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एक ही तारीख, एक ही उम्र और एक ही मौत का कारण; बॉलीवुड के दो जिगरी यार के निधन पर रोया था पूरा देश

Published: Mon, 27 Apr 2026 04:10 PM (IST)

बॉलीवुड के दो कमाल के स्टार्स, जो जिगरी यार थे। लेकन उनकी दोस्ती सिर्फ सिनेमा ही नहीं बल्कि मौत तक उनके साथ रही।

एक की तारीख पर दो जिगरी यारों का निधन

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एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। इत्तेफाक ऐसी चीज है जो कुछ बेहतरीन यादें देकर जाती हैं लेकिन कुछ इत्तेफाक ऐसे भी होते हैं जो हैरान भी करते हैं और दुखी भी। एक ऐसा ही इत्तेफाक हुआ बॉलीवुड के दो जिगरी यारों के बीच। फिरोज खान और विनोद खन्ना- दोनों का निधन एक ही तारीख पर हुआ, इतना ही नहीं निधन के वक्त दोनों की उम्र भी उतनी ही थी और उनके निधन का कारण भी एक ही था।

जिगरी यारों की एक ही दिन हुई मौत

अपनी पीढ़ी के सबसे आकर्षक अभिनेताओं में से एक, विनोद खन्ना (Vinod Khanna) का निधन उसी तारीख को हुआ, जिस तारीख को आठ साल पहले फिल्म इंडस्ट्री में उनके सबसे करीबी दोस्त फिरोज खान (Firoz Khan) का निधन हुआ था। अपनी मृत्यु के समय दोनों की उम्र एक समान थी और दोनों ही एक ही बीमारी कैंसर से पीड़ित थे। विनोद खन्ना और फिरोज खान का निधन 70 की उम्र में 27 अप्रैल को हुआ था।

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कई फिल्मों में किया साथ में काम

विनोद और फिरोज ने अपनी सबसे बड़ी हिट फिल्मों में से एक, 'कुर्बानी' (Qurbani) (1980) में दोस्तों की भूमिका निभाई थी, और उसके बाद 'दयावान' (Dayavan) (1988) में साथ काम किया; यह मणिरत्नम की कल्ट तमिल क्लासिक फिल्म 'नायकन' का रीमेक थी। लेकिन उनकी दोस्ती इन फिल्मों से भी पहले की थी। उनकी गहरी दोस्ती तब हुई थी, जब उन्होंने अपनी पहली हिट फिल्म 'शंकर शंभू' (1976) में साथ काम किया था; इस फिल्म का निर्देशन चांद ने किया था।

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विनोद के बुरे वक्त में फिरोज खान ने दिया था साथ

जब विनोद, अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) के बाद दूसरे सबसे लोकप्रिय अभिनेता थे, तब उन्होंने बॉलीवुड छोड़ दिया। वह एक माली बन गए और, जैसा कि उन्होंने उन दिनों एक इंटरव्यू में कहा था, 'दुनिया को अपने हाल पर चलने देने' में ही खुश थे। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

अमेरिका में ओशो के आश्रम से जुड़े विवादों के बाद, विनोद को एक नाटकीय अंदाज में अपनी दूसरी पारी के लिए फिल्मों की दुनिया में वापस लौटना पड़ा। फिरोज उन शुरुआती प्रोड्यूसर्स में से एक थे, जिन्होंने खुले दिल से उनका स्वागत किया और उन्हें 'दयावान' के लिए साइन किया; हालांकि, मुकुल आनंद की 'इंसाफ' (1986) और राज एन. सिप्पी की 'सत्यमेव जयते' (1986) उनकी वापसी की पहली दो फिल्में थीं।

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आठ साल के अंतर में दोनों का निधन

फिरोज की फेफड़ों के कैंसर से मौत होने तक वे जिंदगी भर दोस्त बने रहे। फिरोज के गुजरने से कुछ दिन पहले, विनोद, धर्मेंद्र के साथ मुंबई के उस अस्पताल में उनसे मिलने गए थे जहां वे भर्ती थे। वहां वे दोनों मिलकर फूट-फूटकर रोए। विडंबना यह है कि आठ साल बाद, जब विनोद को ब्लैडर कैंसर का पता चला, तो क्रूर किस्मत ने उन्हें भी उसी जगह पहुंचा दिया। 27 अप्रैल को जो उनके सबसे करीबी दोस्त की आठवीं पुण्यतिथि थी, विनोद अपने परिवार, दोस्तों और लाखों फैंस को शोक में डूबा छोड़कर इस दुनिया से चले गए।

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