजूदा दौर तक शॉर्ट फिल्मों की दुनिया काफी बदल चुकी है। नवोदित फिल्ममेकर्स फिल्म, वेब सीरीज बनाने से पहले इसे प्रयोग के तौर पर बना रहे हैं। विद्या बालन अभिनीत शॉर्ट फिल्म 'नटखट' के निर्देशक शान व्यास कहते हैं, 'सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में नए फिल्मकारों के लिए शॉर्ट फिल्म का निर्माण एक फीचर फिल्म पाने के गेटवे की तरह होता है। किसी भी फीचर फिल्म की स्क्रिप्टिंग, निर्देशन और निर्माण में करीब एक साल का वक्त लगता है। शॉर्ट फिल्म एक तरह से फिल्मकारों के लिए अभ्यास की तरह होती है। इससे भविष्य में फीचर फिल्म बनाने के लिए आत्मविश्वास मिलता है। इससे इतर दूसरा पहलू है कि कभी-कभी कुछ कहानियों को शॉर्ट फिल्म्स के जरिए ही कहा जा सकता है।' 

सीमित संसाधनों से मिलती बड़ी संतुष्टि:  

आरती कदव ने साइंस फिक्शन फिल्म 'कार्गो', '55 किमी/सेकेंड' समेत कई शॉर्ट फिल्में बनाई हैं। उनका अपना डिजिटल प्लेटफार्म शार्टफिल्म विंडो भी है। वह कहती हैं, 'मेरा संघर्ष लंबा रहा है। सबके पास फिल्म बनाने के संसाधन नहीं होते हैं। मैं शॉर्ट फिल्में बनाती हूं, क्योंकि वहां प्रयोग करने का मौका मिलता है। फिल्म में बड़े बजट के साथ रिस्क बड़ा होता है तो आप कदम फूंक-फूंक कर रखते हैं। शॉर्ट फिल्म की अच्छी बात यह है कि यहां पर आपको मसाले डालने की जरूरत नहीं होती है। आखिर में दिल को स्पर्श करने वाली कुछ चीजें रखना जरूरी होता है। यह प्रक्रिया ही अलग है। शॉर्ट फिल्म में आपसे कुछ इनोवेटिव चीजों की अपेक्षा रखी जाती हैं। मैंने अपना प्लेटफॉर्म शुरू किया, क्योंकि शॉर्ट फिल्में इधर-उधर बिखरी रहती हैं। मुझे लगा कि ऐसा प्लेटफॉर्म हो जहां आप सिर्फ शॉर्ट फिल्में ही देखें। यह पूरी तरह मुफ्त है।' 

शॉर्ट फिल्म की भी हैं अपनी सीमाएं:  

लंदन से एमबीए की पढ़ाई और दुबई में बैकिंग की नौकरी करने के बाद प्रसाद कदम ने फिल्मी दुनिया का रुख किया। अदा शर्मा और अनुप्रिया गोयनका अभिनीत उनकी शॉर्ट फिल्म 'चूहा बिल्ली' को काफी पसंद किया जा रहा है। प्रसाद कहते हैं, 'इंडस्ट्री में न्यूकमर को तुरंत मौका नहीं मिलता है। अपने सपने को साकार करने के दो तरीके हो सकते हैं। पहला, आप किसी निर्देशक के असिस्टेंट बन जाएं। अपने मौके का इंतजार करें। 

दूसरा, आप विज्ञापन और शॉर्ट फिल्में बनाएं। जब लोगों को आपकी प्रतिभा पर यकीन होगा तो वह आपके साथ फिल्म या वेब सीरीज बनाने को तैयार होंगे। मैंने दूसरा रास्ता चुना। अपनी कंपनी बनाई। छोटे-छोटे ब्रांड्स के लिए विज्ञापन बनाए। शॉर्ट फिल्म बनाई। हालांकि शॉर्ट फिल्म की अपनी सीमाएं भी होती हैं। लेखक को कहानी गढ़ते समय यह ध्यान रखना होता है कि उसके लिए कितना फाइनेंस उपलब्ध हो पाएगा। कहानी को हम कितना फिल्मा सकते हैं, यह उसकी सीमा होती है।' प्रसाद कदम अब अनुपम खेर और आहना कुमरा के साथ शॉर्ट फिल्म बनाने की तैयारी में हैं।  

बड़े सितारे भी ले रहे हैं रुचि:  

शॉर्ट फिल्में करने में नामी सितारे भी दिलचस्पी ले रहे हैं। मनोज बाजपेयी, राधिका आप्टे, जैकी श्रॉफ, नीना गुप्ता, काजोल, विद्या बालन, नेहा धूपिया, शायोनी गुप्ता, अदा शर्मा सरीखे तमाम कलाकार शार्ट फिल्मों का हिस्सा बने हैं। 'जय हिंद', 'तांडव', 'कृति', 'आउच' जैसी शॉर्ट फिल्में करने को लेकर मनोज बाजपेयी कहते हैं, 'मेरे लिए अच्छी कहानी या बदलाव का हिस्सा होना बहुत महत्वपूर्ण रहा है। अभिनेता के तौर पर इस माध्यम को मेरा योगदान क्या है, यह अहम है। अगर मैं अकेला सफल हूं तो वह सफलता किस काम की। हम एक-दूसरे का उत्साह बढ़ाते हुए साथ-साथ आगे बढ़ें, यह बात ज्यादा मायने रखती है। आप शॉर्ट फिल्मों को देखें तो पाएंगे कि इनके जरिए बेहतरीन प्रतिभाएं सामने आ रही हैं। इन फिल्मों को छोटा मत मानिए, ये बहुत बड़ा काम करती हैं।' 

विस्तार ले रहा है शॉर्ट फिल्मों का बाजार:  

शॉर्ट फिल्मों को दर्शाने में अमेजॉन प्राइम वीडियो, डिज्नी प्लस हॉटस्टार जैसे प्लेटफॉर्म भी दिलचस्पी ले रहे हैं। शॉर्ट फिल्मों के मार्केट के संबंध में शान व्यास कहते हैं कि शॉर्ट फिल्म्स का मार्केट अभी विकसित हो रहा है। अपने देश में हमारा मूवी और लार्ज शॉर्ट फिल्म्स जैसे तीन या चार यूट्यूब बेस्ड प्लेटफॉर्म शॉर्ट फिल्म खरीदते और प्रोड्यूस करते हैं। यूट्यूब की पहुंच सबसे ज्यादा है। जब कभी फिल्मकारों को खरीददार नहीं मिलते तो मुफ्त में फिल्में यूट्यूब पर डाल देते हैं। हमारे यहां अब मनोरंजन क्षेत्र की नामी कंपनियां भी ऐसी फिल्मों की फंडिंग में रुचि दिखाने लगी हैं। शॉर्ट फिल्म्स के चैनल शॉट्र्स ने वॉयकॉम18 के साथ कंटेंट डील की है ताकि भारतीय शार्ट फिल्मों को बढ़ावा दिया जा सके। वर्तमान में  शॉर्ट्स टीवी के पास करीब 13 हजार भारतीय और इंटरनेशनल शॉर्ट फिल्मों की लाइब्रेरी है। शॉट्र्स टीवी डीटीएच प्लेटफॉम्र्स पर उपलब्ध है। 

संजीदगी से कहें कहानी:  

शॉर्ट फिल्म संक्षेप में कहानी कहने का माध्यम है, लेकिन उसकी गंभीरता पर मनोज बापजेयी जोर देते हैं। वह कहते हैं, 'मैं हमेशा लोगों से आग्रह करता हूं कि टाइम पास करने के लिए काम मत कीजिए। कहानी है तो उस पर काम कीजिए। आपके पास तकनीक है उसका सदुपयोग करें। कहानी लिखने में जितना समय दे सकते हैं दें, लेकिन उसके बाद समझौता मत करिए। इसमें लागत ज्यादा नहीं है। एक बनाइए लोगों की समीक्षा लीजिए, फिर बनाइए। ये आपको आगे बढऩे में मदद करेंगी।' 

फेस्टिवल्स से मिलती पहचान: 

शॉर्ट फिल्म बनाने के बाद अगर उसे यूट्यूब पर अपलोड नहीं किया जाता है तो फिल्म फेस्टिवल्स ही उनका मंच बनते हैं। जानकारों के मुताबिक फिल्म लोगों को पसंद आ रही है कि नहीं, फेस्टिवल से यह बात भी पता चलती है। इसके अलावा फिल्म फेस्टिवल आपकी फिल्मों की मार्केटिंग के लिए एक अच्छा प्लेटफॉर्म मुहैया कराते हैं। हालांकि शॉर्ट फिल्मों के निर्माण में समय सीमा का ध्यान रखना भी बहुत जरूरी होता है।  विभिन्न फिल्म फेस्टिवल में दिखाए जाने की समय सीमा भी अलग है। आरती कदव बताती हैं कि कई फिल्म फेस्टिवल में शॉर्ट फिल्म की समय सीमा बीस मिनट होती हैं। अगर उससे अधिक अवधि की फिल्म है तो वे आपकी फिल्म प्रदर्शन के लिए नहीं लेते हैं। बड़े इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स में आपका मुकाबला अन्य देशों की बेहतरीन शॉर्ट फिल्म्स के साथ होता है। अगर आपकी फिल्म को कान जैसे फिल्म फेस्टिवल में सराहा जाता है तो बतौर फिल्मकार यह उपलब्धि है।

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