उदयपुर, जेएनएन। आचार संहिता गलत को गलत और अच्छे को अच्छा कहने से नहीं रोकती, बशर्ते कि आप की नीयत साफ हो, आप किसी का प्रचार या दुष्प्रचार नहीं कर रहे हों। यह बात प्रख्यात मिमिक्री आर्टिस्ट राजू श्रीवास्तव ने गुरुवार को यहां उदयपुर में मीडिया से चर्चा के दौरान कही।

उदयपुर में नगर निगम की ओर से चल रहे दशहरा-दीपावली मेले में शहरवासियों को गुदगुदाने आए राजू श्रीवास्तव ने पत्रकारों से चर्चा में कई गंभीर मुद्दों पर अपनी राय रखी। आचार संहिता पर उन्होंने कहा कि यदि वे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लौहपुरुष सरदार पटेल की प्रतिमा के अनावरण पर चर्चा करते हैं तो इसमें कोई पाबंदी नहीं है, क्योंकि इसकी चर्चा आज पूरा विश्व कर रहा है। अच्छी बात को कहीं भी कह सकते हैं, बस वह

सच्ची होनी चाहिए, वरना गलत के लिए तो आचार संहिता में भी थाने खुले हुए हैं।

राजू श्रीवास्तव ने स्पष्ट किया कि आचार संहिता में वे किसी पर पर्सनल कटाक्ष नहीं करके हालातों पर कटाक्ष करेंगे। पिछले लोकसभा चुनावों में सपा के टिकट पर लड़ने के सवाल पर उन्होंने कहा कि वे गुमराह हो गए थे, हालांकि अखिलेश यादव अब भी उनके मित्र हैं और खुशी-गम में उनके यहां आना-जाना रहता है, लेकिन अब वे कलाकार का धर्म निभा रहे हैं। उन्होंने आगामी चुनावों में भाजपा से टिकट लड़ने के सवाल पर कहा कि वे किसी भी अच्छे कार्य के साथ हमेशा हैं। उन्होंने बताया कि वे बिना लाभ के पद का कार्य आज भी कर रहे हैं। स्वच्छ भारत-स्वस्थ भारत अभियान और बेटी बचाओ अभियान में वे सक्रिय तौर पर जुड़े हुए हैं।

बॉलीवुड के सबसे ज्वलंत मुद्दे ‘मी-टू’ पर राजू श्रीवास्वत ने कहा कि यदि आरोप सही है तो पीड़ित को न्याय मिलना चाहिए चाहे पीड़ित लड़का हो या लड़की। किन्तु सिर्फ अगले को बदनाम करने के लिए आरोप लगा दिया, ऐसी हरकत नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि भारतीय सनातन संस्कारों को हम सुरक्षित रख पाए तो ऐसी घटनाएं होंगी ही नहीं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा समलैंगिकता को मान्यता वाले सवाल पर भी संस्कारों को पुष्ट करने की बात कही और बाद में अपने अंदाज में कटाक्ष किया कि इसका उन्होंने

ज्यादा अध्ययन नहीं किया है।

कलाकारों द्वारा फूहड़ता को बढ़ावा देने के सवाल पर राजू श्रीवास्तव ने कहा कि कलाकारों ही नहीं, बल्कि हर व्यक्ति को अपनी सेंसरशिप खुद तय करनी होगी। राजनीति में भी विरोध और आरोप तो लगेंगे और लगाए भी जाएंगे, लेकिन भाषा की मर्यादा या अनर्गल अवांछित शब्दों का इस्तेमाल वहां भी सेंसरशिप की जरूरत को दर्शा रहा है। उन्होंने इस बात का भी समर्थन किया कि गुलाम भारत की निशानियों को यदि मिटाया जा रहा है तो वह गलत नहीं है, अब भारत आजाद है। उन्होंने उलटे सवाल किया कि बाबर बाहर से आया, मंदिर तोड़ा, अब

आजाद भारत में बाबर के नाम पर कुछ हो तो वह क्या आपको अच्छा लगेगा।

Posted By: Sachin Mishra

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