अनुप्रिया वर्मा, मुंबई। 12 जनवरी 2005 का दिन था, मोगेंबो खामोश हो चुका था। उनके चाहने वालों की आंखें नम थी। चूंकि पर्दे पर रौब से आने वाला, नायकों पर रुआब झाड़ने वाला, लार्जर देन लाइफ इमेज रखने वाला शांत हो चुका था, वह अब किसी और सफ़र पर है, पूरे भारत में शोक का माहौल था। दर्शक लगातार न्यूज चैनल पर टक-टकी लगाये थे। वे चाहते थे कि एक आख़िरी बार उन्हें अपने खलनायक अमरीश पुरी की झलक टीवी स्क्रीन पर ही सही दिख जाए, एक बार आखिरी दर्शन हो जाये।

इधर लाखों लोगों के ज़हन में घर करने वाला कलाकार दुनिया से विदा ले चुका था और यहां एक और विदाई हो रही थी। अमरीश ने भी शायद ही अपनी जिंदगी में यह ख्वाहिश की होगी या उन्हें शायद ही इस बात का इल्म होगा कि वह अपनी सोहबत में किसी के साथ के रूप में रिश्तों की रईसी तैयार कर रहे हैं, जिसका असली सुख भोगने का मौका तो उन्हें उनके जिंदगी से चले जाने के बाद मिलेगा। ताउम्र जिन हाथों ने अमरीश के लिए लिबास बनाया जिसे पहन कर वह कभी मोगेम्बो  तो , कोयला का राजा, दुर्जन सिंह, दामिनी का लालची लायर बने। उन हाथों ने प्रण लिया अब कभी किसी फ़िल्मी सितारे के लिए इन हाथों में सुई धागा नहीं पकड़ेगा , अमरीश की उधर अंत्येष्टि हो रही थी और इधर इनकी आंखों से आंसू कम नहीं हो रहे थे। हो भी कैसे उनके संगति, उनके शुभचिंतक, उनके दोस्त, उनकी बड़े भाई अब इस दुनिया से विदा ले चुके थे। बगल में बैठे फारुख अब्दुल्ला से अपने मन की बात शेयर की, कि अब कभी किसी फ़िल्म में टेलरिंग नहीं करूंगा, किसी स्टार के कपड़े सिलने की ताकत नहीं बची मुझमें। यह कहते हुए उस शख्स की आंखों में आज भी झर-झर आंसू गिरने लगते हैं, जैसे मानो ये कल की ही बात हो। माधव अगस्ती उसी शख्स का नाम है, जिन्होंने अमरीश पुरी के लिए उनकी फ़िल्मों के किरदारों के लिए सिर्फ कपड़े नहीं सिले, बल्कि अमरीश के साथ उस पाक रिश्ते की सिलाई की, जिसमें कभी किसी रफू की गुंजाइश नहीं रही। अमरीश की फिल्म हकीकत का संवाद  है, चोला बदल लेने से चरित्र नहीं  बदलते। लेकिन वास्तविक जिंदगी में उनके किरदारों की जान रहे उनके लिबास।

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जी, यह वही माधव अगस्ती हैं, जो अमरीश पुरी के साथ उनके किरदारों को निखारने में बराबर के हिस्सेदार रहे। चूंकि अमरीश के लिए उनके लिबास भी किरदार रहे। उनका लिबास भी उनका रुआब रहा। ऐसे में माधव ने जागरण डॉट कॉम से उनसे जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से शेयर किये हैं।

अमरीश साहब के साथ-साथ तरक्की 

अमरीश के साथ उनके लिबास भी किरदार होते थे और उन किरदारों को जान फूंकते थे माधव। हफ़ीज़ होशियारपुरी की वे पंक्तियां इन दोनों के रिश्ते की कहानी पर बिल्कुल फिट बैठती है , कि मोहब्बत करने वाले कम न होंगे... तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे। अमरीश ने भी कहां ये सोचा होगा कि उन्हें जीते जी ही नहीं, बल्कि उनकी मौत के बाद भी उनका दोस्त, हमराही बना रहेगा और इस कदर मोहब्बत करेगा कि अपनी पहली मोहब्बत यानि सितारों के लिए स्टाइलिंग से ही तौबा कर लेगा। माधव बताते हैं कि यह सच है कि उस वक़्त मैं शीर्ष पर था। अमरीश साहब की वजह से ही कई सारे स्टार्स भी मेरे पास ही कपड़ों की स्टाइलिंग के लिए उस वक़्त आने लगे थे। वह कहते हैं कि प्राण, दिलीप कुमार, सुनील दत्त, रंजीत, अनुपम खेर, गुलशन ग्रोवर, जैकी, अनिल जैसी तमाम हस्तियों के लिए माधव ने काम किया। सबने बहुत प्यार सम्मान इज्जत दी। लेकिन जो प्यार और स्नेह और एक खास कनेक्शन अमरीश साहब के साथ बना, ताउम्र बरकरार रहा। माधव के लिए अमरीश की तरफ से यही बख्शीश रही कि उन्होंने दोबारा कभी फ़िल्मी लिबासों को हाथ नहीं लगाया।

ऐसा भला कौन होता है, जो कई सालों तक फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध से घिरा रहा, वो भी कपड़ों की तिलिस्मी   दुनिया में, जहां हर एक्टर के बदन पर सजा लिबास उसका किरदार होता है। अच्छे पैसे, नाम, शोहरत , फ़िल्मी सितारों के साथ उठाना- बैठना , सब कुछ तो था और आगे और मिलने की गुंजाईश भी थी, मगर फिर भी इससे मुंह मोड़ते एक बार नहीं सोचा, क्योंकि उनकी तरफ से अपने  साहब  के लिए यही तोहफा था । माधव बताते हैं कि सभी स्टार्स हमारे काम को बहुत तवज्जो देते थे । माधव कहते हैं कि अमरीश वही इज्जत बख्शते थे, वह हमेशा साथ लेकर चले। खुद बढ़े तो मुझे भी बढ़ाया। तरक्की करने का मौका दिया। उनके लिए मैं उनका सिर्फ काम करने वाला एक स्टाफ नहीं था। छोटे भाई की तरह था। उनके लिए क्या मैं इतना भी नहीं कर सकता था। माधव बताते हैं कि ऐसा नहीं है कि उनकी मृत्यु के बाद उन्हें फ़िल्मों में काम करने के लिए ऑफ़र नहीं आये। लेकिन उन्होंने एक बार दिल में ठान लिया तो ठान लिया, अब वह कभी फ़िल्मी दुनिया की किसी शख्सियत के लिए काम नहीं कर पाएंगे। वह बताते हैं कि अर्ध्य सत्य से उनके साथ की शुरुआत हुई थी। माधव ने तो  किसी संस्थान से ड्रेस डिजायनिंग या टेलरिंग का कोर्स नहीं किया है। लेकिन उन्हें रिश्तों में डिग्री हासिल करनी आती है। हां, माधव आज भारत के तमाम पॉलिटिशियन के लिबास तैयार करते हैं, जिसमें प्रणब मुखर्जी जैसे तमाम दिग्गज नाम शामिल हैं। लेकिन फ़िल्मी दुनिया से जो मोह भंग हुआ तो फिर मुड़ कर वापस नहीं देखा।

पर्सनल स्टाइलिस्ट, मिस्टर परफेक्शनिस्ट

अमरीश पुरी को उनके भाई मदन भाई ने माधव के पास भेजा था। पहली बार अमरीश ने उनसे कोट बनवाया था और उन्हें उनकी फिटिंग इतनी जंची कि उसके बाद उन्होंने अपनी हर फ़िल्म का काम माधव को ही दिया। माधव कहते हैं कि कई डायरेक्टर उनसे कहते भी थे कि हम आपको अपना कॉस्ट्यूम स्टाइलिस्ट देंगे, लेकिन अमरीश अपनी बात पर तुले रहते कि उन्हें माधव ही चाहिए।

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मोगेंबो का 25 हजार का लुक, मिली थी हजार रुपये की बख्शीश

माधव बताते हैं कि मिस्टर इंडिया जब आयी थी, इस फ़िल्म को लेकर अमरीश काफी उत्साहित थे। उन्हें अपने लुक पर काफी काम करना था। वह चाहते थे कि वह ऐसे अवतार में सामने आयें, जैसा कभी लोगों ने देखा नहीं था। माधव के साथ खूब ब्रेन स्टॉर्मिंग हो रही थी, माधव स्केच बनाते थे... रात-रात भर इसपर काम हो रहा था। काफी लुक ट्राई किये गये थे । आपको  यह बात जान कर हैरानी होगी, लेकिन कल्पना कीजिये कि उस दौर में 25 हजार की कीमत क्या रही होगी । अमरीश के मोगेम्बो का पूरा लुक 25 हजार में तैयार हुआ था। उस वक़्त के हिसाब से यह बहुत अधिक फीस थी। लेकिन माधव बताते हैं कि अमरीश ने बोनी से कहा था कि वह किसी भी तरह की कमी नहीं चाहते। बोनी ने भी अमरीश से कहा कि वह जैसी चाहें तैयारी करें। माधव अपने काम में जुट गए थे। उन्होंने जम कर मेहनत की, ड्रेस मटेरियल लाने इंग्लैण्ड गए। आज भी स्मृति के लिए मोंगेम्बो की वह छड़ी, कोट, जैकेट मखमल वाला, अंगुठियां सब संभाल कर रखी है। माधव बताते हैं कि उस वक़्त के हिसाब से मोगेम्बो का यह लुक बहुत महंगा था। लेकिन उन्हें यह मौका मिला कि बजट नहीं काम पर ध्यान दें। इसके लिए कई रातें सिर्फ माधव नहीं जागे, अमरीश भी जागे। काफी बातचीत चर्चाओं के बाद लुक फाइनल हुआ था। निर्माता बोनी इतने खुश हुए कि उन्होंने बख्शीश  के रूप में एक हजार रुपये भी दिए।

कोट पसंद, रंग रेड और ब्लैक से प्यार

माधव बताते हैं कि अमरीश को कोट पैंट्स पसंद थे। सिर्फ फ़िल्मी किरदारों के लिए ही नहीं। रियल लाइफ में भी उनके कपड़े माधव ही बनाते थे। उन्हें माधव की फिटिंग पर पूरा भरोसा हो गया था। वह कहते हैं कि उन्हें याद नहीं है, जब कभी उन्होंने उनके बनाये कपड़े रिजेक्ट किये हों। कलर्स में उन्हें लाल रंग और ब्लैक से बहुत प्यार था। इसलिए उनके हर ड्रेस में वह इन रंगों का इस्तेमाल करते थे। मोगेम्बो में भी किया। कोयला के राजा के लुक के लिए भी उन्होंने कड़ी मेहनत की थी। दामिनी का लालची लॉयर तो याद होगा आपको। उसकी निकली तोंद और बालों की लट, जिसे बार बार हिलाते हुए अमरीश कहते थे कि ये मंदिर नहीं है, यहां नारियल नहीं ठोस सबूत मांगे जाते हैं। उस लुक के लिए भी काफी मेहनत हुई थी। यह अमरीश का ही आइडिया था कि वह अपनी तोंद निकालेंगे और इसके लिए खास जैकेट बनी थी जो माधव ने ही बनाई थी।

15 दिन पहले होती थी जूतों के साथ रिहर्सल

माधव बताते हैं कि अमरीश के जूतों की डिजायनिंग भी वही किया करते थे। उनके साथ अहमद भाई की मदद से। अहमद भाई बताते हैं कि उन्हें रियल शूटिंग से 15 दिन पहले जूते बना कर तैयार होकर चाहिए होते थे। वजह यह थी कि वह जूतों के साथ भी रिहर्सल करते थे और वह मानते थे कि नए जूते पैरों को काटेंगे तो काम करने में दिक्कत होगी। 15 दिन में वह थोड़े पुराने हो जाते हैं तो आसानी से उसके साथ शूटिंग हो सकती थी। दिलचस्प बात यह है कि जैसे अमरीश खुद रेयर टैलेंट थे, उन्हें पैर भी कुदरत ने रेयर ही प्रदान किये थे। जी हां, अहमद भाई ने यह भी बताया कि उनके दोनों पैरों का साइज अलग था। 11 और 12 नंबर! ऐसे में अमरीश को तो दोनों पैर में समान ही लुक चाहिए होता था। यह भी तो संभव नहीं था कि दो पैरों के लिए दो नंबर के जूते बनें। अहमद उसमें ट्रिक इस्तेमाल करते थे। वह उसमें एक अलग तरह का सोल डालते थे और उसकी फिटिंग ऐसी होती थी कि अमरीश को कभी पता नहीं चला कि दरअसल, वह दोनों पैरों में 12 नंबर के जूते ही पहनते थे। जूतों में उन्हें बिल्कुल सही थाप चाहिए होती थी। माधव बताते हैं कि वह अपनी हर फ़िल्म में शूटिंग के कई दिनों पहले से घर में पूरे लुक के साथ रिहर्सल करते थे। इसलिए माधव उसी अनुसार अपनी शेड्यूलिंग करते थे। अमरीश पुरी की ही फिल्म मुकद्दर का बादशाह का संवाद है जो जूतों के मामले में रियल अमरीश पुरी पर भी बिल्कुल सटीक बैठता है कि नए अफसरों की तरह नए जूते भी काटते हैं । इसलिए तो अमरीश जूतों को शूट शुरू होने से पहले 15 दिन पुराना बना लेते थे ।

Posted By: Shikha Sharma

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