मुंबई, स्मिता श्रीवास्तव। आजादी का अमृत महोत्सव स्वाधीनता संग्राम की गौरवशाली स्मृतियों को सहेजने के साथ ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सत्य व अहिंसा के आदर्शों, स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग से आत्मनिर्भरता के सबक को आत्मसात करने की प्रेरणा देता है। महात्मा गांधी सिनेमा के पक्षधर नहीं थे, लेकिन उनके विचारों और आदर्शों को व्यापक रूप से पहुंचाने का काम सिनेमा ने बखूबी किया है। फिल्मों के अलावा गांधी को संगीत, रंगमंच, कविता, टेलीविजन शो, ग्राफिक उपन्यास और यहां तक कि रैप संगीत जैसी विभिन्न लोकप्रिय विधाओं में प्रदर्शित किया गया है। समकालीन संस्कृति न केवल गांधी और गांधीवाद को स्वीकार कर रही है, बल्कि उनके सामाजिक-राजनीतिक और व्यक्तिगत सिद्धांतों का भी प्रतिनिधित्व भी कर रही है। इसे रेखांकित करता स्मिता श्रीवास्तव का आलेख... 

देश की आजादी में अमूल्य योगदान देने वाले बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी जन नेता के रूप में महात्मा गांधी सर्वमान्य हैं, इसके बावजूद भारतीय सिनेमा के शुरुआती काल में भारतीय फिल्म निर्माता उन पर फिल्म बनाने से कतराते रहे। गांधी की अधिकांश प्रारंभिक स्क्रीन उपस्थिति व्यावसायिक मूल्य वाली फिल्मों के बजाय डाक्यूड्रामा की श्रेणी में थी। वर्ष 1921 में निर्देशक कांजीलाल राठौर ने कोहिनूर फिल्म कंपनी के लिए ‘भक्त विदुर’ का निर्देशन किया था। फिल्म के निर्माता द्वारकादास संपत और माणिक लाल पटेल थे। दोनों ने फिल्म में क्रमश: विदुर और कृष्ण की भूमिकाएं निभाई थीं। इस फिल्म में विदुर ने गांधी टोपी और खादी वस्त्र धारण किए थे। इस मूक फिल्म को देखने के लिए दर्शकों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। आलम यह था कि पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा था। इस फिल्म को ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था। आदेश में लिखा था, हमें पता है कि आप क्या कर रहे हैं? यह विदुर नहीं हैं, यह गांधी हैं और हम इसकी अनुमति नहीं देंगे।

न्यूजरील में गांधी

दुबले-पतले और फुर्तीले गांधी को पहली बार वर्ष 1922 की न्यूजरील में देखा गया था, जिसमें वह एक सभा को संबोधित कर रहे थे। एक अन्य न्यूजरील जिसका शीर्षक है ‘गांधी उपवास नया भारतीय संकट लाता है’, यह वर्ष 1932 में उनके अस्पृश्यता विरोधी प्रदर्शन के दौरान शूट किया गया था। 1944 में ए.के. चेट्टियार ने गांधी पर डाक्यूमेंट्री का निर्माण किया था। डॉक्यूमेंट्री का शीर्षक ‘महात्मा गांधी- 20वीं शताब्दी का पैगंबर’ था। गांधी को चित्रित करने का पहला गंभीर प्रयास 1963 में हालीवुड फिल्म ‘नाइन आवर्स टू रामा’ में किया गया था। यह फिल्म स्टेनले वोलपर्ड के उपन्यास पर आधारित थी। इस फिल्म में गांधी की हत्या से पहले उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे के जीवन के नौ घंटों को कैप्चर किया गया था। फिल्म में गांधी की भूमिका जे एस कश्यप ने निभाई थी। बाकी अहम किरदारों में अमेरिकन कलाकारों की मौजूदगी की वजह से यह फिल्म प्रभावित नहीं कर पाई थी। वर्ष 1982 में रिचर्ड एटनबरो ने फिल्म ‘गांधी’ का निर्माण किया। भारत सरकार के सहयोग से निर्मित इस फिल्म को पूरी दुनिया में प्रशंसा मिली थी। इसके बाद से भारतीय फिल्मकारों ने अपनी कहानियों में उन्हें महत्ता देना शुरू किया।

भारतीय सिनेमा में गांधी के व्यक्तित्व का चित्रण

वर्ष 1982 से 2020 के दौरान करीब 12 फिल्में आईं जिनमें गांधी को केंद्रीय किरदार या अहम किरदार के तौर पर प्रदर्शित किया गया। इनमें केतन मेहता निर्देशित ‘सरदार’, श्याम बेनेगल निर्देशित ‘द मेकिंग ऑफ द महात्मा’ और त्रिलोक मलिक निर्देशित ‘डा. बाबासाहेब आंबेडकर’ को सीमित व्यावसायिक तत्वों के साथ डॉक्यूड्रामा की तरह दर्शाया गया, जबकि फिल्म ‘हे राम’, ‘द लीजेंड ऑफ भगत सिंह’, ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’, ‘लगे रहो मुन्ना भाई’, ‘गांधी, माई फादर’ को कामर्शियल तरीके से बनाया गया, लेकिन गांधी पर दो फिल्में जो सबसे ज्यादा लोकप्रिय और प्रभाव पैदा करने में सफल रहीं उनमें रिचर्ड एटनबरो की फिल्म ‘गांधी’ और राजकुमार हिरानी निर्देशित ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ शामिल हैं। ‘गांधी’ मुख्य रूप से अंग्रेजी में बनी और भारत में हिंदी में डब करके रिलीज हुई। दोनों फिल्में पूरी तरह से अलग पृष्ठभूमि में सेट हैं, जिनमें गांधी के जीवन और शिक्षाओं के कई पहलुओं को चित्रित किया गया है। इन दोनों फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाया था।

यूं हुआ फिल्म ‘गांधी’ का निर्माण

लगभग 191 मिनट अवधि की फिल्म ‘गांधी’ में एटनबरो ने महात्मा गांधी को संपूर्णता में दिखाया था। उसमें गांधी की विचारधारा, नेतृत्व कौशल, मानवीय पहलू, व्यक्तिगत जीवन, आंतरिक संघर्ष, राजनीतिक जीवन के चित्रों को बहुत संजीदगी से तैयार किया गया था। गांधी पर फिल्म बनाने की शुरुआत तब हुई जब एटनबरो ने ब्रिटिश एशियाई मोतीलाल कोठारी से चर्चा की। इस संबंध में एटनबरो ने वर्ष 1963 में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी से मुलाकात की। तब नेहरू ने उनसे कहा था कि जो कुछ भी आप करो, उन्हें देवता मत समझो, यही हमने भारत में किया है। वह बेहद महान व्यक्तित्व के धनी थे। आमजन के आदर्श, उन्हें देवता नहीं बनाया जा सकता। अपने शोध के दौरान एटनबरो ने डी. जी. तेंदुलकर की पुस्तक ‘महात्मा-लाइफ आफ मोहनदास करमचंद गांधी’, लुई फिशर की पुस्तक ‘लाइफ ऑफ महात्मा गांधी’ और स्वयं गांधी द्वारा लिखी गई पुस्तकों का अध्ययन किया। लुई फिशर के काम से प्रेरणा लेते हुए निर्देशक ने अपनी फिल्म के लिए गांधी के चरित्र को विकसित करने के लिए तीन पटकथा लेखकों का सहयोग लिया। अंतिम स्क्रिप्ट जैक ब्रिली द्वारा लिखी गई थी जिसमें फिशर की कथा संरचना का मूल सार रखा गया था। 1980 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने निर्देशक द्वारा भेजी गई स्क्रिप्ट पढ़ी। जिसपर उन्होंने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि फिल्म को इसके निर्माताओं द्वारा ही बनाया जाना चाहिए।

सत्य और अहिंसा के विचार हैं सामयिक

गांधी जी के हथियार अहिंसा और सत्याग्रह का उपयोग आम जन से लेकर राजनेता आज भी अपनी मांगों का समर्थन किए जाने के लिए कर रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी मिसाल सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे का आंदोलन रहा। पांच अप्रैल, 2011 को सशक्त लोकपाल विधेयक की मांग को लेकर अन्ना हजारे ने आमरण अनशन किया था। इस आंदोलन की गूंज पूरी दुनिया में उठी। दिल्ली के जंतर मंतर पर अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते लोग गांधी की विचारधारा का अनुपालन करते हैं। फिल्मों में ‘सत्याग्रह’ में अमिताभ बच्चन का किरदार गांधीवादी है। उसमें आमरण अनशन, अहिंसा पर बल दिया गया है। आशुतोष गोवारिकर की ‘स्वदेस’ में फिल्म का नायक गांधी के विचारों से प्रभावित है। अन्य भाषाओं की फिल्मों में भी गांधी आते रहे हैं।

सफल जीवन की राह

गांधीगिरी को सर्वाधिक चर्चा में लाने वाली फिल्म ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ में राजकुमार हिरानी ने गांधी के ज्ञान को मुंबई के गैंगस्टर के चश्मे के जरिए दर्शाया है, जिसने गांधीवाद के मूल को अपनाया है। इस फिल्म का प्रभाव आज तक लोगों पर देखा जा सकता है। हालांकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गांधी के विचारों की स्वीकृति के पीछे उन विचारों की महानता ही है। गांधी के आदर्श हर दौर में प्रासंगिक रहे हैं, जिन्हें जीवन में उतारकर हम सफल व सुखी हो सकते हैं।

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