मुंबई। पाकिस्तान में भारतीय फ़िल्मों को बैन करने की रफ़्तार तेज़ हुई है। बात-बात पर बॉलीवुड फ़िल्म की रिलीज़ को रोक दिया जाता है। बैन की ताज़ा शिकार बनी है 'वीरे दी वेडिंग', जिसे अभद्र भाषा और आपत्तिजनक संवादों के आरोप में बैन किया गया है। 2018 में ये तीसरी भारतीय फ़िल्म है, जिस पर पाकिस्तान ने अपने यहां प्रतिबंध लगाया है।

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो जब पाकिस्तान के सेंसर बोर्ड ने फ़िल्म देखी तो सभी सदस्यों ने एकमत से इस पर रोक लगाने का फ़ैसला किया। वहीं, वितरकों ने भी फ़िल्म को सर्टिफाई करने के लिए दी गयी अर्ज़ी वापस ले ली। हालांकि, फ़िल्म की लीड स्टार कास्ट वीरे दी वेडिंग को प्रगतिशील फ़िल्म बताती है। इसके पीछे उनके अपने तर्क हैं। हालांकि भारत में भी फ़िल्म को एडल्ड सर्टिफिकेट दिया गया है। शशांक घोष निर्देशित वीरे दी वेडिंग All Women फ़िल्म है, जिसके सभी मुख्य पात्र फीमेल हैं। इन चरित्रों को करीना कपूर, सोनम कपूर, स्वरा भास्कर और शिखा तलसानिया ने निभाया है। सुमित व्यास, करीना के प्रेमी का किरदार निभा रहे हैं।

फ़िल्म आज़ाद ख्याल लड़कियों की ज़िंदगी को नज़दीक से दिखाती है, जिसमें अपनी किसी भी पसंद या नापसंद को लेकर बेचारगी या हीनता का भाव नहीं होता। वैसे तो कथ्य की ज़रूरत के हिसाब से भारतीय फ़िल्मों की नायिका पहले भी पर्दे पर गाली देती रही है, मगर इतना भाषा का इतना खुलापन संभवत: पहली बार है। संवादों में भी किरदारों की आज़ाद ख्याली झलकती है। फ़िल्म एक जून को रिलीज़ हो रही है।

देश में 100 करोड़ से अधिक कारोबार कर चुकी मेघना गुलज़ार की 'राज़ी' भी पाकिस्तान में रिलीज़ नहीं हो सकी, जिसमें आलिया भट्ट ने लीड रोल निभाया। इस फ़िल्म को बैन करने की वजह इसकी कहानी बनी। आलिया को कश्मीरी लड़की दिखाया गया है, जिसे 1971 भारत-पाक युद्ध के दौरान जासूसी के लिए पाकिस्तान भेजा जाता है। ये फ़िल्म हरिंदर सिक्का के नॉवल कॉलिंग सहमत पर आधारित है। शायद पाकिस्तान इस सच्ची घटना को भुला देना चाहता है।

इसी साल आयी नीरज पांडेय की फ़िल्म 'अय्यारी' इसलिए प्रतिबंधित की गयी थी, क्योंकि इसमें भारतीय सेना को पृष्ठभूमि में दिखाया गया है। फ़िल्म के दोनों मुख्य किरदार मिलिट्री इंटेलीजेंस के अफ़सर हैं, मगर फ़िल्म की कहानी का पाकिस्तान से कोई लेना-देना नहीं है। बल्कि ये तो भारतीय राजनीतिक सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार को ही रेखांकित करती है। कथ्य में पाकिस्तान को लेकर किसी प्रकार की टीका-टिप्पणी नहीं की गयी है। फिर भी फ़िल्म बैन हुई।

पाकिस्तान हिंदी फ़िल्मों के लिए ठीक-ठाक बाज़ार माना जाता है। इसीलिए जब भी कोई भारतीय फ़िल्म वहां बैन की जाती है तो चर्चा होना लाज़िमी है। पिछले कुछ सालों में भारतीय फ़िल्मों के लिए पाकिस्तान की 'संवेदनशीलता' कुछ ज़्यादा ही बढ़ गयी है, जिसके साथ वहां बैन की जाने वाली फ़िल्मों की तादाद में भी इजाफ़ा हुआ है। मगर, कुछ फ़िल्मों को प्रतिबंधित करना ना सिर्फ़ चौंकाता है, बल्कि वहां के हुक्मरानों के ज़हनी पिछड़ेपन को भी ज़ाहिर करता है। 

छवि के नाम पर बैन

वैसे जहां भी आतंकवाद का ज़िक्र आता है, पाकिस्तानी सेंसर बोर्ड के कान खड़े हो जाते हैं और फ़िल्म की रिलीज़ रोकने की यथासंभव कोशिशें होने लगती हैं। चोर की दाढ़ी में तिनका? 2017 में आयी 'नाम शबाना' को कुछ दृश्य हटाने के बाद रिलीज़ की अनुमति मिल गयी थी, मगर इस्लामाबाद के एक सिनेमाघर में फ़िल्म का प्रदर्शन अनिवार्य एडिटिंग के बिना ही कर दिया गया, जिसके बाद सेंसर बोर्ड ने पूरे पाकिस्तान में फ़िल्म पर प्रतिबंध लगा दिया था। 2015 में आयी नीरज की फ़िल्म 'बेबी' का पाकिस्तान में बैन होना फिर भी तर्कसंगत लगता है, क्योंकि दुनियाभर में वांछित एक आतंकवादी सरगना को भारतीय एजेंटों द्वारा पकड़कर लाए जाने की कहानी पर बनी ये फ़िल्म पाकिस्तान को आईना दिखाती है।

पाकिस्तान का कहना था कि फ़िल्म मुसलमानों की नकारात्मक छवि पेश करती है और इससे ऐसा संदेश जाता है, जैसे कि सारे मुसलमान आतंकवादी हों। सैफ़ अली ख़ान की 'फैंटम' और 'एजेंट विनोद' पाकिस्तानी अवाम तक नहीं पहुंच चुकीं, क्योंकि हुक्मरानों को इन फ़िल्मों की कहानी हजम नहीं हुई। 2012 में आयी 'एजेंट विनोद' में सैफ़ अली ख़ान भारतीय इंटेलीजेंस के ऑपरेटिव बने थे। पाकिस्तान को ये फ़िल्म इसलिए पसंद नहीं आयी, क्योंकि पाकिस्तान के उच्चाधिकारियों को तालिबान समर्थक दिखाया गया था। 2015 की फ़िल्म 'फैंटम' में सैफ़ एक बार फिर भारतीय स्पाय एजेंट बने दिलचस्प बात ये है कि इस फ़िल्म को पाकिस्तान की एक अदालत के आदेश पर प्रतिबंधित किया गया था।

 

मोस्ट वांटेड आतंकी और मुंबई हमलों के मास्टर माइंड जमात-उद-दावा के मुखिया हाफ़िज़ सईद ने इसे बैन करने के लिए याचिका दायर की थी। आरोप था कि उसे फ़िल्म में ग़लत ढंग से दिखाया है। सलमान ख़ान की फ़िल्में 'टाइगर ज़िंदा है' और 'एक था टाइगर' वैसे तो दोनों मुल्क़ों के बीच मोहब्बत का संदेश देती हैं, मगर फिर भी इन फ़िल्मों को पाकिस्तान में रिलीज़ से रोका गया। 'एक था टाइगर' 2012 में रिलीज़ हुई थी, जबकि इसका पार्ट 2 'टाइगर ज़िंदा है' पिछले साल दिसंबर में आया। इस फ़िल्म में सलमान भारतीय रॉ एजेंट बने हैं, जबकि कटरीना कैफ़ पाकिस्तानी खुफ़िया एजेंसी आईएसआई की एजेंट हैं।

बदले के लिए बैन

नीरज पांडेय निर्देशित 'एमएस धोनी- द अनटोल्ड स्टोरी' को पाक सेंसर बोर्ड ने बदले की कार्रवाई करते हुए बैन कर दिया था। उस वक़्त भारत में पाकिस्तानी कलाकारों के ख़िलाफ़ माहौल बना हुआ था और उन्हें यहां की मनोरंजन इंडस्ट्री में बैन करने की मांगें उठ रही थीं। इसलिए पाकिस्तान ने फ़िल्म को अपने यहां रिलीज़ नहीं होने दिया।

कश्मीर के नाम पर बैन

अक्षय की 2017 की फ़िल्म 'जॉली एलएलबी2' को इसलिए रिलीज़ नहीं होने दिया गया, क्योंकि फ़िल्म में कश्मीर विवाद का रेफरेंस है। सुभाष कपूर निर्देशित इस फ़िल्म में अक्षय वक़ील के किरदार में थे और एक केस के तार कश्मीरी आतंकवाद से जुड़ते हैं, जिसमें अक्षय का किरदार कश्मीरी पुलिस कांस्टेबल के लिए अदालत में लड़ता हुआ दिखाया गया।

मज़हब के नाम पर बैन

भारतीय फ़िल्मों के 'बोल्ड' कंटेंट और मज़हबी कारणों के चलते भी पाक सेंसर बोर्ड फ़िल्मों के ख़िलाफ़ कार्यवाही करता रहा है। अक्षय कुमार की फ़िल्म 'पैड मैन' महिलाओं की माहवारी के ज़रूरी विषय पर रौशनी डालती है, मगर पाकिस्तान में इस फ़िल्म को मज़हब के ख़िलाफ़ माना गया और सेंसर बोर्ड ने फ़िल्म रिलीज़ नहीं होने दी। दिलचस्प बात ये है कि पाकिस्तानी सेंसर बोर्ड के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ वहां की अवाम ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। लाल रंग से लिखे गये सैनिटरी पैड्स विरोधस्वरूप सेंसर बोर्ड के भेजे गये। इससे पहले 'द डर्टी पिक्चर' और 'देहली बेली' अश्लीलता के इल्ज़ाम के चलते प्रतिबंधित की गयीं। अक्षय कुमार की 'खिलाड़ी 786' इसलिए रिलीज़ नहीं हुई, क्योंकि 786 मुस्लिमों के लिए पवित्र माना जाता है और फ़िल्म धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा सकती थी।

मोहब्बत भी बैन

मज़हब के नाम पर बैन 'रांझणा' पाकिस्तान में इसलिए रिलीज़ नहीं हो सकी, क्योंकि हिंदू लड़के और मुस्लिम लड़की के बीच मोहब्बत दिखायी गयी थी। ग़ौरतलब है कि 'रांझणा' की कहानी या किरदारों का भी पाक से कोई लेना-देना नहीं था। फ़िल्म में धनुष को वाराणसी में रहने वाला कुंदन नाम का ब्राह्मण युवक दिखाया गया था, जबकि सोनम कपूर ज़ोया नाम की मुस्लिम युवती के रोल में थीं।

लादेन के नाम पर बैन

सेंस ऑफ़ ह्यूमर के मामले में भी पाकिस्तानी सेंसर बोर्ड की रूढ़िवादी सोच अक्सर परिलक्षित होती है। 2010 की फ़िल्म 'तेरे बिन लादेन' में ओसामा बिन लादेन पर व्यंग्य दिखाया गया था, लेकिन पाकिस्तान को डर था कि लादेन पर व्यंग्य उनके लिए मुसीबतें खड़ी कर सकता है। लिहाज़ा फ़िल्म पर प्रतिबंध लगा दिया गया। पाकिस्तान और भारत के बीच रिश्ते नाज़ुक डोर से बंधे हैं, जो फ़िल्मों पर लगाए गए बैन के ज़रिए अक्सर प्रतिविम्बित होता है, मगर सवाल ये कि अवाम इस सियासी कड़वाहट का ख़ामियाज़ा क्यों भुगते?

...और अब ईद के नाम पर बैन

पाकिस्तानी सरकार ने एक नया फ़रमान जारी किया है, जिसके मुताबिक भारतीय फ़िल्में ईद के त्यौहार के आस-पास पाकिस्तान में रिलीज़ नहीं हो सकेंगी। ताकि वहां की फ़िल्मों को त्यौहारी रिलीज़ का फ़ायदा मिल सके। तर्क है, अगर बॉलीवुड फ़िल्म ईद जैसे त्यौहार पर रिलीज़ की जाती है तो स्थानीय फ़िल्मों का बिज़नेस खा जाती है। इस फ़रमान का सीधा असर सलमान ख़ान की रेस 3 पर पड़ेगा, जो 15 जून को ईद के मौक़े पर रिलीज़ हो रही है। हालांकि ग़ैर-पाकिस्तानी फ़िल्मों को ईद के कुछ दिन बाद रिलीज़ करने की अनुमति दी जाएगी।

Posted By: Manoj Vashisth

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस