झांसी (जेएनएन)। बुंदेलखंड की जमीन पथरीली है तो यहां के लोगों के सियासी तेवरों में भी जातीय तपिश साफ भांपी जा सकती है। इसलिए राजनीतिक पार्टियां जातिगत आंकड़ों से ही नफा-नुकसान आंक रही हैं। भाजपा पर लोकसभा प्रदर्शन को दोहराने की चुनौती है तो विरोधी दलों पर खिसकती जमीन को बचाने का दबाव। नेशनल ब्यूरो के उप ब्यूरो प्रमुख सुरेंद्र प्रताप सिंह ने पाठा की नब्ज टटोली-

बुंदेलखंड में न तो किसी दल के समर्थन में हवा है और न ही किसी के विरोध में। वैसे तो यहां मुद्दों की भरमार है, लेकिन कोई दल इसमें हाथ नहीं डालना चाहता है। मतदाताओं की चुप्पी ने राजनीतिक दलों की धुकधुकी को तेज कर दिया है। सारा दारोमदार उम्मीदवारों के अपने रसूख और जातिगत आंकड़ों से होने वाले नफा नुकसान पर टिक गया है। भाजपा लोकसभा चुनाव के अपने शानदार प्रदर्शन की खुमारी में है तो अन्य विपक्षी दलों पर अपनी खिसकती सियासी जमीन को बचाने का दबाव है।

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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के चौथे चरण में 23 फरवरी को बुंदेलखंड के सात जिलों की 19 विधानसभा सीटों पर मतदान होंगे। लोकसभा चुनाव में देश और राज्य में चली 'मोदी लहर का असर इस इलाके पर भी था। यहां की चारों लोकसभा सीटों -झांसी, जालौन, हमीरपुर व बांदा- पर भाजपा उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी।
लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के कारण चार लोकसभा क्षेत्रों के 19 विधानसभा क्षेत्रों में से 18 पर भाजपा उम्मीदवारों ने बढ़त बनाई थी। झांसी लोकसभा सीट का सिर्फ मऊ रानीपुर विधानसभा क्षेत्र ही ऐसा था, जहां सपा उम्मीदवार ने बढ़त बनाई थी। चित्रकूट के पत्रकार विवेक अग्रवाल का कहना है कि लोकसभा चुनाव की आंधी तो नहीं है, लेकिन बयार तो है ही। हालांकि युवा वर्ग में इस चुनाव को लेकर लोकसभा चुनाव जैसा उत्साह नहीं है। चुनावी लहर और माहौल युवा वर्ग और व्यापारी बनाता है, जो चुप्पी साधे है, लेकिन भाजपा को संसदीय चुनाव जैसी बढ़त मिलने की बात फिलहाल बुंदेलखंड या यूं कहें कि पूरे सूबे में नहीं है।

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एक तरफ युवा शांत है तो दूसरी ओर आम मतदाता मौन है। रही अंडरकरंट की बात तो उसे भांपना आसान नहीं है। बुंदेलखंड की राजनीति पर नजर रखने वाले मानिकपुर के डाक्टर रामजीवन का कहना है कि चुनावी ऊंट किस करवट बैठेगा? इसका अंदाजा ठेठ गांव के लोगों के मिजाज से ही भांपा जा सकता है। यहां के लोगों की माली हालत पर नोटबंदी का कोई असर नहीं है। हां, कुछ हद तक व्यापारी वर्ग जरूर इससे परेशान था तो अब नहीं है। इस बार का यह गजब का चुनाव है जहां न सत्ता विरोधी लहर है और न ही किसी मुद्दे पर कोई बहस चल रही है। बांदा के नरैनी बाजार में चाय की चुस्की लेते लोगों की नजर में इस चुनाव में बुंदेलखंड के मुद्दों पर चर्चा तक नहीं हो रही है।

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बुंदेलखंड क्षेत्र में 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और समाजवादी पार्टी में बराबर की टक्कर रही। बसपा ने सात सीटों पर कब्जा जमाया तो समाजवादी पार्टी को छह सीटों पर बढ़त मिली थी। इसके अलावा कांग्रेस चार और भाजपा के हाथ दो सीटें आई थीं। हालांकि चरखारी सीट पर हुए उपचुनाव में सपा ने बाजी कर अपनी संख्या बसपा के बराबर कर ली थी।
विधानसभा का यह चुनाव पिछले चुनावों के मुकाबले अलग है। भाजपा पर जहां लोकसभा चुनाव के शानदार प्रदर्शन को दुहराने की चुनौती है तो दूसरे दलों को अपनी खिसकती सियासी जमीन को बचाने का दबाव। कांग्रेस व सपा के साझा चुनाव में आठ सीटों पर कांग्रेस ने प्रत्याशी उतारे हैं तो 11 पर समाजवादी पार्टी ने। बसपा अपने वोट बैंक के सहारे इस बार उम्मीदें बांधे हुए है।

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Posted By: Ashish Mishra