जयकृष्ण वाजपेयी, कोलकाता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो भी कदम उठाते हैं उसके कई निहितार्थ होते हैं। पीएम मोदी बंगाल विधानसभा चुनाव में पिछले एक सप्ताह में ताबड़तोड़ चार रैलियां करने के बाद शुक्रवार को बांग्लादेश चले गए। उनकी इस यात्रा पर तृणमूल कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों की नजर है। भला हो भी क्यों नहीं? क्योंकि, शनिवार को बंगाल में 30 सीटों पर पहले चरण का मतदान है और इसी दिन मोदी बांग्लादेश के ओराकांदी पहुंचेंगे और वहां पर मतुआ संप्रदाय के सर्वोच्च तीर्थस्थल पर अपना मत्था टेकेंगे। इस मंदिर को ठाकुरबाड़ी कहा जाता है। इस दौरान उनके साथ बंगाल के बनगांव से मतुआ महासभा के प्रमुख व भाजपा सांसद शांतनु ठाकुर भी मौजूद रहेंगे।

हरिचांद ठाकुर के मंदिर में पूजा-अर्चना करेंगे

बंगाल में मतदान के दिन पीएम मोदी के मतुआ ठाकुरबाड़ी पहुंचने के चुनावी मायने समझे जा सकते हैं। मोदी पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं, जो ओराकांदी जाकर मतुआ समुदाय के संस्थापक हरिचांद ठाकुर के मंदिर में पूजा-अर्चना करेंगे। उनका जन्म 1812 में ओराकांदी के उसी स्थान पर हुआ था, जहां पर ठाकुरबाड़ी मौजूद है। उन्हेंं मतुआ समुदाय ईश्वर का अवतार मानते हैं। मोदी का वहां मतुआ समाज के लोगों से मिलने उन्हें संबोधित करने की भी बात है। उनकी इस यात्रा को लेकर दोनों ओर के मतुआ समुदाय काफी खुश है। हरिचांद ठाकुर ने नामशुद्रों को सामाजिक समानता दिलाने के लिए इस संप्रदाय की स्थापना की थी और सामाजिक सुधार की दिशा में बड़े पहल किए थे। बाद में उनके बेटे गुरुचांद ठाकुर ने इस संप्रदाय का प्रचार-प्रसार किया था।

ऐसे शरणार्थी हैं, जिन्हेंं आजतक भारतीय नागरिकता नहीं मिल पाई

भारत के विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से बड़ी संख्या में मतुआ बंगाल आ गए थे। यह ऐसे शरणार्थी हैं, जिन्हेंं आजतक भारतीय नागरिकता नहीं मिल पाई है। ऐसे मतुआ शरणार्थी उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, नदिया, जलपाईगुड़ी, सिलीगुड़ी, कूचबिहार और पूर्व व पश्चिम बद्र्धमान जिले में फैले हुए हैं। देश विभाजन के बाद बाद हरिचंद-गुरुचंद ठाकुर के वंशज प्रमथा रंजन ठाकुर और उनकी पत्नी बीणापानी देवी उर्फ बड़ो मां ने मतुआ महासंघ की क्षत्रछाया में राज्य में मतुआ समुदाय को एकजुट किया और उन्हें भारतीय नागरिकता दिलाने के लिए कई आंदोलन किए।

2019 के लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी बड़ो मां के घर पहुंच कर उनके पांव छूए थे। बाद में चुनावी सभा में उन्होंने वादा किया था कि उन सभी को नागरिकता दी जाएगी। माना जा रहा है कि उसी के बाद संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) पास कराया गया, लेकिन लागू नहीं होने से मतुआ समुदाय नाराज हो गए थे। इसके बाद उनकी नाराजगी दूर करने के लिए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को बनगांव के ठाकुर नगर में सभा करनी पड़ी और कहना पड़ा कि कोरोना टीकाकरण के बाद उसे लागू किया जाएगा। अब मोदी ओराकांदी जाकर मतुआ समुदाय का दिल जीतने की कोशिश में है।

यह है चुनावी गणित

बंगाल की 30 विधानसभा सीटों पर मतुआ वोटर प्रभावी है, जबकि कुल 70 सीटों पर उनकी अच्छी-खासी आबादी है। वैसे तो मतुआ की आबादी बंगाल में करीब दो करोड़ होने की बात कही जाती है, लेकिन कहा जाता है कि इनकी संख्या एक करोड़ से कम भी नहीं है। यह सभी अनुसूचित जाति की श्रेणी में आते हैं। बंगाल में करीब 25 फीसद एससी आबादी है जिनमें 17 फीसद मतुआ के होने की बात है।