मुंबई। बॉलीवुड के ही-मैन कहे जाने वाले एक्टर धर्मेंद्र ने यूं तो हर तरह का किरदार पर्दे पर निभाया है, लेकिन हिंदी सिनेमा के सबसे मशूहर करेक्टर देवदास बनने का मौक़ा धर्मेंद्र के हाथ से निकल गया।

बंगाली साहित्यकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के क्लासिक नॉवल देवदास के ज़ितने वर्ज़न बड़े पर्दे पर आए हैं, उतने शायद ही किसी और नॉवल के आए हों। लगभग सभी भाषाओं के सिनेमा में देवदास पर फ़िल्में बन चुकी हैं। हिंदी सिनेमा में भी देवदास को अलग-अलग वक़्त में पर्दे पर उतारा जा चुका है। देवदास का एक वर्ज़न ऐसा भी है, जिसे गुलज़ार बनाना चाहते थे। इस फ़िल्म में देवदास के किरदार के लिए धर्मेंद्र को चुना था, जबकि चंद्रमुखी और पारो के किरदारों के लिए उन्होंने शर्मिला टैगोर और हेमा मालिनी को फाइनल किया था। फ़िल्म का मुहूर्त भी हुआ, लेकिन बदकिस्मती से फ़िल्म इससे आगे नहीं बढ़ सकी। धर्मेंद्र को भी इसके बाद गुलज़ार के निर्देशन में काम करने का मौक़ा नहीं मिला।

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सोचिए, अगर ये फ़िल्म बनकर रिलीज़ होती तो धर्मेंद्र को देवदास के किरदार में देखना कितना दिलचस्प अनुभव होता। धर्मेंद्र भले ही देवदास बनने से चूक गए हों, लेकिन उनके भतीजे अभय देओल के ये मौक़ा मिल गया, जब अनुराग कश्यप ने उन्हें देव.डी में देवदास का किरदार निभाने का मौक़ा दिया था।

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देवदास पर सबसे पहले 1928 में साइलेंट फ़िल्म बनी। 1936 में पीसी बरुआ ने केएल सहगल को देवदास बनाया। 1955 में बिमल रॉय के डायरेक्शन में दिलीप कुमार देवदास बने। 2002 में संजय लीला भंसाली ने शाह रूख़ ख़ान को देवदास बनाकर अमर कर दिया। अब सुधीर मिश्रा और देवदास के नाम से फ़िल्म बना रहे हैं, जिसमें राहुल भट्ट देवदास बने हैं। हालांकि इस देवदास की बैकग्राउंड पॉलिटिक्स है।

By Manoj Vashisth