दीपिका पादुकोण के पिछले दो साल बेहतरीन रहे। उन्होंने ‘हैप्पी न्यू ईयर’, ‘ये जवानी है दीवानी’, ‘चेन्नई एक्सप्रेस’, ‘गोलियों की रासलीला : राम-लीला’, जैसी कई सुपरहिट फिल्में दी। आमतौर पर फिल्मों की सफलता के साथ सितारों पर बेहतर परफॉर्मेंस का दबाव बढ़ जाता है लेकिन दीपिका इससे इंकार करती हैं। दीपिका कहती हैं, ‘हम फिल्में रिकॉर्ड ब्रेक करने या अवॉर्ड जीतने के लिए नहीं बनाते। फिल्मों का प्राथमिक उद्देश्य दर्शकों का मनोरंजन करना होता है।’

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दीपिका उन फिल्मों को मिले अवॉर्ड को बेकार मानती हैं, जो दर्शकों को पसंद नहीं आतीं। वो कहती हैं, ‘अगर मेरी फिल्मों से दर्शक एंटरटेन नहीं हो रहे तो उसके लिए अवॉर्ड मिलने पर मुझे खुशी भी नहीं होगी।’ दीपिका अपने काम की खुद सबसे बड़ी आलोचक हैं। वो अपने काम से जल्दी खुश नहीं होतीं, इसलिए खूब मेहनत करती हैं। वो कहती हैं, ‘बहुत कम ऐसा हुआ है जब मैं अपने काम से संतुष्ट या खुश हुई हूं। मुझे लगता है कि जिस पल आप अपने काम के खुद मुरीद हो जाते हैं आपकी ग्रोथ रुक जाती है। इसीलिए, मैं अपनी हर फिल्म को करियर की पहली फिल्म के जितनी ही अहमियत देती हूं।’

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हिंदी सिनेमा जगत में इन दिनों महिला प्रधान फिल्में बनने लगी हैं। पिछले साल रिलीज ‘क्वीन’ और ‘मैरी कॉम’ को दर्शकों और समीक्षकों का भरपूर प्यार मिला था। दीपिका फिल्मों को ऐसी श्रेणियों में बांटने के खिलाफ हैं। वो कहती हैं, ‘मुझे समझ नहीं आता कि उन्हें महिला प्रधान फिल्म क्यों कहा जाता है? वो भी बाकी फिल्मों की तरह हैं। जहां तक मैरी कॉम की बात है तो वो ख्याति प्राप्त खिलाड़ी हैं। अगर उन पर बायोपिक बनेगी तो किसी अभिनेत्री को लिया जाना स्वभाविक है। कोई हीरो तो मैरी कॉम का रोल नहीं निभाएगा। इसी तरह सिर्फ भारत में फिल्मों को कमर्शियल या ऑफ बीट श्रेणी में बांटा जाता है। आखिर फिल्म को सिर्फ फिल्म की तरह क्यों नहीं देखा जाता?’

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By Monika Sharma