नई दिल्ली, जेएनएन। पर्दे पर दिलीप कुमार और मधुबाला की बेधड़क मोहब्बत ने ना जाने कितने दिल धड़काए हैं। पर्दे पर इश्क़ करते-करते असल ज़िंदगी में भी इनकी मोहब्बत के किस्से ख़ूब मशहूर हुए, मगर सात साल तक कोर्टशिप में रहने के बावजूद मोहब्बत को मंजिल ना मिली। 

अक्सर यह देखा गया है कि सिनेमा के पर्दे पर मोहब्बत के गुल खिलाने वाले सितारों को निज़ी ज़िंदगी में इश्क़ ने मायूस किया है। मोहब्बत के मखमली एहसास को कई पीढ़ियों के दिलों में जगाने वाले जोड़े चाहकर भी असल ज़िंदगी में एक नहीं हो पाये। हिंदी सिनेमा के इतिहास में ऐसी कई कहानियां दर्ज़ हैं, जिनका क्लाइमैक्स ट्रेजिक रहा। 

1951 की फ़िल्म तराना की शूटिंग के दौरान दिलीप कुमार और मधुबाला के बीच इश्क़ के ख़ूबसूरत एहसास ने अंगड़ाई ली। सात साल तक दोनों रिलेशनशिप में रहे, मगर एक ग़लतफ़हमी की वजह से मधुबाला से उनका रिश्ता टूट गया। सिनेमा की दुनिया में यह बात भी प्रचलित है कि मधुबाला के पिता अताउल्ला ख़ान की वजह से दिलीप कुमार और मधुबाला की रिलेशनशिप टूटी। मधुबाला के साथ अपनी रिलेशनशिप का ज़िक्र दिलीप कुमार ने अपनी बायोग्राफी में विस्तार से किया है।

मधुबाला को उनकी मोहब्बत से एतराज़ ना था, मगर शादी के लिए उनकी शर्त दिलीप कुमार को मंज़ूर नहीं थी। मधुबाला के पिता एक प्रोडक्शन कंपनी चलाते थे और वो चाहते थे कि शादी के बाद दिलीप कुमार और मधुबाला उनकी ही फ़िल्मों में काम करें, जिसके लिए दिलीप साहब तैयार नहीं हुए।

हिंदी सिनेमा की मैग्नम ओपस ‘मुग़ले-आज़म’ का एलान 50 के दशक में उसी वक़्त हुआ था, जब दोनों की मोहब्बत परवान चढ़ रही थी। मगर, इस फ़िल्म के पूरा होते-होते दोनों अजनबी बन चुके थे। इसके बाद दोनों ने कभी साथ में काम नहीं किया। बायोग्राफी में एक जगह दिलीप साहब ने ज़िक्र किया- ''मुग़ले-आज़म के प्रोडक्शन के दौरान ही हमारी बातचीत बंद हो गयी थी। फ़िल्म के उस क्लासिक दृश्य, जिसमें हमारे होठों के बीच पंख आ जाता है, के फ़िल्मांकन के समय हमारी बोलचाल पूरी तरह बंद हो चुकी थी।'' प्यार किया तो डरना क्या का नारा आशिक़ों को देने वाली इस जोड़ी की मोहब्बत अधूरी रह गयी।

मधुबाला की मोहब्बत में दिलीप कुमार के टूटे दिल को सायरा बानू ने पनाह दी। इश्क़ के उफ़ान ने दोनों की उम्र में 22 साल फ़ासला भी मिटा दिया। इन दोनों की शादी आज भी एक मिसाल है। 

Posted By: Manoj Kumar

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