मुंबई। 'हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी' से बॉलीवुड में एक्ट्रेस के तौर पर करियर शुरू करने वाली चित्रांगदा सिंह अब प्रोड्यूसर भी बन गयी हैं। चित्रांगदा के प्रोडक्शन में बनी पहली फ़िल्म 'सूरमा' इसी महीने रिलीज़ हो रही है। यह एक बायोपिक फ़िल्म है, जिसमें हॉकी प्लेयर संदीप सिंह की ज़िंदगी के कुछ हिस्सों को सिल्वर स्क्रीन पर दिखाया जाएगा।

हिंदी सिनेमा में इस वक़्त ऐसा माहौल चल रहा है कि जिसे देखिए वही एक्ट्रेस प्रोड्यूसर बन रही है, मगर इन यंग महिला प्रोड्यूसर्स में एक बात समान रूप से देखी जा सकती है। ये सभी ऐसे विषयों को चुन रही हैं, जो कहानी के नज़रिए से काफ़ी गहन, संजीदा, संवेदनशील और अलग हैं। यह महिला प्रोड्यूसर मसाला फ़िल्मों की भेड़चाल में शामिल नहीं हैं, जिनका सबसे कमज़ोर पक्ष कहानी होता है।

निर्मात्री बनी ये अभिनेत्रियां बॉक्स ऑफ़िस आंकड़ों को लेकर जल्दबाज़ी में भी नहीं दिखतीं। हां, इसको लेकर सचेत ज़रूर हैं। इसीलिए नियंत्रित बज़ट में दमदार और कसी हुई कहानियों पर दांव लगा रही हैं, जो समीक्षकों के साथ बॉक्स ऑफ़िस के इम्तेहान में भी पास हो जाती हैं। एक और समानता इन फ़िल्मों में देखी जाती है कि यह स्टार पर निर्भर नहीं करतीं। कहानी की ज़रूरत के हिसाब से चरित्र निभा सकने वाले सक्षम कलाकारों का चयन करती हैं। इससे फ़िल्म की गुणवत्ता बढ़ने के साथ बजट भी नियंत्रण में रहता है।

'सूरमा' में संदीप सिंह के किरदार के लिए पंजाबी सिंगर-एक्टर दिलजीत दोसांझ और उनकी प्रेमिका के लिए तापसी पन्नू को चुनना चित्रांगदा की सूझबूझ को ही दर्शाता है। दिलजीत हिंदी सिनेमा के लिए लगभग नये एक्टर हैं, मगर उनकी अभिनय क्षमता कमाल की है, जिसका अंदाज़ा 'सूरमा' के ट्रेलर में दिलजीत के अभिनय को देखकर हो जाता है। दिलजीत ने 'उड़ता पंजाब' से बॉलीवुड में अपनी फ़िल्मी पारी शुरू की थी।

एक ज़माने तक दिल और पर्दे को धड़काने वाली माधुरी दीक्षित ने अपने पति डॉ. श्रीराम नेने के साथ मिलकर फ़िल्म कंपनी शुरू की है, जिसके बैनर तले पहली मराठी फ़िल्म '15 ऑगस्ट' का निर्माण किया। ख़ुद नायिका का किरदार निभाया। माधुरी की यह कोशिश काफ़ी सराही गयी। प्रियंका चोपड़ा ने एक्ट्रेस के तौर पर अपनी पुख़्ता पहचान क़ायम की है।

बॉलीवुड से हॉलीवुड तक प्रियंका के नाम की गूंज सुनाई दे रही है। इसके साथ प्रियंका ने फ़िल्म निर्माण भी शुरू कर दिया है। ख़ास बात ये है कि हिंदी सिनेमा के बजाए प्रियंका क्षेत्रीय भाषा में फ़िल्म निर्माण पर अधिक तवज्जो दे रही हैं। प्रियंका के बैनर तले बनी पहली फ़िल्म 'बम बम बोल रहा है काशी' है। इसके बाद उन्होंने 'वेंटिलेटर' शीर्षक से मराठी फ़िल्म बनायी, जो कमर्शियली और क्रिटकली कामयाब रही और पुरस्कार समारोहों में भी हिट रही। अब इस फ़िल्म का निर्माण अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में किया जा रहा है। पंजाबी फ़िल्म 'सरवन' और सिक्किमी फ़िल्म 'पहुना' भी प्रियंका की कंपनी ने बनायी।

बॉलीवुड में प्रोड्यूसर के तौर पर एक और अभिनेत्री का नाम तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। ये हैं अनुष्का शर्मा, जो अपने होम प्रोडक्शन में तीन फ़िल्मों का निर्माण कर चुकी हैं। अनुष्का के फ़िल्म निर्माण की ख़ासियत है कि वो कम बजट की कंटेट प्रधान फ़िल्में चुन रही हैं। ख़ुद उनमें अभिनय करती हैं, जिससे लागत नियंत्रित रहती है। अनुष्का फ़िल्मों के प्रचार पर भी ज़्यादा ख़र्च नहीं करती हैं, लिहाज़ा रिलीज़ होने पर उनकी फ़िल्में नुक़सान में नहीं रहतीं। अनुष्का ने 2015 में अनुष्का ने पहली फ़िल्म 'एनएच10' का निर्माण किया। ख़ुद अभिनय भी किया। ये फ़िल्म समीक्षकों के साथ दर्शकों को पसंद आयी। 'एनएच10' हिट रही। इसके बाद अनुष्का ने 'फिल्लौरी' और 'परी' का निर्माण किया। ये दोनों फ़िल्में औसत रहीं।

लारा दत्ता को भी ऐसी ही अभिनेत्रियों की जमात में रखा जा सकता है, जिन्होंने कहानी, बजट और अभिनेता के बीच सामंजस्य रखकर अच्छी फ़िल्म का निर्माण किया। लारा ने 2011 में ख़ुद के साथ विनय पाठक को लीड में लेकर 'चलो दिल्ली' बनायी। यह फ़िल्म काफ़ी सराही गयी थी।

हालांकि पहले भी बॉलीवुड में तमाम अभिनेत्रियां निर्मात्री बनती रही हैं, मगर फ़िल्मों के विषयों के चयन को लेकर उनमें ऐसी गंभीरता, होशियारी और साहस कम ही देखा गया है। शिल्पा शेट्टी, प्रीति ज़िंटा और दीया मिर्ज़ा ने भी फ़िल्मों का निर्माण किया है, मगर इनमें विषय चुनने को लेकर सजगता नहीं देखी गयी, जिसका असर बॉक्स ऑफ़िस पर भी दिखा।

Posted By: Manoj Vashisth