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कभी सफलता की गारंटी थीं सोशल इश्यू वाली फिल्में, अब हो रहीं फ्लॉप; सिनेमा के 'ज्ञान' से क्यों दूर भाग रहे लोग?

By Aarti TiwariEdited By: Rinki Tiwari
Published: Fri, 16 Oct 2026 11:44 AM (GMT+05:30)

सिनेमा वर्षों से समाज में व्याप्त कुरीतियों और भ्रांतियों के निवारण की जागरूकता फैलाता आया है, फिर यह प्रयास अब क्यों पड़ रहा है कमजोर। जानिए इस बारे में...

सोशल इश्यू पर बनीं फिल्मों ने खोया चार्म। फोटो क्रेडिट- एक्स

सोशल इश्यू पर बनीं फिल्मों ने खोया चार्म। फोटो क्रेडिट- एक्स

HighLights

  1. सामाजिक संदेश वाली फिल्में अब नहीं खींच पा रहीं दर्शकों का ध्यान

  2. कभी बॉक्स ऑफिस पर चलता था सामाजिक मुद्दों वाली फिल्मों का जलवा

  3. ओटीटी पर भी दर्शकों ने सामाजिक इश्यू वाली फिल्मों को नकारा

आरती तिवारी, नई दिल्ली। सामाजिक संदेश से भरी फिल्में हिंदी सिनेमा में कभी सफलता की गारंटी होती थीं। 'अछूत कन्या' से लेकर 'दामिनी' की जोरदार दहाड़ तक, 'पिंक' के 'नो मींस नो' वाले पंच और 'पैडमैन' के संदेश तक सभी बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा देते थे।

तब ऐसी फिल्में समाज का आईना भी होती थीं और बॉक्स ऑफिस पर सफलता की गारंटी भी। मगर अब दर्शकों ने जैसे इनसे मुंह फेर लिया है।

क्या 'दायरा' (Daayra) से लेकर 'अस्सी' (Assi) जैसी फिल्मों का बॉक्स ऑफिस और ओटीटी दोनों प्लेटफार्म्स पर फीका पड़ना इस बात का संकेत है कि दर्शक अब उपदेशात्मक या गंभीर सामाजिक मुद्दों वाली फिल्मों से दूर हो रहे हैं।

बड़े सितारे भी खो रहे चमक

बीते दिनों करीना कपूर खान (Kareena Kapoor Khan) के कंधों पर टिकी फिल्म 'दायरा' का बॉक्स ऑफिस पर सिमट जाना बताता है कि आज दर्शक सिनेमाघरों में ज्ञान या भारी-भरकम उपदेश सुनने नहीं जाना चाहते। 

Daayra Movie

'पिंक' 'नो मीन्स नो' के साथ दर्शकों को प्रभावित करने वाली तापसी पन्नू (Taapsee Pannu) जब 'अस्सी' लेकर आती हैं तो वे भी दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच नहीं पातीं। रानी मुखर्जी की 'मर्दानी 3' भी वह जादू नहीं चला पाई। जातिगत भेदभाव पर बनी 'धड़क 2' भी सफल नहीं हो पाई।

ओटीटी पर भी नहीं चल रहा जादू

एक समय था जब यह माना जाता था कि अगर कोई फिल्म सिनेमाघरों में नहीं चली, तो ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर उसे नया जीवन मिल जाएगा, लेकिन अब यह थ्योरी भी बदल चुकी है। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आई 'गांधारी' दर्शकों को उतना प्रभावित नहीं कर पाती है।

वहीं फसलों पर आवश्यकता से अधिक उपयोग हो रहे कीटनाशक के कारण बीमारियों पर बात करती 'द इंडिया स्टोरी' अपनी ही कहानी कह पाने में पिछड़ जाती है।

खो गया सिनेमा का जादू

क्या दर्शक फिल्मों को मौका ही नहीं दे रहे या कारण कुछ और है? इस पर फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम कहते हैं, "सिनेमा देखने का बदलता माध्यम भी इसकी एक वजह है। जब सिनेमाहॉल पर लगी फिल्म, उसके पर्दे और हमारे बीच कोई नहीं आता था, तब लोग पूरी एकाग्रता से फिल्म देखते थे, उसके संदेश को ग्रहण करते थे।

assi movie

कोई भी गंभीर या सामाजिक संदेश वाली फिल्म आपका पूरा ध्यान, एकाग्रता और समय मांगती है। जब ओटीटी प्लेटफॉर्म पर सिनेमा देखते हैं, तो वो दो-ढाई घंटे सिर्फ फिल्म के नाम नहीं होते। बीच में फोन कॉल, नोटिफिकेशन या साथ-साथ जरूरी काम निपटाने की मजबूरी- यह सब ध्यान भटकाने के लिए काफी हैं, जिससे सिनेमा का वो जादू टूट जाता है।

फिल्मों को तेज गति से बढ़ा देने या गानों को स्किप कर देने जैसी आदतें फिल्म के उस गहरे संदेश को दिमाग के किसी कोने में ठहरने ही नहीं देतीं।"

आगे बढ़ जाते हैं लोग

विनोद अनुपम ने यह भी कहा, "पहले जानकारी का माध्यम सीमित था। तब मनोरंजन के साथ मिलने वाला संदेश बड़े दर्शकवर्ग को प्रभावित करता था। आज इंटरनेट मीडिया से मिल रही जानकारी के बाद लोग अपनी बनाई धारणा और समझ के साथ संतुष्ट हैं। उन्हें लगता है कि मुझे सब पता है तो इसे क्यों देखूं। सिनेमा जब तक मनोरंजन की चाशनी में लपेटकर सामाजिक संदेश देता है, तब तक लोग आगे बढ़ जाते हैं और फिल्म को खारिज कर देते हैं।"

छूट जाता है दर्शकवर्ग

सिनेनाउ के चैयरमेन व मैनेजिंग डायरेक्टर रोहित डालमिया कहते हैं, "बदलती पीढ़ी के साथ ही कंटेंट को लेकर पसंद भी बदली है। पहले लोग समूह में फिल्म देखने जाते थे, आज ओटीटी प्लेटफार्म ने इसे निजी चुनाव बना दिया है। सीधी सी बात है कि वहां सामाजिक संदेश वाली फिल्में उबाऊ लगती हैं। अगर जब सामाजिक संदेश देती कोई फिल्म 'ए' सर्टिफिकेट पा लेती हैं, तो भी परिवार उस फिल्म को छोड़कर ऐसी फिल्म की ओर बढ़ जाता है, जहां सब जा सकें। यह भी आज के सिनेमा के साथ एक बड़ा मसला है।"

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