आशुतोष झा, कोलकाता। डर, जोर और हवा.. ये तीन शब्द बंगाल की चुनावी राजनीति को परिभाषित करते रहे हैं। पहले करीब साढ़े तीन दशक की वामपंथी सरकार और फिर एक दशक से चल रही तृणमूल कांग्रेस की सरकार के काल में हुए चुनावों में यह बार-बार साबित हुआ है। इस बार भी कुछ अलग नहीं है, बस लोगों की ख्वाहिश है, अब प्रदेश डर और जोर के दौर से निकले। शायद यही बदलाव की हवा को बल दे रहा है। ऐसे में दो सवाल बहुत प्रमुखता से हर किसी की जुबान पर हैं- पहला, वाम के लाल किला को ध्वस्त करने वाली तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने आखिर कहां चूक की और सामने से चुनौती दे रही भाजपा ने डर, जोर और हवा का रुख कितना बदल दिया?

पूरी स्थिति तो नतीजा आने के बाद स्पष्ट होगी, लेकिन पहले दो चरण के चुनाव के बाद ही कोलकाता की गलियों में सुर बदले हुए से हैं। एक बेकरी पर काम करने वाले मैनेजर संजीव सेन कहते हैं- वोट तो हमेशा से यहां के लोग बड़ी संख्या में देते ही रहे हैं, लेकिन लगता है कि इस बार अपनी-अपनी पसंद का अधिकार मिला है। वरना हमेशा से यह डर रहा करता था कि अगर इलाके से सत्ताधारी पार्टी के अलावा कोई दूसरा जीता तो लेने के देने पड़ जाएंगे। दरअसल, इसी डर के कारण वोट देते वक्त अक्सर लोगों ने दबंग सत्ताधारी दल को ही वोट दिया।

जमीनी नेताओं से सूखी रही भाजपा में खड़े हुए नए चेहरे

यही डर वाम के वक्त में था और तृणमूल के वक्त में जारी रहा। जब किसी ने इस डर के खिलाफ खड़े होने की शक्ति दिखाई तब लोगों ने भी साहस दिखाया। इसे कहते है 'जोर' यानी ताकत। लड़ने का साहस पैदा करने तक सीमित नहीं बल्कि आम लोगों में यह विश्वास पैदा करना कि सामने वाले में लड़ने का भी दम है और बचाने की कूबत भी। पहले ममता ने यह जोर दिखाया था, इस बार भाजपा ने यह दिखाया है। जाहिर तौर पर इसका बहुत बड़ा कारण यह है कि कुछ वक्त पहले तक स्थानीय और जमीनी नेताओं से सूखी रही भाजपा में ऐसे चेहरे खड़े हुए, जो कभी ममता सरकार के लिए शक्तिशाली स्तंभ हुआ करते थे, जबकि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने भी सुरक्षा का भरोसा पैदा कर दिया। इन दोनों फार्मूले के बाद ही बंगाल में किसी के लिए हवा बनती है।

मतदाताओं में ममता सरकार के खिलाफ लड़ने का जोर भाजपा ने डेढ़ साल पहले लोकसभा चुनाव के वक्त ही दिखा दिया था। एक बड़ा फर्क और दिख रहा है, पहले मतदाता चुप्पी साधे रहते थे, इस बार कुछ ज्यादा मुखर हैं। तीन दिन पहले नंदीग्राम में जिस तरह ममता बौखलाई हुई दिखीं, उससे डर शायद और दूर भाग गया है।

भाजपा के लिए चुनौती होगा राजनीतिक कल्चर में बदलाव

ममता ने एक बड़ी गलती यह की है कि उन्होंने खुद ही चुनाव को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ लड़ाई में बदल दिया। किसी भी राज्य में विरोधी दल ने कभी ऐसी चूक नहीं की। अगर वाम सरकार के साथ तुलना की बात हो तो ममता की चूक यह रही कि उन्होंने जाने अनजाने पार्टी और सरकार में ऐसे लोगों की कतार लगा दी, जिससे वाम सरकार बचती रही थी और इसीलिए सत्ताविरोधी लहर पैदा होने में लंबा वक्त लगा।

बंगाल की राजनीति में लंबे अरसे से रचे बसे सच्चिदानंद राय कहते हैं- वाम के काल में हुड़दंगियों की ऐसी लंबीचौड़ी फौज थी, जो चुनाव या रैलियों के वक्त सक्रिय होती थी, लेकिन पार्टी ने सरकार तो क्या उन्हें पार्टी की प्राथमिक सदस्यता तक में हिस्सेदारी नहीं दी। उन्हें परजीवी बनाकर खड़ा रखा गया था। ममता के काल में ये लोग पार्टी और सरकार दोनों जगह काबिज हो गए। जो लोग वाम के काल में हर तरह से समृद्ध रहते हुए भी राजनीतिक शक्ति के मामले में विपन्न थे, ममता के काल में वह शक्तिसंपन्न हो गए। राय कहते हैं- अगर भाजपा सरकार में आती है तो उसके लिए भी यही सबसे बड़ी चुनौती होगी। वाम से ममता काल तक में डर और जोर का जो कल्चर बरकरार रहा या बद से बदतर हुआ, उसे सुधार कर ही भाजपा अपनी छवि बचा पाएगी।