स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। करीब दो साल पहले रिलीज हुई ओम राउत द्वारा निर्देशित 'तान्हाजी: द अनसंग वारियर' में 17वीं शताब्दी के मराठा योद्धा और छत्रपति शिवाजी महाराज के सेनापति सूबेदार तानाजी मालुसरे की कहानी बताई गई थी। अमृत महोत्सव के मौके पर इस फिल्म से जुड़े किस्सों को ओम राउत ने साझा किया।

तानाजी मालुसरे को 1670 में सिंहगढ़ की लड़ाई के लिए सर्वाधिक स्मरण किया जाता है, जिसमें उन्होंने मुगल किला रक्षक उदयभान राठौर के खिलाफ आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ी थी। मैंने वर्ष 2006 में अपने दोस्तों के साथ जैक नाइडर द्वारा निर्देशित फिल्म ‘300’ देखी थी। इसकी कहानी यूनानी राजा लियोनायडिस के इर्द-गिर्द घूमती है। तब मैं न्यूयार्क में काम करता था। हम लोग प्राचीन यूनानी संस्कृति के बारे में ज्यादा नहीं जानते थे। तब हमारे ग्रीक मूल के एक मित्र ने फिल्म देखने जाने से पहले लियोनायडिस के बारे में बहुत कुछ बताया था।

फिल्म देखने के बाद मैंने ठान लिया कि हमारे सेनापति सूबेदार तानाजी मालुसरे की वीरगाथा को मैं इस तरह पेश करूंगा कि सबको उनके बारे में पता चले। बैटल आफ सिंहगढ़ का किस्सा हमारे स्कूल की किताबों में है, किंतु इसकी अहमियत बहुत ज्यादा है। तभी मैंने सिनेमा के जरिए उस गौरवगाथा को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की।

तकनीक से हुआ संभव

इस फिल्म के लिए इतिहासकार शीतल ताई मालुसरे से काफी मदद मिली। शीतल ताई, मालुसरे परिवार से ही हैं। उन्होंने तानाजी पर ही पीएचडी की है। उनके पास से बहुत सारी जानकारी मिली। इस फिल्म को स्टूडियो में शूट किया गया है। 16वीं-17वीं शताब्दी को समुचित तरीके से दर्शाने के लिए यह जरूरी था ताकि हम तकनीक की मदद से लुक और फील के मामले में करीब जा सकें। उस जमाने में लाइट तो थी नहीं, लोग चांद की रोशनी में यात्रा करते थे, महलों में सुरक्षा व्यवस्था करते थे। उस सबको समुचित तरीके से दर्शाना स्टूडियो में शूट करके ही संभव था। हमारे लिए बड़ा चैलेंज यह था कि जो विजुअल हम जिस तरह पेश करना चाहते हैं उसे वैसा ही कर पाएं।

समझा युद्ध शैली का अंतर

हमने सबसे ज्यादा फोकस तानाजी मालुसरे की फाइटिंग की स्टाइल पर किया। उदाहरण के लिए, मराठाओं और मुगलों की तलवारबाजी में काफी अंतर होता है। मुगलों की तलवार बहुत बड़ी होती थी और मराठों की तलवारों का वजन व धार उनसे अलग होता था। तानाजी मालुसरे की लड़ाई की शैली भी काफी अलग थी। उदयभान मुगल सेना का किलेदार था, असल में वह राजपूत था। सो, उसने दोनों शैलियों को सीखकर किस तरह से अपनी युद्ध कला विकसित की होगी, उस डिटेलिंग पर हमने एक्शन कोरियोग्राफर के साथ मिलकर काफी काम किया था।

कमजोर कड़ी पर करारा वार

उस समय मराठा सेना दस हजार से अधिक नहीं थी जबकि मुगल सेना लाखों में थी। इसलिए मराठों ने उन्हें टक्कर देने के लिए गुरिल्ला वार को बहुत ज्यादा इस्तेमाल किया। इसमें लड़ाई प्रत्यक्ष रूप से न करके परोक्ष रूप से की जाती है। इस युद्ध की खास बात यह है कि गिनती में कम होने के बावजूद दुश्मन यह जान ही नहीं पाते थे कि सिपाही कहां से आए, हमला करके कहां चले गए। वे दुश्मन का कमजोर प्वाइंट पकड़कर हमला करते थे। हमला करते समय उनकी तकनीक भी अलग होती थी।

बेहतर कास्टिंग से हुआ सपना सच

इस फिल्म में तानाजी मालुसरे के लिए अजय देवगन सर हमेशा से मेरी पहली पसंद थे। छत्रपति शिवाजी तानाजी मालुसरे को अपना एक गढ़ मानते थे। उसी तरह अजय सर अपने आप में गढ़ हैं। अजय सर असल जीवन में बेहतरीन घुड़सवार हैं। किरदार निभाने के साथ ही उन्होंने इस फिल्म को प्रोड्यूस करने की भी जिम्मेदारी ली। उनकी वजह से मेरा यह सपना पूरा हो पाया। देश ही नहीं विदेश में भी हम इन अज्ञात योद्धाओं की कहानी बता पाए।

जब हम उदयभान कास्ट कर रहे थे तो हमें बहुत ही स्ट्रांग कलाकार चाहिए था। सैफ सर के साथ मीटिंग हुई, उसके बाद उन्होंने किरदार निभाने की स्वीकृति दी। उसके बाद उन्होंने जो रिजल्ट दिया तो समझ आया कि वो मुझसे इतनी बार मिलकर किरदार की बारीकियां क्यों समझ रहे थे। इसके अलावा महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी महाराज भगवान तुल्य हैं। उनके किरदार के लिए वैसे ही कलाकार की जरूरत थी। किसी ने शरद केलकर का नाम सुझाया। वह उस समय विदेश में शूटिंग कर रहे थे। मुंबई एयरपोर्ट से वह सीधे फिल्मिस्तान स्टूडियो आए। जब वह कास्ट्यूम के साथ तैयार होकर आए तो मैंने एक सेकेंड में तय कर लिया कि यही हमारे राजा हैं।

आखिरी सांस तक जारी रखी लड़ाई

फिल्म के क्लाइमेक्स में युद्ध के दौरान तानाजी मालुसरे का हाथ कट जाता है। तब वह कटे हाथ पर पगड़ी का कपड़ा लपेटकर उदयभान के साथ लड़ाई जारी रखते हैं। यह वाकया हमारे इतिहास में विख्यात है कि अपना हाथ गंवाने के बाद भी उन्होंने अपने लक्ष्य को छोड़ा नहीं। घर में बेटे की शादी को छोड़कर उन्होंने अपने राष्ट्र और राजा के प्रति कर्तव्य को प्राथमिकता दी और उसे पूरा करने में जान न्यौछावर कर दी। इस सीन को समुचित तरीके से दिखाना बहुत जरूरी था, क्योंकि यह हमारे इतिहास का हिस्सा है। इसीलिए सेंसर बोर्ड ने भी इसमें आपत्ति नहीं की थी। 

Edited By: Vaishali Chandra