स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई ब्यूरो। हिंदी सिनेमा में स्वाधीनता संघर्ष पर आधारित फिल्मों के साथ युद्ध पर आधारित फिल्में भी देखने को मिलीं। अममून फिल्मकार पराजय पर आधारित कहानियों को बनाने से बचते हैं। ऐसे में चेतन आनंद ने उस जोखिम को उठाया। उन्होंने 1962 में भारत-चीन युद्ध पर ‘हकीकत’ जैसी फिल्म बनाई, जो युद्ध के दौरान मैदान में डटे सैनिकों के दृष्टिकोण को बड़ी मार्मिकता से दर्शाती है। स्मिता श्रीवास्तव का आलेख...

भारतीय सैनिकों के हौसले को दर्शाती है 'हकीकत'

चीन के साथ भारत की तनातनी की खबरें आए दिन सुर्खियों में रहती हैं। हालांकि भारत दो टूक कह चुका है कि वह अब 1962 वाला भारत नहीं रहा है। अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए वह जंग से नहीं हिचकेगा। यह बयान नए भारत की तस्दीक करता है जो दिनोंदिन अपनी सैन्य ताकत में इजाफा कर रहा है। सीमा पर तैनात सिपाहियों के हौसले को आवाज देती फिल्मों में बलराज साहनी और धर्मेंद्र अभिनीत ‘हकीकत’ उन जांबाज सैनिकों को सलाम करती है, जिन्होंने देश की रक्षा की खातिर आखिरी दम तक लड़ाई लड़ी और बलिदान दे दिया।

देशभक्ति से लबरेज है ये फिल्म

हिंदी सिनेमा में क्लासिक फिल्मों में शुमार ‘हकीकत’ में युद्ध का यर्थाथवादी चित्रण किया गया था। जिसमें युद्ध के मैदान में डटे सैनिकों के दृष्टिकोण को दर्शाया गया था। इस फिल्म को मुख्य रूप से लद्दाख में शूट किया गया था। इस फिल्म का बजट उस समय तकरीबन 30 लाख रुपए था। फिल्म की सफलता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि फिल्म ने दुनियाभर में करीब ढाई करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई की थी। चीन के सिपाहियों के हाथों हार के दो साल बाद रिलीज हुई इस फिल्म ने देश के विश्वास को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई, जो युद्ध के झटके से जूझ रहा था। इस फिल्म ने लोगों में देशभक्ति की भावना का भी संचार किया।

वास्तविकता के करीब

हकीकत’ युद्ध की गंभीर वास्तविकता के बारे में थी। साथ ही जनरलों द्वारा तैयार की गई रणनीतियों का मोर्चे पर तैनात सैनिक पर कैसा प्रभाव पड़ता है, उसकी भी पड़ताल करती है। सैनिकों को लगातार आगे बढ़ रहे दुश्मन पर गोली नहीं चलाने का आदेश दिया जाता है। इन परिस्थितियों में वे किस तरह बेचैन हो जाते है, इसमें उनकी उस मनोदशा का सटीक चित्रण किया गया, वहीं मौत के मुंह से बचकर आए बेटे को दोबारा युद्ध के मैदान में भेजने वाले ब्रिगेडियर पिता का फैसला देशहित को सर्वोपरि रखने की भावना की बानगी है। फिल्म चीनी आक्रमण के सामने भारतीय पक्ष की तैयारियों की कमी की आलोचना करती है। चीनी सैनिक भारतीय जमीन पर अपना दावा करते हुए भारतीय सैनिकों से उसे छोड़कर जाने को कहता है और ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारे की आड़ में आगे बढ़ता जाता है।

चीन के धोखे की कहानी है 

चेतन आनंद ने मित्र की तरह प्रतीत होने वाले चीन द्वारा पीठ में छुरा घोंपने के भारतीय दृष्टिकोण को दर्शाया। एक दृश्य में बलराज साहनी का किरदार सैनिकों से कहता है कि ‘हम किसी को दुश्मन नहीं समझते, ये किसी को दोस्त नहीं समझते। हम संसार की महफिलों में इनकी सिफारिश करते फिरते थे और ये चुपके-चुपके हमारी धरती पर फौजी चौकियां बना रहे थे।’ चेतन आनंद ने फिल्म को वास्तविकता के और करीब ले जाने के लिए डाक्यूमेंट्री फुटेज का इस्तेमाल करते हुए दिखाया है कि चीन के प्रमुख चाउ एन-लाई का भारत यात्रा के दौरान किस प्रकार से खुले दिल से स्वागत किया गया था। चीन की धोखेबाजी के बाद सैनिकों के नाम दिए भाषण में ब्रिगेडियर सिंह कहते हैं, ‘चीन को सम्मान देने के बावजूद, चीनी सैनिकों ने भारत जैसे शांतिप्रिय राष्ट्र पर चुपके से हमला किया। अब हमारी बदौलत यह दुश्मन चैन की नींद कभी नहीं सो सकेगा।’

दिखाई सैनिकों की संवेदनाएं

‘हकीकत’ की कहानी ब्रिगेडियर सिंह (जयंत) के बेटे कैप्टन बहादुर सिंह (धर्मेंद्र), लद्दाखी लड़की अंगमो (प्रिया राजवंश) व मेजर रंजीत सिंह (बलराज साहनी) के साथ ही अन्य किरदारों तक भी जाती है। जिसमें मोर्चे पर तैनात सैनिकों की निजी जिंदगी पर भी गहरी नजर डाली गई है, जो अपनों से हजारों मीलों की दूरी पर हैं। उनसे संपर्क करने का एकमात्र जरिया खतों का आदान-प्रदान है। फिल्म में ऐसे कई मार्मिक दृश्य हैं जो सैनिकों की संवेदनाओं को व्यक्त करते हैं। जैसे जब एक सैनिक की पत्नी अपने पति को पसंदीदा फूलों के बीज और मुट्ठी भर मिट्टी भेजती है ताकि बंजर जमीन में जब फूल खिलें तो वह उसे याद कर सके। एक अन्य सैनिक चिंतित है, क्योंकि छुट्टी से वापस आने से पहले उसने अपनी मंगेतर से झगड़ा किया था और उसके पत्र की प्रतीक्षा कर रहा है। फिल्म ब्लैक एंड व्हाइट में बनी थी, लेकिन सदानंद की सिनेमेटोग्राफी ने लद्दाख की खूबसूरती को बखूबी कैमरे में कैद किया। फिल्म को यथार्थवादी दिखाने के लिए आर्ट डायरेक्टर एम.एस. सथ्यू का काम उल्लेखनीय था। यह फिल्म युद्ध के दौरान आम नागरिकों के जुड़ाव और युद्धभूमि में एक महिला को दर्शाने के लिए भी उल्लेखनीय है। नागरिक प्रशिक्षण अभ्यास के तहत अंगमो को प्रशिक्षित किया जाता है और वह कैप्टन बहादुर सिंह की शहादत के साथ युद्ध के मैदान में होती है। यह दूरदर्शी दृश्य प्रशंसनीय है। हालांकि भारतीय सेना में महिलाओं के लिए युद्ध में तैनाती की राहें पिछले साल खुलीं।

आज भी कौंधती है चिंगारी

फिल्म के कलाकारों का अभिनय बेहद सराहनीय रहा। करियर की शुरुआत में धर्मेंद्र का सहज अभिनय यादगार रहा। दिग्गज जयंत और बलराज साहनी के बेहतरीन अभिनय के साथ उनका उम्दा तालमेल दिखता है। फिल्म का खास आकर्षण इसका संगीत भी रहा, जो लोगों के दिलों पर छा गया था। मदन मोहन की धुन और कैफी आजमी का देशभक्ति से ओत-प्रोत गीत ‘कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियों’ आज भी लोकप्रिय है। ‘होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा’ एक और दिल को छू लेने वाला गाना है जो सैनिक की मानसिकता को बयां करता है। खास बात यह है कि चेतन आनंद ने बिना प्रोपेगेंडा के देशभक्ति की भावना पैदा की। एक दृश्य में मेजर रंजीत सिंह अपने सैनिकों की हौसला-आफजाई के लिए कहते हैं, ‘जिस्म जवाब दे नहीं सकता, जब तक हिम्मत की चिंगारी है’। इसी तरह फिल्म के अन्य संवाद, ‘हमारा देश शांति का पुजारी जरूर है, लेकिन बुजदिली का कायल नहीं...’ ने उस वक्त दुनिया को संदेश दे दिया था कि हम सिर कटा सकते हैं, लेकिन सिर झुका सकते नहीं। 

Edited By: Ruchi Vajpayee