लखनऊ (अवनीश त्यागी)। उत्तर प्रदेश में सत्रहवीं विधानसभा के गठन को लेकर आज होने वाली मतगणना को लेकर राजनीतिक दल के प्रमुख नेताओं की धड़कने निश्चित रूप से बढ़ी होंगी। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। किस दल में किस नेता की मेहनत और उसकी प्रतिष्ठा अहम है और किसी संगठनात्मक क्षमताओं का आकलन किया जाएगा।
उत्तर प्रदेश में सत्रहवीं विधानसभा के नए सदस्यों का फैसला आज हो जाएगा। मतगणना से पहले विभिन्न चुनावी सर्वे रिपोर्ट आने से सभी दलों के ओहदेदारों की धुकधुकी बढ़ी है। जहां 403 विधायकों का फैसला होगा वहीं पार्टी संगठनों की कमान संभाले अलंबरदारों की संगठनात्मक क्षमताओं का आंकलन भी होगा। सबसे बड़ा इम्तिहान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का ही होगा। अपनी मुख्यमंत्री पद की कुर्सी को बचाए रखने के साथ समाजवादी पार्टी में राष्ट्रीय अध्यक्ष की पदवी संभालने को सही सिद्ध करना होगा। टिकट बंटवारे से लेकर कांग्रेस से गठबंधन करने आदि में केवल अखिलेश की हीचली। पांच वर्ष बहुमत की सरकार चलाने के बाद अपनी शर्तो पर संगठन की बागडोर संभालने वाले अखिलेश यादव के लिए चुनावी नतीजे सबसे बड़े इम्तिहान से कम नहीं है। अखिलेश के साथ ही उनकी युवा मंडली (कोर टीम)के रणनीति कौशल की परख भी होगी। सत्ता में बने रखने को किए प्रयोगों का रिजल्ट भी चुनावी नतीजों में छिपा होगा। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भले ही खुद सीधे चुनाव मैदान में नहीं है परंतु सपा का पूरा दारोमदार उनके कंधों पर ही है। 
बसपा के लिए अब नहीं तो.... 
वर्ष 2012 में सूबे की सत्ता से बेदखल बहुजन समाज पार्टी के लिए गत लोकसभा चुनाव भी बेहद दुखदायी था। कोई सांसद न चुने जाने की भरपाई सत्ता में वापसी से संभव होगी। मायावती खुद तो चुनाव नहीं लड़ रही परंतु बसपा ही अकेली ऐसी पार्टी है, जो सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। मायावती ने चुनाव जीतने के लिए अब की बार कई प्रयोग किए है। दलित मुस्लिम गठजोड़ को ताकत देने एवं आधे से अधिक नए चेहरों को चुनाव में मैदान में उतारने का नफा-नुकसान आज वोटों की गिनती के बाद ही तय होगा। 
बसपा संगठन वैसे तो ओनली मायावती माना जाता है परंतु प्रदेश अध्यक्ष पद की कमान रामअचल राजभर के हाथ में है। रामअचल खुद भी चुनाव मैदान में है परंतु उनके प्रदेश अध्यक्ष पद पर रहते बसपा पांच साल बाद सत्ता में वापसी होती है तो निश्चत तौर पर उनको भी शाबासी मिलेगी। इसके अलावा महासचिव सतीश चंद्र मिश्र और नसीमुद्दीन सिद्दीकी की मेहनत के लिए भी जनता कल रिजल्ट देने वाली है। 
एग्जिट पोल से सर्वाधिक उत्साह में भाजपाई हैं। सूबे में करीब 14 वर्ष बाद सियासी वनवास खत्म होने के दावे भाजपा नेता कर रहे हैं। गत लोकसभा चुनाव की तरह इस बार भी नरेंद्र मोदी का जादू भी सर चढ़ कर बोलता दिखा। चुनाव में जीत हार का सेहरा भी उनके सिर पर ही बंधेगा। उधर, राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह द्वारा बहा गया पसीना भी असर दिखाएगा लेकिन प्रभारी ओमप्रकाश माथुर के बनाए चुनावी समीकरणों की थाह नापी जाएगी। संगठन महामंत्री सुनील बंसल के प्रबंधन और प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य की अध्यक्षीय कुशलता का पता चलेगा। वहीं हाईकमान द्वारा आजमाए पिछड़ा कार्ड की परख भी होगी। 
कांग्रेस ने दिया सपा का साथ
27 साल यूपी बेहाल नारा देकर अपना मिशन-2017 आरंभ करने वाली कांग्रेस आजादी के बाद से सबसे कम सीटों पर उम्मीदवार उतारने को मजबूर हुई। चुनावी तालमेल में सपा के साथ उतरी कांग्रेस में संगठन से ज्यादा गठबंधन प्रयोग का दम देखा जाएगा। नतीजे साबित करेंगे कि वर्ष 2019 में कांग्रेस किस दिशा जाएगी? गत लोकसभा चुनाव के बाद संगठन में किया बदलाव कितना फलीभूत होगा? अध्यक्ष की कुर्सी से डा. निर्मल खत्री और प्रभारी पद से मधुसूदन मिस्त्री को मुक्त करने का लाभ दिलाने में प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर व प्रभारी गुलाम नबी आजाद कितने कारगर साबित हुए। चुनाव प्रबंधन की कमान को प्रशांत किशोर पीके के हाथ में सौंप देने की लाभ हानि भी चुनावी नतीजे आने के बाद आंकी जाएगी। 
चुनाव परिणाम की बेचैनी केवल दलों में ही नहीं वरन स्थानीय पार्टियों में काफी है। खासकर राष्ट्रीय लोकदल के लिए जीवन मरण जैसा सवाल है। लोकसभा चुनाव में खाता खोलने में नाकाम रही पार्टी गठबंधन की सियासत में भी हाशिए पर पहुंच गयी थी। चुनावी सहयोगी तलाशने का इंतजार बेकार गया तो मजबूरन अकेले चुनाव में कूदा पड़ा। रालोद सुप्रीमों में जाट वोटरों में उत्साह बनाए रखने के लिए जयंत चौधरी को मुख्यमंत्री पद के लिए पार्टी का चेहरा कहकर प्रचारित किया। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद बिखरे जाट मुस्लिम समीकरण को साधने के लिए पूर्व मंत्री डा. मसूद अहमद को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी भी सौंपी। सूबे की सत्ता में अपना दखल बनाए रखने को किए गए उपायों की कामयाबी शनिवार को नतीजों के बाद ही पता चलेगी। 
वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में चार सीटों पर जीत हासिल कर चौंका देने वाली पीस पार्टी के मुखिया डा. अय्यूब के लिए पहली चुनौती पुराना प्रदर्शन दोहराना होगी। विभिन्न आरोपों में घिरे अय्यूब की चुनावी नतीजों को लेकर बेचैनी अधिक है। अपने बेटे को सियासी विरासत में आगे बढ़ाने के साथ ही उनकी पार्टी का भविष्य भी चुनावी नतीजों से तय होगा। बड़े दलों का सियासी खेल बिगाडऩे वाली पीस पार्टी अब अपनी प्रतिष्ठा बचाने के संकट में है। दूसरी ओर दो गुटोंं में विभाजित अपना दल में किसका दबदबा रहेगा, यह परिणाम तय करेंगे।

Posted By: Dharmendra Pandey

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