वाराणसी [अशोक सिंह]। लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनावी महासमर जीतने में कुछ प्रमुख सभा स्थल गवाह रहे हैं। कुछ मैदानों को तो जीत के लिए शुभ माने जाते रहे हैं। मैदान चयन राजनेता की सियासी हैसियत का पैमाना भी माना जाता रहा है। अवैध कब्जे व आबादी के बीच हो जाने की वजह से कुछ मैदान अब नेताओं की पसंद नहीं रह गए हैं। साथ ही पार्टियों की तैयारी की वजह से मैदान छोटे पडऩे लगे हैं। इस वजह से कहीं खाली खेत तो कहीं फसल काट कर सभाएं की जा रही हैं। इन सबके बावजूद ये मैदान सियासी हुंकार के गवाह बने हुए हैं। वे अपने में बहुत सी यादें समेटे हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के 10 जिले देश और प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण रोल अदा करते रहे हैं। इसलिए चाहे पं. जवाहर लाल नेहरू रहे हों या इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी, सभी जनता के बीच पहुंचे। मैदानों को लेकर लोगों के जेहन में यादें मौजूद हैं। 

नहीं आए राजेश खन्ना तो देर रात लौटे लोग : जौनपुर के गड़वारा विधानसभा क्षेत्र में 2002 में चुनाव प्रचार के लिए राजेश खन्ना आए थे। जनता को पता चला कि महराजगंज के बाद उनकी अगली सभा बरईपार में है। लोगों को गर्दन टेढ़ी कर अपनी अदाकारी से कायल बनाने वाले अभिनेता को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग वहां पहुंच गए। देर रात तक राजेश खन्ना नहीं पहुंचे। बाद में घोषणा हुई तब लोग लौटे। 

जौनपुर जनपद मुख्यालय स्थित कृषि विभाग का विशाल मैदान कभी बड़े नेताओं की पहली पसंद हुआ करता था। समय के साथ यह एक पार्क में तब्दील हो गया। यहां कभी अटल बिहारी वाजपेयी, इंदिरा गांधी, वीपी सिंह, मुलायम सिंह यादव, राजीव गांधी जैसे दिग्गज नेताओं की सभाएं हुआ करती थीं। बीआरपी कालेज मैदान को बड़े नेताओं के स्टेटस से जोड़कर देखा जाता रहा है। बढ़ती जनसंख्या व सिकुड़ते क्षेत्र के कारण अब इसका रुतबा पहले जैसा नहीं रहा। टीडी कालेज का मैदान लंबे अर्से से बड़ी चुनावी सभाओं के लिए बदस्तूर अपनी हैसियत कायम रखे हुए है। साथ ही शाहगंज का रामलीला मैदान, जलालपुर के बयालसी कालेज, मडिय़ाहूं के विवेकानंद कालेज का मैदान लोकतंत्र के सियासी महासमर का अभी भी मूक गवाह है। 

जिसे बात अच्छी न लगे वह चला जाए और चल दी जनता : चुनावी सभाओं वाले मैदान की बात आती है तो मीरजापुर के जमालपुर स्थित बाजार स्थित देवकली इंटर कालेज मैदान का जिक्र जरूरी हो जाता है। 1991 में कांशीराम ने चुनाव प्रचार करते हुए कहा कि कुछ लोगों को मेरा संबोधन अच्छा नहीं लगेगा। ऐसे लोग सभा से बाहर निकल सकते हैं। उनके स्पष्ट संकेत को समझकर तमाम लोग सभा से उठकर चले गए थे। इस मैदान में अन्य नेताओं समेत जयाप्रदा, जया बच्चन ने भी सभा की है लेकिन छोटा होने के कारण लालकृष्ण आडवाणी एवं पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की जनसभा को अन्यत्र कराना पड़ा था। छोटी सभाओं के लिए आज भी बेहतर स्थान है। विंध्य की धरा पर इंदिरा गांधी ने वर्ष 1977 में नगर के राजकीय इंटर कालेज परिसर में बने मंच से भाषण दिया था। बाबू उपरौध इंटर कालेज मैदान में भ्रष्टाचार मुक्त भारत रथयात्रा पर निकले पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने वर्ष 2009 में सभा की थी। 

प्रशासन ने पहले ही दूसरे को दे दिया सभास्थल : चंदौली के मुख्य मैदान में 1996 के चुनाव में कल्याण सिंह की सभा होनी थी लेकिन सभास्थल नहीं मिलने के कारण उन्हें मां काली मंदिर परिसर में अनुमति दी गई। कल्याण सिंह उस समय अयोध्या मुद्दे की वजह से बड़े बनकर उभरे थे। जनता का रेला उमड़ पड़ा। विशाल मैदान छोटा पड़ गया। भीड़ को नियंत्रित करने में भाजपा व पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ी। जिले में अन्य मैदानों में चकिया का आदित्य नारायण राजकीय इंटर कालेज का मैदान राजनीतिक दिग्गजों की जनसभाओं का साक्षी है। यहां हेमवती नंदन बहुगुणा, कमलापति त्रिपाठी, राजनाथ सिंह, मुलायम सिंह यादव, मायावती, अखिलेश यादव के अलावा बसपा संस्थापक कांशीराम सहित कम्युनिस्ट पार्टी के कई बड़े नेता जनसभा कर चुके हैं। यह अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। सकलडीहा कस्बा के सघन तिराहा के समीप सत्ती माई का मैदान अटल बिहारी बाजपेयी समेत अन्य ने नेताओं की सभा का साक्षी है। 

मोदी के लिए खेत में बनाना पड़ा सभास्थल : लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा के पीएम पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी को सुनने के लिए जगह-जगह से लाखों लोग जुट रहे थे। इसे देखते हुए पार्टी को सोनभद्र के राबट्र्सगंज के आंबेडकर नगर में खेत समतल कर सभा के लिए तैयार करना पड़ा। हालत यह हुई कि चिलचिलाती धूप के बावजूद सभा के दिन वह व्यवस्था भी छोटी पड़ गई। लोग मोदी की एक झलक नहीं पा सके और उन्हें सड़क पर खड़े होकर ही भाषण सुनना पड़ा। यहां राबट्र्सगंज का हाइडिल मैदान, रेलवे मैदान, दुद्धी नगर के टाउन क्लब, रामलीला मैदान और जीआइसी मैदान में राष्ट्रीय स्तर के नेता अपनी हुंकार भर चुके हैं। 

अटल जी को देखने उमड़ा शहर, तिल रखने की जगह नहीं: आजमगढ़ में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तीन बार यात्रा की थी। उनकी 1993-94 की उनकी यात्रा कई मायनों में ऐतिहासिक है। वाराणसी से लालगंज होते हुए आजमगढ़ आए थे। वर्षों बाद किसी रैली में देरी से पहुंचे थे। उस समय उन्हें देखने के लिए दलीय सीमा टूट गई थी। पूरे शहर में तिल रखने की जगह नहीं थी। उन्होंने अपने भाषण में कहा था कि उनकी उम्र बढ़ गई है। वाराणसी से आजमगढ़ आते हुए यह नहीं समझ पाए कि सड़क गड्ढे में हैं या गड्ढे में सड़क। उनका यह जुमला आज भी लोगों की जुबान पर है। शहर का जजी मैदान अटल बिहारी बाजपेयी की रैली का गवाह बना था। मैदान में कहा था कि हम आजमगढ़ में एक भी सीट जीते तो यूपी की सत्ता में आ जाएंगे।  

जजी के मैदान से इंदिरा गांधी, एचडी देवगौड़ा, राजीव गांधी, लालू यादव हुंकार भर चुके हैं। डेढ़ दशकसे इस मैदान में चुनावी सभा पर प्रतिबंध है। साथ ही डीएवी इंटर कालेज मैदान, आइटीआइ मैदान, रेलवे मैदान इंदिरा गांधी से लेकर देवी लाल व जयप्रदा तक का साक्षी है। 

गाजीपुर के लंका मैदान में नेहरू से आडवाणी तक ने की सभा : जनपद में लंका मैदान पंडित जवाहर लाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी आदि ने जनसभा की। समय के साथ मैदान पहले से और अच्छा हो गया है। चारों तरफ बाउंड्री वाल और भव्य गेट बना दिया गया है। पीजी कालेज मैदान में इंदिरा गांधी ने तो टाउनहाल में अटल बिहारी वाजपेयी ने जनसभा की थी लेकिन वर्तमान में अतिक्रमण के कारण यह मैदान जनसभा करने लायक नहीं रहा है। आइटीआइ मैदान में नरेंद्र मोदी ने दो बार बड़ी जनसभा की लेकिन यहां अब स्टेडियम और मेडिकल कालेज बन रहा है। 

बेनिया का हुआ सियासी सन्यास : वाराणसी में गुलामी के दौर में स्वतंत्रता की लड़ाई लडऩे वालों के ओजस्वी भाषण से लेकर आजाद भारत में जेपी-अटल से लेकर देश के कई दिग्गज राजनीतिज्ञों के वादे-इरादे, तेवर का गवाह रहा बेनियाबाग का ऐतिहासिक मैदान इस बार चुनावी सन्यास ले रहा है। वजह-विकास कार्य। नगर निगम और विकास प्राधिकरण की तरफ से स्मार्ट सिटी योजना के तहत यहां कई प्रोजेक्ट चल रहे हैं। यहां सबसे पहली चुनावी सभा 1952 में सरदार बल्लभ भाई पटेल की हुई थी। यहीं पर बापू की अस्थियां रखी गईं थीं। 2014 में मोदी को सपा की अखिलेश सरकार ने अनुमति नहीं दी। कहा कि मुस्लिम बहुल इलाका होने से स्थिति बिगड़ सकती है। 1997 में अटल जी की ऐतिहासिक सभा के दौरान जमकर पानी बरसा लेकिन भीड़ टस से मस नहीं हुई। इसके अलावा टाउन हाल मैदान एक गवाह रहा है। अब कुछ नेताओं की सभाएं कटिंग मेमोरियल तो छोटी कटिंग में हो रही हैं। समय-समय पर काशी विद्यापीठ, डीएलडब्ल्यू में सभाएं हुईं। मोदी के लिए तो 2014 में शहर से 20 किलोमीटर दूर खेत समतल करना पड़ा जिसमें लगभग चार लाख से अधिक की भीड़ बताई जाती है। 

इंदिरा जी के इंतजार में अलाव तापते रहे लोग : मऊ जिले में कई मैदान तो दशकों से सियासी सभाओं के मूक गवाह हैं। 1980 का चुनाव था। जीवनराम छात्रावास में इंदिरा जी की सभा होनी थी। शाम चार बजे की बजाय देर रात इंदिरा जी नहीं आईं। लोग ठंड के आगे बेबस थे लेकिन मैदान नहीं छोड़ा। लोग अलाव जलाकर डटे रहे। इंदिरा जी सुबह चार बजे आईं। नेहरू जी के लिए 1952 के चुनाव में ख्वाजाजहांपुर में खेत काटना पड़ा। इसी तरह 2017 के विधानसभा चुनाव के पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम के लिए सिविल लाइंस भुजौटी में खेत काटकर मैदान बनाया गया। शहर के बीच स्थित जीवनराम छात्रावास का मैदान शुरू से राजनीतिक रैलियों का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां श्रीमती इंदिरा गांधी, वीपी सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह, राहुल गांधी, अखिलेश यादव, मुलायम सिंह यादव समेत तमाम नेता जनसभाओं को संबोधित कर चुके हैं। इसी तरह रेलवे मैदान भी बड़ी रैलियों का गवाह है। 

Posted By: Abhishek Sharma

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