नई दिल्ली [स्पेशल डेस्क]। पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में से एक त्रिपुरा में मतदान में अब कुछ दिन ही बचे हैं। 60 सदस्यों वाली विधानसभा के लिए सीपीएम एक तरफ अपने किले को बचाने में जुटी है तो भाजपा त्रिपुरा को केसरिया रंग सराबोर करने की पुरज़ोर कोशिश कर रही है। पीएम मोदी ने आठ फरवरी को चुनाव प्रचार के दौरान मानिक सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यह एक ऐसी सरकार है जिसमें सिर्फ अपराध का विकास हुआ है, हमारी सरकार की कोशिश है कि त्रिपुरा में माणिक की जगह हीरा का राज हो। हीरा के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा हाइवेज, इंटरनेटवे, रोडवेज और एयरवेज त्रिपुरा की जरूरत है। लेकिन माणिक सरकार के शब्दकोष से ये सबकुछ गायब है। ऐसे में सवाल ये है कि क्या माणिक की जगह जिस हीरे की बात भाजपा कर रही है उसका फैसला त्रिपुरा के मतदाता करेंगे या एक खास विचारधारा जिसकी सीपीएम पोषक रही है उस पर एक बार फिर त्रिपुरा की जनता मुहर लगाएगी। इसे समझने के लिए पश्चिम बंगाल को भी समझना जरूरी होगा। लेकिन उससे पहले हम आप को माणिक सरकार की विधानसभा सीट धानपुर की बात करेंगे जहां उनकी साख दांव पर लगी हुई है।  

धानपुर में ''सरकार'' की साख दांव पर

धानपुर विधानसभा पर आम लोगों से लेकर खास लोगों तक की नजर टिकी है। दरअसल ये भारत-बांग्लादेश सीमा के करीब यह विधानसभा क्षेत्र त्रिपुरा के सीएम मानिक सरकार की सीट है जहां से वो पांच बार विधायक रह चुके हैं और छठवीं दफा अपनी किस्मत आजमां रहे हैं। लेकिन इस बार का चुनाव पहले के चुनावों की तरह नहीं है। पहले जहां कांग्रेस उन्हें कड़ी टक्कर देती थी, अब उस लड़ाई में भाजपा भी कूद पड़ी है। यहां की पहाड़ियों और धान के खेतों में लाल झंडा और कांग्रेस का झंडा दिखाई देता था लेकिन अब भगवा झंडा सेंध लगाने की कोशिश कर रही है।


मानिक के खिलाफ भौमिक

मानिक सरकार के खिलाफ जहां भाजपा की तरफ से पार्टी की महासचिव प्रतिमा भौमिक चुनावी मैदान में हैं वहीं कांग्रेस की तरफ से लक्ष्मी नाग चुनावी मैदान में हैं। प्रतिमा भौमिक दूसरी बार मानिक सरकार को चुनौती दे रही हैं हालांकि 1998 के चुनाव में उन्हें मानिक सरकार से मात मिली थी। प्रतिष्ठा की लड़ाई में ये जानने की कोशिश करेंगे धानपुर में अब तक क्या हुआ है और वहां के लोग क्या सोचते हैं।

धानपुर की कहानी 'सरकार' की जुबानी

धानपुर विधानसभा में कुल 21 गांव हैं जिनमें हिंदू, मुस्लिम और आदिवासी आबादी रहती है। मुसलमान, भारत बांग्लादेश की सीमा पर रहते हैं जबकि आदिवासी समूह पहाड़ी इलाकों में रहते हैं। राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक धानपुर में साक्षरता दर करीब 80 फीसद है। इस विधानसभा में तीन पीएचसी और ग्रामीण अस्पतालों की संख्या आठ जिनमें 10 से लेकर 30 बेड हैं।

मुख्यमंत्री मानिक सरकार अपनी कामयाबियों के बारे में कहते हैं कि 1998 में जब वो इस इलाके में आए सड़कों की व्यवस्था बहुत ही खराब थी। एक बार उनकी कार कीचड़युक्त सड़क में फंस गई और उन्हें खुद धक्का देना पड़ा। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। पूरे विधानसभा में सड़कों का जाल बिछ चुका है। इसके अलावा धानपुर में पीने के पानी की समस्या थी हालांकि पाइपलाइन के बिछने की वजह से आम लोगों को सहुलियत हो गई है पहले महिलाओं को मीलों दूर पानी के लिए जाना पड़ता था। लेकिन मानिक सरकार की प्रतिद्वंदी प्रतिमा भौमिक का कुछ और ही कहना है। वो कहती हैं कि पाइपलाइन में से आयरन रिमूवल की सुविधा नहीं है लोग उस पानी को पी नहीं सकते हैं उन्हें छोटे छोटे झरनों की मदद लेनी पड़ती है। दूषित पानी की वजह से गैस्ट्रोइंट्रेटाइटिस का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा धानपुर में बेरोजगारी भी एक बड़ी समस्या है, पांच हजार से ज्यादा लोग मध्य पूर्व जा चुके हैं। अगर भाजपा सरकार में आती है तो वो उन लोगों को वापस लाया जाएगा। मानिक सरकार के दावे की खिल्ली उड़ाते हुए कांग्रेस प्रत्याशी लक्ष्मी नाग कहती हैं कि ये बात सच है कि इलाके में अस्पताल हैं लेकिन उन अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं। ज्यादातर अस्पताल कंपाउंडरों के भरोसे चल रहे हैं।

त्रिपुरा में इस बार की सियासी लड़ाई पूरी तरह माकपा और भाजपा के बीच है । त्रिपुरा में भी कांग्रेस के सामने अस्तित्व बचाने की लड़ाई है। 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस दस सीटों और 36 फीसदी मतों के साथ दूसरे स्थान पर थी । लेकिन कई बार विभाजन के बाद पार्टी का सियासी भविष्य खतरे में नजर आ रहा है। कांग्रेस से जीते 7 विधायक भाजपा में शामिल होकर इस बार कमल के फूल को खिलाने में जुटे हैं। भाजपा ने 2013 चुनावों के 2 फीसद वोट शेयर को बढ़ाकर 2014 में 6 फीसदी कर लिया था। त्रिपुरा भले ही छोटा राज्य है लेकिन भाजपा के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। त्रिपुरा की जीत न सिर्फ चुनावी जीत होगी बल्कि यह वैचारिक जीत भी साबित होगी।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि त्रिपुरा में भाजपा अगली सरकार बनाएगी। यह भाजपा द्वारा शासित 20 वां राज्य बनेगा। शाह ने मतदाताओं को भरोसा दिया कि चुनावी घोषणा पत्र में किए गए सभी वादे पूरे किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि मणिपुर और असम में पार्टी का न तो एक भी विधायक था और न ही मजबूत सांगठनिक आधार था। लेकिन इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और भाजपा के कार्यक्रमों ने पार्टी को पूवरेत्तर के इन दो राज्यों में सत्ता दिलाई।’ उन्होंने कहा कि इसी तरह त्रिपुरा भी भाजपा की झोली में आएगा। वाम मोर्चा पिछले करीब 25 सालों से लगातार त्रिपुरा में सत्तारूढ़ है। इसके बाद भी घरों में पेयजल वितरण, स्वास्थ्य सेवाओं, ऊर्जा आपूर्ति, आधारभूत संरचना और निवेश आकर्षित करने में त्रिपुरा काफी पीछे है।

क्या बदलेगी त्रिपुरा की तस्वीर

त्रिपुरा में मतदाताओं का मिजाज क्या है, क्या वर्तमान निजाम आगे का सफर तय करेगी या भाजपा की आंधी में लाल सलाम कमजोर पड़ेगा। ये सब ऐसे सवाल हैं जिसका जवाब देश की जनता जानना चाहती है। बेशक इस संबंध में तीन मार्च को फैसला सबके सामने होगा। लेकिन 18 फरवरी को मतदाता राज्य के सरकार की किस्मत इवीएम में कैद कर चुके होंगे। वैचारिक फ्रंट पर वाम दल अपनी राग अलापते हैं लेकिन अगर मतदाताओं के मिजाज को देखें तो वाम दल केरल और त्रिपुरा में सिमट कर रह गए हैं।
पश्चिम बंगाल में 34 साल तक अनवरत चलने वाली सीपीएम की सरकार को मां, माटी और मानूष का नारा देकर ममता बनर्जी ने रायटर्स बिल्डिंग से बाहर का रास्ता दिखा दिया। केरल में सीपीएम का प्रदर्शन ये था कि वो तिरुअनंतपुरम की गद्दी से समय समय पर बेदखल होती रही है। लेकिन त्रिपुरा में माणिक सरकार की 24 साल तक निर्बाध सत्ता को वाम दल अपनी कामयाबी के तौर पर देखते हैं। हालांकि नजारा अब बदल चुका है,अगरतला की जिन सड़कों पर लाल झंडे के साथ कांग्रेस का झंडा दिखाई देता था। उन दोनों के बीच भगवा झंडा दखल दे रहा है। त्रिपुरा की लड़ाई वाम दलों के साथ भाजपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। सीपीएम जहां सत्ता की लड़ाई के साथ अपनी वैचारिक पहचान को बचाए रखने में जुटी है, वहीं भाजपा ये साबित करना चाहती है कि कांग्रेस मुक्त भारत के साथ सीपीएम की विचारधारा उनके दफ्तरों तक सीमित रह जाए। 

Edited By: Lalit Rai