अनंत विजय, मुंबई ब्यूरो। स्व. संजीव कुमार पहले ऐसे अभिनेता थे, जिन्होंने किसी हिंदी फिल्म में पहली बार नौ रोल किए थे। 9 जुलाई, 1938 को जन्मे संजीव कुमार अपनी संजीदगी भरी अदाकारी से सभी के दिलों पर ऐसी छाप छोड़ देते कि कोई भी एक बार उनकी फिल्म देखने के बाद भूल नहीं पाता था।

संजीव कुमार के लिए मील का पत्थर साबित हुई थी शोले

अभिनेता संजीव कुमार की बात हो तो दो फिल्मों और उनके बनने के दौर के कई दिलचस्प प्रसंग याद आते हैं। एक फिल्म थी रमेश सिप्पी की ‘शोले’ और दूसरी के. आसिफ की ‘मोहब्बत और खुदा’। ‘शोले’ समय पर रिलीज हो गई, लेकिन ‘मोहब्बत और खुदा’ कई वर्षों बाद रिलीज हो सकी। पहले तो गुरुदत्त के निधन की वजह से रुकी, फिर के. आसिफ की मृत्यु की वजह से इसे पूरा होने में समय लगा। जब ‘शोले’ की शूटिंग हो रही थी उस वक्त संजीव कुमार और हेमा मालिनी के रोमांस के किस्से फिल्मी पत्रिकाओं में छाए रहते थे।

जब गब्बर के रोल के लिए अड़ गए धर्मेंद्र 

‘शोले’ की शूटिंग के दौरान इन चर्चाओं से बचने के लिए संजीव कुमार उस होटल में नहीं रुके थे जिसमें धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन समेत शेष कलाकार ठहरे थे। वो अलग होटल में रहते थे। जब शूटिंग शुरू हुई तो एक दिन धर्मेंद्र को लगा कि इस फिल्म का असली हीरो तो गब्बर सिंह है। वो रमेश सिप्पी के पास पहुंचे और जिद करने लगे कि उनको वीरू का नहीं गब्बर सिंह का रोल करना है। रमेश सिप्पी ने काफी समझाया, लेकिन धर्मेंद्र मानने को तैयार नहीं थे। अचानक रमेश सिप्पी राजी हो गए और बोले, ‘ठीक है, गब्बर का रोल आप कर लो। मैं वीरू की भूमिका संजीव कुमार को दे देता हूं, पर सोच लो फिल्म में वीरू और बसंती की जोड़ी है और संजीव कुमार और हेमा मालिनी फिल्म में रोमांस करते नजर आएंगे।’

फिर हेमा मालिनी संग रोमांस करते संजीव कुमार

इतना सुनना था कि धर्मेंद्र फौरन बोले, ‘नहीं-नहीं, मेरे लिए वीरू की भूमिका ही ठीक है।’ मिहिर बोस ने अपनी पुस्तक ‘बालीवुड’ में इस दिलचस्प प्रसंग का उल्लेख किया है। बाद के दिनों में जो हुआ वो सभी को पता है। जब हेमा मालिनी से संजीव कुमार और उनके रोमांस के बारे में पूछा गया था तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा था कि ‘वह बेहद व्यक्तिगत और जटिल मामला था’।

संजीव कुमार तीन घंटे घूरते रहे थे के. आसिफ

गुरुदत्त के निधन के कई सालों बाद जब के. आसिफ ने ‘मोहब्बत और खुदा’ की शूटिंग करने का फैसला लिया तो उनके सामने अभिनेता के चयन की समस्या थी। उस समय तक संजीव कुमार थियेटर में नाम कमा रहे थे। के. आसिफ के किसी दोस्त ने फिल्म की उस भूमिका के लिए संजीव कुमार का नाम सुझाया। दोनों मिले और के. आसिफ ने संजीव कुमार को फिल्म के सेट पर बुलाया। अगले दिन संजीव कुमार फिल्म के सेट पर पहुंचे तो के. आसिफ ने उनको तैयार होने के लिए कहा और अपने कमरे में चले गए। संजीव कुमार शूटिंग के लिए तैयार होकर सेट पर बैठ गए। के. आसिफ कमरे से सेट पर बैठे संजीव कुमार को देख रहे थे, जो बेचैन हो रहे थे। के. आसिफ यही चाहते थे। वो संजीव कुमार के चेहरे के भावों को पढ़ रहे थे। करीब तीन घंटे बाद के. आसिफ अपने कमरे से निकले और संजीव कुमार को गले लगा लिया। उनको अपनी फिल्म का हीरो मिल गया था।

 कभी नहीं की छवि की चिंता 

दरअसल संजीव कुमार हिंदी फिल्मों के ऐसे नायक थे जिनकी आंखें भी अभिनय करती थीं। उनके चेहरे के भाव और आंखों की भाषा दर्शकों से संवाद करती थी। तब संजीव कुमार इकलौते ऐसे अभिनेता थे जो किसी भी रोल में खुद को ढाल लेते थे। वो छवि के गुलाम नहीं थे। ए. के. हंगल की शागिर्दी में थियेटर करने वाला यह अभिनेता जब फिल्मों में आया तो वो रूपहले पर्दे की अपनी छवि के चक्कर में नहीं पड़ा। उनके लिए किरदार महत्वपूर्ण होता था। यह साहस संजीव कुमार ही कर सकते थे कि ‘परिचय’ में जया बच्चन के पिता की भूमिका निभाई तो ‘अनामिका’ में जया बच्चन के प्रेमी की। दर्शकों ने दोनों भूमिकाओं में उनको खूब पसंद किया। ‘शोले’ में तो वो जया बच्चन के श्वसुर की भूमिका में थे। फिल्म ‘नया दिन नई रात’ में तो उन्होंने नौ अलग-अलग चरित्रों को पर्दे पर साकार कर दिया था।

गुजराती कारोबारी परिवार से जब वे रंगमंच पर पहुंचे तो इनका नाम हरिभाई जेठालाल जरीवाला था। थियेटर से फिल्म जगत में पहुंचे तो हरिभाई संजीव कुमार हो गए। संजीव कुमार को कम उम्र मिली, लेकिन अपनी अभिनय क्षमता से भारतीय फिल्मों को समृद्ध कर गए।