मुंबई। 'पद्मावती' का नाम आधिकारिक तौर पर 'पद्मावत' कर दिया गया है। सेंसर बोर्ड के सुझाव तहत किये गये इस बदलाव का संदेश अलग और बेहद ज़रूरी है। 'पद्मावती' टाइटल से फ़िल्म का कथ्य जहां व्यक्ति-प्रधान महसूस होता था, वहीं 'पद्मावत' करते ही ये एक महाकाव्य का आभास देता है यानि कल्पनाशीलता का सहारा लिया जा सकता है। 

चितौड़गढ़ क़िले की आबो-हवा और भग्नावशेषों में रानी पद्मिनी के जौहर की कहानी आज भी सांसें ले रही है और यही वजह है कि पद्मावती पर फ़िल्म बनने का एलान होते ही इसका विरोध होने लगा। हालांकि संजय लीला भंसाली ने काफ़ी पहले ये कह दिया था कि उनकी फ़िल्म पद्मावत ग्रंथ पर आधारित है। चलिए तमाम चर्चाओं के बीच पद्मावत के बारे में जानते हैं कि इसको लेकर कब-कब क्या हुआ। 

पद्मावत का सफ़रनामा:

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पद्मावत की रचना जायसी ने 1540 में की थी, जिसे उन्होंने अवधी में लिखा है। पद्मावत साहित्यितक ही नहीं भाषाई लिहाज़ से भी महत्वपूर्ण कृति है, क्योंकि ये अवधी में लिखी गयी प्राचीनतम रचनाओं में से एक है। जैसा कि सब जानते हैं कि पद्मावत दिल्ली सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ की रानी पद्मिनी के लिए आकर्षण और उन्हें हासिल करने की उत्कट चाहत की कहानी है। खिलजी का किरदार जहां इतिहासबद्ध है, वहीं रानी पद्मिनी के ऐतिहासिक वजूद को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। हालांकि रानी के अनुयायी जौहर की इस गाथा को कपोल कल्पना नहीं, बल्कि इतिहास का सच मानते हैं। 

जायसी के पद्मावत के कई साहित्यिक रुपांतर हुए हैं, जिनमें सबसे प्राचीन प्रेम नामा है, जिसे 1590 में हंस दक्कनी ने लिखा था, जो बीजापुर सल्तनत के सुल्तान इब्राहिम शाह के दरबारी कवि थे। पारसी और उर्दू भाषाओं में पद्मावत के 12 रूपांतरण मौजूद बताए जाते हैं। इनमें रात-पदम और शमा-वा-परवाना सर्वाधिक प्रसिद्ध हुए। 1618 में रूपांतरित रात-पदम को गुजरात के मुल्ला अब्दुल शकूर ने लिखा था। जानकार बताते हैं कि इसमें विषयवस्तु को तो भलीभांति प्रस्तुत किया गया था, मगर जायसी वाला सूफ़ियाना मिज़ाज जाता रहा। 1658 में औरंगज़ेब शासन के गवर्नर अक़ील ख़ान राज़ी द्वारा लिखे गये शमा-वा-परवाना में सूफ़ियाने मिज़ाज को वापस लाया गया। 

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16वीं शताब्दी में इस महाकाव्य का बंगाली में अनुवाद किया गया, जिससे प्रेरित होने के बाद 19वीं सदी में इस पर आधारित कई उपन्यास और कविताओं की बंगाली साहित्य में बाढ़ सी आ गयी। यहां तक कि रवींद्रनाथ टैगोर के भाई अवनींद्रनाथ टैगोर ने 1909 में इसे रूपांतरित किया था। सिर्फ़ हिंदुस्तानी नहीं, बल्कि विदेशी साहित्यकारों और कलाकारों को भी पद्मावत ने प्रभावित किया है। 1923 में अल्बर्ट रसल ने इससे प्रेरित होकर पद्मावती ओपेरा की रचना की। इन साहित्यिक रूपांतरणों के अलावा पद्मावत को सिनेमा के पर्दे पर भी पेश किया गया है। 1963 में आयी तमिल फ़िल्म चित्तौड़ रानी पद्मिनी और 1964 में आयी हिंदी फ़िल्म पद्मिनी, इसी गाथा पर आधारित हैं। और अब पद्मावत की रचना के 478 साल बाद इसका सबसे भव्य रूप पर्दे पर आ रहा है। 

क्या है विवाद:

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फ़िल्म में दिल्ली सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी और रानी पद्मिनी के बीच कथित तौर पर प्रेम प्रसंग दिखाए जाने की अफ़वाह को लेकर फ़िल्म का विरोध शुरू हुआ था। सबसे पहले राजस्थान के संगठन श्री राजपूत करणी सेना ने फ़िल्म का विरोध शुरू किया था, जिसने बाद में सियासी रंग ले लिया। इधर फ़िल्म की शूटिंग होती रही, उधर देश के अलग-अलग हिस्सों में पद्मावती की मुख़ालिफ़त होती रही। अदालत के ज़रिए भी 'पद्मावती' को बैन करवाने की कोशिशें जारी रहीं। संगठनों के साथ रजवाड़े और कुछ राज्य सरकारें भी इसमें शामिल हो गयीं। भंसाली ने एक वीडियो जारी करके ये संदेश भी दिया कि अलाउद्दीन खिलजी और पद्मावती के बीच ड्रीम सीक्वेंस में प्रेम-प्रसंग नहीं दिखाया जा रहा है। ये महज़ एक अफ़वाह है, मगर विरोध करने वाले कुछ सुनने-समझने की अवस्था में नहीं दिख रहे।

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सदियों का सफ़र करके जायसी का पद्मावत भले ही रीतिकालीन साहित्य की अमूल्य उपलब्धि हो, मगर भंसाली जैसी भव्यता उसे पहली बार मिल रही है। उम्मीद है कि इतिहास की इस भव्यता को देखने का मौक़ा आम दर्शक को मिलेगा। 

Posted By: Manoj Vashisth