स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। ‘ हाउसफुल 3’, ‘शादी में जरूर आना’, ‘तैश’ जैसी कई फिल्मों में अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुकीं कृति खरबंदा के लिए सिनेमा की राहें आसान नहीं थीं। उनके परिवार का फिल्मी दुनिया से कोई ताल्लुक नहीं रहा है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर कृति ने खुद से जुड़ी कई बातें बताईं। साथ ही महिलाएं कैसे खुद को सशक्त बना सकती हैं, इस पर अपनी राय जाहिर की।

सवाल : महिला होने के नाते आपने इस करियर के चुनाव में किन बाधाओं का सामना किया?

जवाब : चुनौतियां तो हर क्षेत्र में होती हैं, नौ से पांच बजे वाले काम में भी। मेरे लिए सबसे बड़ी बात थी कि लोग मुझे जान पाएंगे। मैं बेंगलूर के एक साधारण परिवार से हूं। आज गूगल पर टाइप करने पर मेरा नाम और मेरे बारे में जानकारी आती है। यह मेरे लिए सबसे बड़ी बात है। पहली फिल्म साइन करने के आठ महीने बाद मेरी फिल्म का एलान हुआ था। उन आठ महीनों में मैं रोज अपना नाम गूगल करती थी कि मेरा नाम आया कि नहीं। गूगल पर नाम आने में आठ महीने लग गए, उसके बाद मुझे कुछ फर्क ही नहीं पड़ा कि नीचे क्या लिखा होता है।

सवाल : इस क्षेत्र में आने के बाद महिला सशक्तीकरण के प्रति सोच में बदलाव हुआ है?

जवाब : बचपन से ही मेरे घर में लड़के और लड़की के बीच में कोई फर्क नहीं किया गया था। ऐसे में मुझे इस बात की जानकारी ही नहीं थी कि महिलाओं को अपने हक के लिए लड़ना पड़ता है। अब कभी-कभी मुझे इस बात पर शर्म आती है कि वास्तव में महिलाओं को अपने हक के लिए लड़ना पड़ता है। अगर हम महिलाएं खुद को और अपनी आने वाली पीढ़ियों को सिखाएंगे कि हम किसी से कम नहीं है तो जल्द ही महिला सशक्तिकरण शब्द हट जाएगा। इसकी शुरुआत किसी स्कूल से नहीं, बल्कि घर से होती है। घर पर ऐसा माहौल बनाए, जहां मम्मी और पापा को बराबर का हक मिले। जहां पर कोई किसी से ऊंची आवाज में बात न करें और न किसी औरत की आवाज दबाई जाए। जब तक घर से यह सीख शुरू नहीं होगी, तब तक कोई हमारी सोच बदल नहीं सकती।

सवाल : ऐसी कौन सी चीज थी, जिसने पहली बार आपको फेमिनिस्ट (महिलावादी) होने का अहसास कराया?

जवाब : मैं सिर्फ एक इंसान हूं और वही रहना चाहती हूं। महिलाओं के अधिकार के लिए लड़ने का यह मतलब नहीं कि हम उन्हें श्रेष्ठ साबित करें। हम क्यों लड़ रहे हैं? क्या पुरुष अपने हक के लिए लड़ते हैं? मैं महिलावादी नहीं हूं, बल्कि मैं समानता में यकीन करती हूं। अगर आप खुद को महिलावादी मानकर महिलाओं के हक के लिए लड़ती हैं, तो पहले से ही आपके दिमाग में एक मानसिक लड़ाई चल रही होती है। जब आप इस चीज में यकीन रखती हैं कि मैं बराबर हूं, तो कोई आप पर उंगली नहीं उठाएगा।

सवाल : आज के दौर में एक महिला का दूसरी महिला को आगे बढ़ाना कितना जरूरी है?

सवाल : बहुत जरूरी है, क्योंकि अगर हम एक-दूसरे को आगे बढ़ाने में साथ नहीं देंगे, तो लोग इसका इस्तेमाल हमें पीछे धकेलने में करेंगे। महिलाओं के लिए एक-दूसरे का सहयोग, प्यार और उत्साहवर्धन करना बहुत जरूरी है। अगर हम एक-दूसरे का उत्साहवर्धन नहीं करेंगे तो कौन करेगा।

सवाल : अगर आप को मौका मिले तो आप दुनिया की महिलाओं के लिए क्या चीजें बदलना चाहेंगी?

जवाब : मैं महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ाना चाहूंगी। उनको इस बात का अहसास हो कि वह दूसरों पर निर्भर नहीं हैं। आगे बढ़ने के लिए किसी और के प्रमाण की जरूरत नहीं है। खुद को सशक्त कीजिए, लोग अपने आप आपके पीछे चलेंगे। अपनी कमजोरी सिर्फ उसी इंसान के साथ साझा करें, जो उसका कभी फायदा नहीं उठाए। हर कोई हमारा शुभचिंतक नहीं होता। हम अकेले आए हैं और अकेले ही जाएंगे, ऐसे में खुद के लिए खड़े होना बहुत जरूरी है।

सवाल: किसी महिला के लिए अपनी ताकत पहचानने के क्या तरीके होते हैं?

जवाब : अपनी ताकत पहचानने के लिए अपने आप पर काम करना जरूरी है। उदाहरण के तौर पर मेरे लिए यह जानना जरूरी है कि मेरी कमजोरियां क्या हैं। अपनी कमजोरियों पर काम करना ही अपनी मजबूती को पहचानने का तरीका है। जैसे अगर मुझे पता चल जाए कि गुस्सा मेरी सबसे बड़ी कमजोरी है और मैं उस पर नियंत्रण सीख लूं, तो गजब का आत्मविश्वास बढ़ जाता है।

सवाल : आपके लिए अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के क्या मायने हैं?

जवाब : वुमनहुड का जश्न मनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस बहुत ही खास दिन है, लेकिन मैं मानती हूं कि हर दिन महिला दिवस होता है। हमसे बढ़कर काम कोई क्या काम कर लेगा। ऑफिस के साथ घर भी संभाल लेते हैं। महिलाएं नई जिंदगी को जन्म दे सकती हैं। हमें खुद को श्रेय देने की जरूरत है। बहुत ही सशक्त महिलाओं ने मेरा पालन-पोषण किया है। उनके बिना मैं कुछ नहीं हूं।

 

 

 

 

 

 

 

 

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