लखनऊ (जेएनएन)। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव परिणाम से पहले के रुझान में भारतीय जनता पार्टी को सबसे बड़ी पार्टी या बहुमत की सरकार बनाते दिखाया है। इसके बाद यह सवाल बेहद आम है कि भारतीय जनता पार्टी को अगर जनता का समर्थन मिलता है तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कौन बैठेगा।
भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में सत्रहवीं विधानसभा के गठन के लिए हुए चुनावों में बिना किसी मुख्यमंत्री चेहरे के मैदान में उतरी। चुनाव के दौरान भी कई बार इस पर जोरदार सवाल भी उठा था। भाजपा पर सवाल इसलिए भी उठा क्योंकि कांग्रेस तथा सपा गठबंधन की तरफ से अखिलेश यादव सीएम चेहरा हैं। बसपा में भी मायावती के कद का कोई नहीं है। रालोद ने भी जयंत चौधरी को सीएम फेस बनाया है। 
अब बात उत्तर प्रदेश में भाजपा के मुख्यमंत्री पद के दावेदार की। यह हैं भाजपा के मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार।
राजनाथ सिंह
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और संगठन से लेकर संघ तक इनकी धमक जगजाहिर है। मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में गृहमंत्री राजनाथ सिंह का नाम सबसे आगे है। केंद्र में गृहमंत्री पद की अहम जिम्मेदारी और राष्ट्रीय राजनीति में मोदी के बाद सबसे अहम चेहरों में शुमार हो चुके राजनाथ के बारे में माना जाता है कि वह शायद ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में लौटना चाहें। 
डॉ. दिनेश शर्मा
लखनऊ के महापौर और भारतीय जनता पार्टी बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष दिनेश शर्मा को लेकर सत्ता के गलियारे में खूब चर्चा है। दिनेश शर्मा की संघ से लेकर पार्टी के अलग-अलग गुटों में अच्छी पकड़ मानी जाती है और वह गैर विवादित चर्चा भी रहे हैं। 2014 में उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय सदस्यता प्रभारी बनाया गया है, जिसके बाद सदस्यों के मामले में बीजेपी ने दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा किया। यही नहीं लोकसभा चुनावों में जीत के बाद उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से दिनेश शर्मा की करीबी के चलते ही उन्हें गुजरात में पार्टी प्रभारी जैसी अहम जिम्मेदारी दी गई।
केशव प्रसाद मौर्य
2014 के लोकसभा चुनावों में जीत के बाद पार्टी में केशव प्रसाद मौर्य के कद में गुणात्मक बढ़ोत्तरी देखने को मिली है।  सबसे अहम कारण यह है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा लगातार ओबीसी वोटरों को टारगेट करती दिख रही है। जाहिर है 2019 के लोकसभा चुनावों में भी पार्टी का फोकस यूपी में करीब 54 फीसदी वोटर वाले ओबीसी मतदाताओं पर रहेगा। ऐसी स्थिति में ओबीसी बिरादरी से आने वाले केशव की सीएम पद के लिए दावेदारी मजबूत होती दिखती है। यूपी में पहली बार सत्ता का स्वाद बीजेपी ने कल्याण सिंह की अगुवाई में चखा था। कल्याण सिंह के जमाने में बीजेपी गैर-यादव ओबीसी और ईबीसी के लिए एकमात्र विकल्प के रूप में उभरी थी। केशव प्रसाद मौर्य भाजपा के पहले विकल्प हो सकते हैं। इसके अलावा संगठन और आरएसएस में भी केशव की अच्छी पकड़ उनकी दावेदारी को मजबूत करती है।
मनोज सिन्हा
गृहमंत्री राजनाथ सिंह के करीबी माने जाते हैं और पूर्वांचल से आते हैं। पूर्वांचल पर पार्टी का सबसे ज्यादा फोकस रहा है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूर्वांचल में जीत को पार्टी के लिए सत्ता की चाबी मानते हैं। वैसे रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा के काम की तारीफ पीएम मोदी भी खासी करते रहे हैं। दूसरी अहम बात यह कि केशव प्रसाद मौर्य को यूपी प्रदेश का अध्यक्ष, राज्य बिहार में नित्यानंद राय और झारखंड में ताला मरांडी को प्रदेश अध्यक्ष चुनने जैसे चौंकाने वाले फैसले लेने वाले बीजेपी आलाकमान मनोज सिन्हा के नाम पर फैसला ले लें, कोई बड़ी बात नहीं।
श्रीकांत शर्मा
यूपी चुनाव में राष्ट्रीय मंत्री और राष्ट्रीय प्रवक्ता की जिम्मेदारी संभाल रहे श्रीकांत शर्मा को भारतीय जनता पार्टी के मथुरा की वृंदावन सीट से प्रत्याशी घोषित करने के बाद से ही उन्हें सीएम पद का दावेदार माना जाने लगा है। इन्हें अमित शाह और वित्त मंत्री अरुण जटली का करीबी माना जाता है। इनकी दावेदारी इस कारण से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा सर्बानंद सोनोवाल को असम का मुख्यमंत्री बना चुकी है, वह भी राष्ट्रीय प्रवक्ता ही थे। संघ से करीबी और युवा चेहरा के पॉजिटिव प्वाइंट माने जाते हैं।
योगी आदित्यनाथ
पार्टी के फायर ब्रांड नेताओं में से एक योगी आदित्यनाथ का नाम पूर्वांचल की राजनीति में अहम माना जाता है। उनकी इस छवि का इस्तेमाल पार्टी ने इस बार के चुनावों में भी जमकर किया। पश्चिम उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तक स्टार प्रचारक की हैसियत से आदित्यनाथ की ताबड़तोड़ सभाएं इसका गवाह हैं। संघ में भी उनकी अच्छी पैठ मानी जाती है लेकिन पार्टी संगठन में योगी के लिए काफी चुनौतियां भी हैं।
उमा भारती
2012 के विधानसभा चुनाव में जब मध्यप्रदेश की नेता उमा भारती को बीजेपी ने टिकट दिया, तो उनका नाम उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के अहम दावेदारों में शुमार हो गया। उस चुनाव में बीजेपी बेहतर प्रदर्शन नहीं कर सकी। 2014 में पार्टी ने उमा को झांसी से चुनाव लड़वाया और वह यहां से सांसद बनीं, लेकिन चरखारी सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा को हार झेलनी पड़ी। केंद्रीय मंत्री उमा भारती को यूपी चुनाव में बीजेपी के पोस्टर में प्रमुखता से जगह मिली और उन्होंने प्रचार भी जमकर किया। पार्टी के लिए बड़ा नाम हैं लेकिन यूपी में संगठन में कमजोर पकड़ उनकी दावेदारी को कमजोर करती है।
स्मृति ईरानी
तेज तर्रार छवि की वजह से स्मृति भी सीएम पद की पसंद बन सकती हैं। स्मृति न सिर्फ एक स्टार प्रचारक हैं, बल्कि अच्छी वक्ता भी हैं। युवाओं और महिलाओं में खासी लोकप्रिय भी हैं। स्मृति ने 2014 के लोकसभा चुनाव में अमेठी से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को अच्छी चुनौती दी। यही कारण था कि चुनाव हारने के बाद भी उन्हें कैबिनेट में शामिल किया गया।

Posted By: Dharmendra Pandey

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