मुंबई। भारतीय सिनेमा में अदाकारी का कमल अब सियासत की ज़मीं में उगने और खिलने की तैयारी कर रहा है। इंडियन जैसी फ़िल्मों के ज़रिए सिस्टम में पसरे भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने वाले कमल अब सियासत का हिस्सा बनकर सिस्टम ले लड़ेंगे। कमल हासन ने सात नवंबर को अपने जन्मदिन पर एक मोबाइल एप लांच करके सियासी सफ़र की मुनादी कर दी है। आने वाले दौर में राजनीति में उनकी सक्रियता बढ़ने वाली है।

सिनेमा और सियासत का ये रिश्ता पर्दे पर तो अक्सर दिखायी देता है, मगर असल ज़िंदगी में सबको कामयाबी नहीं मिलती। सिल्वर स्क्रीन पर भ्रष्ट राजनीति से लड़ने वाला नायक रियल लाइफ़ की पॉलिटिक्स में नहीं टिक पाता। इस रिपोर्ट में ऐसे ही 5 महानायक, जो सिनेमा से सियासत की तरफ़ गये, मगर ज़्यादा देर तक टिक ना सके।

राजेश खन्ना

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राजेश खन्ना जैसा स्टारडम हिंदी सिनेमा के किसी सुपरस्टार ने नहीं देखा और भविष्य में इसकी संभावना भी कम है। मगर, राजनीति के मंच पर राजेश खन्ना फ्लॉप एक्टर साबित हुए। कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीतकर राजेश खन्ना 1992 से 1996 कर नई दिल्ली के सांसद रहे, मगर सियासत की पारी लंबी नहीं चली।

अमिताभ बच्चन

हिंदी सिनेमा के पर्दे पर नायक के नए तेवर पेश करने वाले अमिताभ बच्चन ने सियासत में क़िस्मत आज़मायी और इलाहाबाद से रिकॉर्ड मतों से लोकसभा चुनाव जीता भी, मगर तीन साल बाद ही अमिताभ बच्चन को अहसास हो गया कि राजनीति के वो कभी सुपरस्टार नहीं बन सकते। बच्चन ने इस्तीफ़ा देकर सियासत छोड़ दी।

गोविंदा

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गोविंदा ने हिंदी सिनेमा में अपनी कॉमिक टाइमिंग से फ़ैंस का ख़ूब मनोरंजन किया है, मगर जब इस स्टारडम को राजनीति में करियर बनाने के लिए इस्तेमाल किया तो ट्रैजडी हो गयी। 2004 में गोविंदा ने कांग्रेस के टिकट पर मुंबई की विरार कांस्टिचुएंसी से लोकसभा चुनाव लड़ा, जीते भी, मगर उनका कार्यकाल काफ़ी विवादों भरा रहा। 2008 में गोविंदा ने अपने पॉलिटिकल करियर के क्लाइमेक्स का एलान कर दिया।

धर्मेंद्र

धर्मेंद्र का फ़िल्मी सफ़र जितना शानदार रहा, उनका पॉलिटिकल करियर उतना ही आलोचनाओं का शिकार बना। धर्मेंद्र ने 2004 में बीकानेर से भाजपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीता, मगर संसद में ग़ैरहाज़िरी के लिए उन्हें क्रिटिसाइज़ किया जाता रहा। धर्मेंद्र ने इसके बाद राजनीति छोड़ दी।

संजय दत्त

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संजय दत्त के पिता सुनीत दत्त कामयाब राजनेता थे। उनकी बहन प्रिया दत्त भी राजनीति में सक्सेसफुल रही हैं। मगर, संजय पॉलिटिक्स में फ्लॉप रहे। उन्होंने 2009 के लोकसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी के टिकट पर नामांकन करवाया मगर अदालत ने उनके कंविक्शन को सस्पेंड करने के इंकार कर दिया, जिसके चलते चुनाव नहीं लड़ सके। उन्हें पार्टी का महासचिव बनाया गया, मगर 2010 में संजय ने पद और पार्टी छोड़ दी।

Posted By: Manoj Vashisth