मुंबई। अभिनेता सैफ अली खान भले ही अपनी इमेज से हटकर कुछ किरदार आए दिन करते रहते हों, लेकिन उन्हें अपनी मसाला फिल्में पसंद नहीं हैं। वे ऐसी फिल्में सिर्फ इस वजह से करते हैं, क्योंकि उन्हें बॉक्स ऑफिस का ध्यान रहता है। वे नहीं चाहते हैं कि उनकी टीम से जुड़े किसी भी आदमी या टेक्नीशियन को आर्थिक तौर पर कोई नुकसान हो। बात जब उनके प्रोडक्शन हाउस से फिल्म बनने की होती है, तो सैफ की ये जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। वे भले बाहर के निर्माताओं के लिए चूजी भूमिकाएं करें, लेकिन अपने होम प्रोडक्शन की फिल्मों के लिए वैसा ही काम करेंगे, जिसमें ईजी रिटर्न होगा। सैफ का कहना है, 'इंडियन ऑडियंस आज भी उतनी मैच्योर नहीं हुई है, जितनी वेस्ट की ऑडियंस। उन्हें आज भी सेंसलेस और मीनिंगलेस चीजों में मजा आता है।

गानों को लेकर भी ऑडियंस का टेस्ट दिनोंदिन बिगड़ता जा रहा है। इसी वजह से मजबूरी में हमें आइटम सॉन्ग जैसी चीजें परोसनी पड़ती हैं। मैं आइटम गीतों के खिलाफ नहीं हूं, लेकिन वे सिचुएशनल होने चाहिए। 'एजेंट विनोद' का गाना लोगों को याद होगा 'यूं तो प्रेमी पचहत्तर हमारे..'।

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वह गाना हमने सिचुएशन के हिसाब से ही फिल्मों में यूज किया था। फिल्म की कहानी की डिमांड था वह गाना, जो हमने निर्देशक से बातचीत के आधार पर फिल्म में डाला था, लेकिन आजकल आइटम गानों का ढर्रा बिल्कुल भी फिल्मों के हिसाब से नहीं है। निर्माताओं को पैसे बनाने हैं और उन्होंने सौ करोड़ क्लब का हिस्सा बनना है। इस क्लब में भी मैं किसी निर्माता की उतनी गलती नहीं मानता। जो आदमी कुछ पैसे इन्वेस्ट करेगा, जाहिर तौर पर वह सोचेगा कि वह निवेश किए गए पैसों से अधिक कमा सके और इन पैसों को कमाने के लिए वह हर किस्म की जोड़-तोड़ करेगा। मसाला फिल्में भी इसी वजह से बनती हैं कि इसमें एक निर्माता को ईजी रिटर्न समझ में आता है। उसे लगता है कि फिल्म तीन दिन तक चला लो तो पूरे पैसे सोमवार तक वापस आ जाएंगे। मेरा मानना है, जब तक ऑडियंस रिजेक्ट करना नहीं सीखेगी, तब तक उन्हें यह शिकायत करने का हक नहीं है कि अच्छा काम नहीं हो रहा है।'

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