जयपुर, नरेन्द्र शर्मा। राजस्थान कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान नई बात नहीं है। पहले भी दिग्गजों के बीच सत्ता के शीर्ष पद को लेकर संघर्ष होता रहा है। हालांकि जितना संघर्ष इस बार बढ़ा है,उतना पहले कभी नहीं बढ़ा। यह भी पहली बार ही हुआ है कि किसी पीसीसी अध्यक्ष ने पार्टी नेतृत्व को अपनी दलीलों के माध्यम से अधिक सोच-विचार के लिए मजबूत किया हो।

इससे पहले नेता विधायकों के माध्यम से आलाकमान के समक्ष शक्ति प्रदर्शन करते थे और उनके समर्थक नारेबाजी कर अपने नेता के प्रति आस्था जताते रहते थे। लेकिन इस बार नेताओं के समर्थक सड़कों पर उतर गए ,तोड़फोड़ कर हाइवे जाम किया है। पिछले दो दशक में जब-जब कांग्रेस सत्ता में आई तो सीएम की कुर्सी के दावेदारों संघर्ष भी तेज हुआ  साल 1998 में सीएम की कुर्सी का निर्णय जहां पांच दिन की कशमकश के बाद हो पाया था,वहीं साल 2008 में तीन दिन तक चली लॉबिंग के बाद आलाकमान ने सीएम का निर्णय किया था।

दो बार चले संघर्ष में गहलोत की ही जीत हुई थी

साल,1998 में दिग्गज जाट नेता परसराम मदेरणा के राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता रहते हुए सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में जाट और किसान मुख्यमंत्री का नारा दिया गया। करीब पांच दर्जन सीटों पर प्रभाव रखने वाले जाट समाज ने कांग्रेस के पक्ष में जमकर मतदान किया और इतिहास में पहली बार कांग्रेस को 153 सीटें मिली थी।

हालांकि आलाकमान ने अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाया। इस पर मदेरणा ने नाराजती तो जताई,लेकिन पार्टी नेतृत्व को बार-बार इस तरह सोचने के लिए मजबूत नहीं किया,जितना कि इस बार सचिन पायलट ने किया है। 1998 में भी चार दिन तक जयपुर से दिल्ली तक लॉबिंग का दौर चला था। वहीं साल 2003 में डॉ.सी.पी.जोशी के पीसीसी अध्यक्ष रहते हुए कांग्रेस ने चुनाव लड़ा और सत्ता हासिल की।

जोशी सीएम पद के प्रबल दावेदार थे,हालांकि वे एक वोट से चुनाव हार गए थे। दिग्गज जाट नेता शीशराम ओला ने मारवाड़ और शेखावाटी के जाट वोट बैंक की दुहाई देते हुए सीएम पद के लिए दावेदारी की। उस समय भी तीन दिन तक कशमकश का दौर चला,हालांकि एक बार फिर सीएम की कुर्सी पाने में गहलोत ही सफल हुए।  

Posted By: Preeti jha

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