लखनऊ, केशरीनाथ त्रिपाठी। UP Chunav 2022: चुनाव लोकतंत्र का उत्सव है जो समाज की दिशा व दशा बदलता है। इसके साथ राजनीतिक दलों व नेताओं के लिए परीक्षा की घड़ी भी होती है चुनाव। निर्णायक की भूमिका में जनता होती है। जनता चाल, चरित्र व चेहरा के साथ विचारधारा के आधार पर जनप्रतिनिधि (नेता) का चुनाव करती है। हर दल की आत्मा उसकी विचारधारा होती है।

दल से जुड़ने वाला नेता उसी विचारधारा के प्रति समर्पित होकर जनता के बीच जाता है। उसी के आधार पर उसे वोट मिलता है। जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री, डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पं. दीनदयाल उपाध्याय, डा. राममनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी, कांशीराम, कमलापति त्रिपाठी, चौ. चरण सिंह, वीर बहादुर सिंह, कल्याण सिंह जैसे अनेक नेता हैं जिन्होंने स्वयं का जीवन अपनी विचारधारा के लिए खपा दिया। विचारधारा से समझौता नहीं किया।

छोटे दलों की बड़ी मांगें, जनहित में नहीं : आज के परिवेश में देखूं तो राजनीति में न विचारधारा का महत्व है, न सेवा व सिद्धांत कहीं नजर आता है। अब राजनीति में स्वार्थ हावी है। नेताओं को सत्ता, परिवार, दल व संपत्ति की चिंता है। इसी से दलबदल बढ़ा है। 1970 के दशक में दलबदल की शुरू हुई प्रवृत्ति निरंतर बढ़ती गई। विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लगने के बाद हर दिन कोई न कोई नेता दल बदलता है। जहां रहकर उसने सत्ता का सुख भोगा है, उसी दल के खिलाफ बोलने से परहेज नहीं करता। राजनीतिक दलों में समझौता व विलय भी हो रहे हैं। छोटे-छोटे दल जिनका क्षेत्र विशेष में महत्व है, वो भी बड़ी मांग कर रहे हैं। यह जनहित व समाजहित में नहीं है, घातक प्रवृत्ति है।

दल बनाने का बने कड़ा मानक : राजनीतिक दलों की बढ़ती संख्या भी सामाजिक तानाबाना बिगाड़ रही है। गिने-चुने लोग मिलकर राजनीतिक दल बना रहे हैं। सिर्फ जाति व धर्म के आधार पर दल बन रहे हैं। इस पर रोक लगनी चाहिए। जब तक प्रदेश की कुल जनसंख्या के एक-दो प्रतिशत लोगों का समर्थन हासिल न कर लें, तब तक उसे राजनीतिक दल के रूप में मान्यता नहीं मिलनी चाहिए। आज छोटी-छोटी जाति के आधार पर राजनीतिक दल बन रहे हैं जो अनुचित है। इससे चुनाव में सौदेबाजी बढ़ती है।

दल बदलना है तो साल भर पहले छोड़ें पद : राजनीति विचारधारा पर आधारित होनी चाहिए। जो किसी सदन (लोकसभा अथवा विधानसभा) के सदस्य हैं, चुनाव से चंद दिन अथवा महीने भर पहले वो नेता दल बदलते हैं तो उन्हें चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि यह सत्ता लोभ की पराकाष्ठा है और जनता के प्रति जवाबदेही से बचना है। यह कृत्य उन मतदाताओं के साथ धोखा है जिन्होंने उनके ऊपर भरोसा किया है। इधर जितने नेताओं ने दल बदला है उनकी निष्ठा, समर्पण जनता व समाज के प्रति नहीं है, क्योंकि जहां थे वहां रहकर कुछ नहीं किया। अब आगे भी कुछ करेंगे उसकी कोई गारंटी नहीं है। सदन के सदस्यों को दल बदलना है तो एक साल पहले पद छोड़ दें। छह महीने के अंदर उप चुनाव होगा, उसमें नए दल से जुड़कर चुनाव लड़ें। इसके लिए संविधान में संशोधन करने की जरूरत है। इससे राजनीतिक सौदेबाजी रुकेगी और विचारधारा के प्रति लोगों का रुझान बढ़ेगा। ऐसा करके राजनीतिक चिंतन बढ़ाया जा सकेगा।

मुफ्तखोरी से खोखला होगा समाज बढ़ाई जाए लोगों की सामथ्र्य : चुनाव में हर दल लुभावने वादे कर रहा है। जनता को प्रभावित करने के लिए मुफ्त में बड़ी-बड़ी चीजें देने की बात हो रही है। कोई भी राष्ट्र व समाज तब प्रगति करेगा जब हम उसके अंदर क्षमता का निर्माण करेंगे। मुफ्तखोरी से समाज समृद्ध नहीं होगा, न ही लोगों का सामथ्र्य बढ़ेगा। इससे मांगने की प्रवृत्ति जरूर बढ़ने लगी है। जनता को प्रोत्साहित करने के लिए उनकी क्षमता विकसित करें, व्यक्तित्व का विकास करके नेतृत्व करने को आगे लाने की जरूरत है। कुछ राजनीतिक दल जाति आधारित जनगणना कराने की बात कहते हैं। जाति आधारित जनगणना कराने से सामाजिक ढ़ांचे का स्वरूप बिगड़ेगा। फिर लोग उसी के आधार पर आरक्षण व अन्य चीजों की मांग करेंगे, जिसे पूरा करना संभव नहीं होगा। जाति आधारित जनगणना के बजाय हर व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कदम उठाना चाहिए। 

[लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष व पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल रह चुके है]

Edited By: Sanjay Pokhriyal

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