- अजय ब्रह्मात्मज

8 अगस्त को धर्मेन्द्र ने इन्स्टाग्राम पर अपनी एक तस्वीर लगायी थी,जिसमें वे नाचने की मुद्रा में हैं और साथ में लुंगी-कुरते में खड़े रामानंद सागर बांसुरी बजा रहे हैं। तस्वीर के साथ धर्मेन्द्र ने लिखा था, ''ट्यून मिल जाए तो आलम कुछ यों होता है। रामानंद सागर के साथ मैंने ‘आंखें',’चरस' और कुछ दूसरी ग्रेट फिल्में बनायीं।'' आज उनमें से एक ग्रेट फिल्म ‘आंखें' की बात करते हैं। 15 अगस्त को रीमा कागटी की ‘गोल्ड’ और मिलाप मिलन जावेरी की ‘सत्यमेव जयते’ रिलीज हुई हैं। दोनों देशप्रेम की भावना जगा रही हैं। ‘गोल्ड’ हॉकी में आजाद भारत के पहले गोल्ड मैडल की कहानी है तो ‘सत्यमेव जयते’ में भ्रष्टाचार मिटाने की बात है।

इन दोनों फिल्मों के साथ ही 50 साल पहले 1968 में रिलीज हुई रामानंद सागर की ’आंखें' को याद करते हैं। यह उस साल की सफलतम फिल्म थी। अनेक पुरस्कारों से नवाजी गयी। जासूसी की थीम पर बनी यह हिंदी की पहली फिल्म थी, जो देश की रक्षा और राष्ट्रप्रेम की बात करती है। माला सिन्हा और धर्मेन्द्र मुख्य भूमिकाओं में थे। फिल्म की शुरुआत होती है… उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता, जिस मुल्क की सरहद की निगेहबान हैं आंखें…। एक हथेली की छांव में ताजमहल, सारनाथ के द्वार और अन्य मोनुमेंट दिखाई पड़ते हैं और फिर एक आकृति उभरती है। साथ में ऊपर लिखी पंक्तियां सुनाई पड़ती हैं। मोहम्मद रफ़ी के स्वर में गूंजते इस गीत में आजाद देश के आत्मबल और आत्मविश्वास का प्रभावशाली सन्देश था।

50 साल पहले इस गीत की गूंज ने राष्ट्रवाद का संचार किया था। आज भी इस गीत के बोल और जासूसी के कारनामों से भरी देशभक्ति की यह फिल्म दर्शकों को याद है। देश को आजाद हुए अभी 21 साल हुए थे। विदेशी ताकतें तोड़-फोड़ और विस्फोट की घटनाओं से नागरिकों में असंतोष पैदा कर देश को अस्थिर करने में लगी थीं।फिल्म में खलनायक विदेशी एजेंट का संवाद है, ''हिंदुस्तान को एजिटेशन का रोग लग चुका है। जहां भी एजिटेशन होता है, हमारे आदमी बम फेंक कर चले आते हैं। पुलिस अपनी जनता पर गोली चलती है। पब्लिक भड़क उठती है।'' सीन बदलता है। नायक सुनील जासूस के पिता बताते हैं कि ‘बड़ी बड़ी ताकतें हिंदुस्तान की डेमोक्रेसी और प्रजातंत्र को ख़त्म करना चाहती हैं। उन्होंने हिंदुस्तान के चारों तरफ जाल फैला रखा है। हथियार सप्लाई कर रहे हैं।'' वे यह भी बताते हैं कि हमें मालूम है कि हथियार किस मुल्क से आते हैं? यहां मुल्क का नाम नहीं लिया जाता।

सुनील को बेरुत जाकर अपने जासूस से मिल कर विदेशी ताकतों के सदर मुकाम और भारत में एक्टिव एजेंटों का पता करना है। याद करें, भारतीय समाज में यह उथल-पुथल और राजनीतिक उपद्रव का समय था। 1967 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में पहले के चुनावों जैसी विजय नहीं मिली थी। सात राज्यों में पहली बार कांग्रेस की हार हुई थी। चौथी पंचवर्षीय योजना में देश की आर्थिक प्रगति बहुत कम हुई थी। उसी साल अगस्त-सितम्बर में नाथू ला में भारत-चीन झड़प में चीन को हार के साथ अपने सैकड़ों जवानों की जान गंवानी पड़ी थी।(इसी पृष्ठभूमि पर जे पी दत्त की फिल्म ‘पलटन' आ रही है) अपनी हार से बौखलाए चीन ने भारत में उत्पात मचाना शुरू किया था।

‘आंखें’ के पहले ही दृश्य में असम के इलाके में एक ट्रेन आती दिखाई देती है। ट्रेन में विस्फोट होता है और उसके डब्बों के परखच्चे उड़ जाते हैं। अगले ही सीन में हम देखते हैं कि मेजर ने इमरजेंसी बैठक बुलाई है। यहां उनके दो पुराने साथी भी बैठे हैं। ये तीनों कभी आजाद हिन्द फ़ौज में नेताजी के साथ थे। असम के ट्रेन विस्फोट से बात आरम्भ होती है। मेजर साहेब बताते हैं कि हमारी ख़ुफ़िया ख़बरों को अब सरकार भी मान गयी है। वह हमें हर मदद देने को तैयार है। हमें दुश्मनों की गतिविधियों पर रोक लगाने के साथ उन्हें खत्म भी करना है। उन दिनों शायद सरकारी एजेंसियां प्राइवेट संगठनों के साथ मिल कर देश की रक्षा-सुरक्षा की गतिविधियां करती हों।

रामानंद सागर की जासूसी और देशभक्ति की भावना की यह फिल्म आज बचकानी लग सकती है, लेकिन 50 साल पहले इसने तहलका मचा दिया था। फिल्म में कंट्रोल पैनल, वायरलेस फ़ोन, ऑटोमेटिक दरवाज़े, खिसकती दीवारों के साथ ही मॉडर्न उपकरणों ने दर्शकों को हैरतअंगेज आनंद दिया था। फिल्म के सभी गीत बेहद लोकप्रिय हुए थे। लेखन और प्रस्तुति के लिहाज से अपने समय की इस महंगी फिल्म की शूटिंग भारत के साथ लेबनान और जापान में हुई थी। तब की लोकप्रिय हीरोइन माला सिन्हा लीड में थीं। ‘फूल और पत्थर' से पहचान में आये धर्मेन्द्र को रामानंद सागर ने माला सिन्हा के साथ मौका देकर बड़ा रिस्क लिया था। इस फिल्म में स्क्रीन पर पहला नाम माला सिन्हा का ही आता है। हालांकि इस फिल्म में अनेक रोमांटिक गीत भी थे, लेकिन धर्मेन्द्र को गाने के लिए एक भी गीत नहीं मिला था। तब तक धर्मेंद्र नाचने और गाने से परहेज करते थे।

’फूल और पत्थर' से मिली धर्मेन्द्र की ‘हीमैन’ की छवि को सागर ने भुनाया था। उन्हें स्मार्ट जासूस की भूमिका दी थी, जो थोड़े एक्शन सीन भी करता है। चुस्त पटकथा और सहज ही सीन बदलने के लिहाज से यह फिल्म लेखकों को देखनी चाहिए। फिल्म लगातार अलग-अलग स्थानों और किरदारों को फ्रेम में लाती है। हर बार किसी न किसी पात्र के ज़िक्र के साथ कैमरा वहां पहुंच जाता है। कहानी रोचक है। सुनील के पिता आजाद हिन्द फ़ौज के सिपाही मेजर दीवान साहेब ने अपने सरदार दोस्त सरदार इशर सिंह और मुसलमान दोस्त अशफाक के साथ कसम खायी है कि जब तक जिंदा रहेंगे अपने वतन को अपनी मां समझ कर उसकी बेहतरी और हिफाजत के लिए जान की बाजी लगा देंगे।

फिल्म में अनेक नाटकीय मोड़ हैं,जहां एक ही परिवार के दो बेटों में एक देशभक्त और दूसरा दुश्मनों से मिल जाता है। कहानी में ऐसा मोड़ आता है कि पिता ही दूसरे बेटे को गोली मार देते हैं। फिल्म में नायिका माला सिन्हा भी जासूस हैं, जो जापानी मां और हिन्दुस्तानी पिता की बेटी हैं। वह पहली नज़र में ही सुनील से मोहब्बत कर बैठती हैं और उन्हें बताती है ‘मिलती है ज़िन्दगी में मोहब्बत कभी-कभी'। सुनील के लिए देश की मोहब्बत ज्यादा ज़रूरी है। पचास साल पहले बनी इस फिल्म को अनेक पुरस्कारों से नवाज़ा गया था।

Posted By: Manoj Vashisth