मुंबई। फिल्ममेकर दिबाकर बनर्जी ने सेंसर पर भड़ास निकालते हुए कहा है कि बोर्ड का काम फिल्मों को सेंसर करना नहीं है, बल्कि फिल्ममेकर और दर्शकों को फिल्म का कंटेट चुनने का अधिकार होना चाहिए।

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उनके मुताबिक 'सेंसर बोर्ड को फिल्मों को श्रेणीबद्ध करना चाहिए कि वह किस उम्र के दर्शकों के लिए उपयुक्त होगी। उसके बाद सेंसर बोर्ड का काम खत्म हो जाता है। उसके आगे दर्शक खुद चुन लेंगे कि फिल्म देखें या ना देखें।'

दिबाकर बनर्जी ने 'खोसला का घोंसला', 'ओए लकी लकी ओए' और 'शंघाई' जैसी मशहूर फिल्में बनाई है। उनका कहना है, 'हमें ही यह तय करना चाहिए कि हमें क्या देखना है और हमें क्या बनाना है। इसमें सेंसर बोर्ड की बेजा दखलंदाजी की कोई जरूरत नहीं है। सेंसर बोर्ड का काम बस इतना है कि वो फिल्म देखकर उसे सर्टिफाई करें कि पारिवारिक फिल्म है, बाल फिल्म है या एडल्ट फिल्म है। उसके बाद दर्शक खुद तय कर लेंगे कि उन्हें क्या करना है।'

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दिवाकर ने यह बातें एक समारोह में कही, जहां गुरुदत्त पर लिखी तीन किताबों का विमोचन किया जा रहा था। उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए कहा, 'यह बहुत ही हास्यापद है कि सेंसर बोर्ड फिल्मकारों को लिस्ट थमाए कि इन शब्दों का प्रयोग न करें। यह बिल्कुल ही बेतुका और मुखर्तापूर्ण है।'

इस अवसर पर फिल्ममेकर विधु विनोद चोपड़ा भी मौजूद थे। विधु का कहना है, 'अगर किसी फिल्म में सेंसर बोर्ड के हिसाब से बोल्ड विषयवस्तु या शब्दों का प्रयोग किया गया है, तो वह उसे एडल्ट श्रेणी का प्रमाणपत्र जारी करे। यह तो बेवकूफी की इंतहा है कि वो फिल्मकारों को बताए कि क्या किया जाए या क्या न करें। मेरे हिसाब से यह बिल्कुल फालतू बात है।'

सुपरहिट फिल्म 'पीके' के निर्माता ने यह भी कहा कि सेंसर बोर्ड के अधिकारियों को अपनी सत्ता का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। उनके मुताबिक 'सरकार जितना ज्यादा सेंसर बोर्ड को अधिकार देगी, उतना ही ज्यादा ये लोग उसका मिसयूज करेंगे।'

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