नई दिल्‍ली [उमानाथ सिंह]। मुंबई की वर्ली कोलीवाला विधानसभा क्षेत्र से आदित्‍य ठाकरे की जीत होगी या हार, इस पर शायद ही कोई बहस है। मछुआरों (कोली) का यह क्षेत्र परंपरागत रूप से शिवसेना का गढ़ रहा है और ये मराठी मछुआरे ही मूल रूप से मुंबई के रहे हैं। बाकी लोग तो सपनों के इस शहर की संभावनाएं देखकर वक्‍त के साथ इसके होते चले गए। हालांकि यहां सवाल कुछ और है।

सवाल यह है कि आखिर अपने पिता बालासाहब ठाकरे की राजनीतिक धारा या कहिए प्रतिबद्धता से इतर उद्धव ठाकरे को अपने पुत्र आदित्‍य ठाकरे को चुनाव मैदान में क्‍यों उतारना पड़ा? क्‍या उनके इस कदम से पार्टी अपनी सिकुड़ती जमीन बचा पाएगी, जो उसके लिए इस वक्‍त सबसे बड़ी जरूरत है? क्‍या राज्‍य में लगभग तय मानी जाने वाली अगली भाजपा-शिवसेना सरकार में आदित्‍य ड्राइवर बन पाएंगे, जैसा कि एक बार उद्धव ने दावा किया था? क्‍या करिश्‍माई नेतृत्‍व के मामले में आदित्‍य अपने से अधिक मुखर भाजपा नेता और सीएम देवेद्र फडणवीस का मुकाबला कर पाएंगे? हम यहां इन्‍हीं सवालों के जवाब ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं-

बालासाहेब ठाकरे बड़ी शख्सियत के स्‍वामी थे। यही कारण था कि कई दशकों तक पर्दे के पीछे रहकर भी वे शिवसेना की राजनीति के केंद्र में बने रहे और रिमोट कंट्रोल से राज्‍य में अपनी पार्टी की सरकार चलाई। अपने करिश्‍माई व्‍यक्तित्‍व के कारण बालासाहेब को इस बात का शायद ही कभी डर रहा कि उनकी पार्टी का कोई नेता मुख्‍यमंत्री या केंद्रीय मंत्री बनने के बाद उनके आदेश के खिलाफ जाने की हिम्‍मत करेगा। हालांकि, ऐसा कई बार हुआ, लेकिन जब भतीजे राज ठाकरे ने बगावत की थी तो वे लगभग टूट गए थे।

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सबके बावजूद बालासाहेब ठाकरे, खुद नेतृत्‍व नहीं संभालने की प्रतिबद्धता से कभी टस से मस नहीं हुए। हालांकि नारायण राणे, संजय निरुपम जैसे लोगों के विद्रोह से यह साफ हो गया था कि बाहरी नेतृत्‍व पर एक सीमा के बाद निर्भर नहीं रहा जा सकता है। बालासाहेब के विपरीत लो प्रोफाइल रहने वाले उद्धव पर भी चुनाव लड़ने का लगातार दबाव रहा, लेकिन वे इससे बचते रहे। हालांकि, उन्‍हें इस बात का अहसास हो चुका था कि वे अगर खुद या बेटे को सत्‍ता की राजनीति में नहीं उतारेंगे तो पार्टी पर कमजोर होते कंट्रोल के साथ ही उनका जनाधार भी लगातार सिकुड़ता जाएगा।

इस बीच पार्टी के भीतर और बाहर के लोगों ने उद्धव द्वारा सीधे चुनाव मैदान में नहीं उतरने की नीति को वर्तमान राजनीति के लिहाज से अव्‍यावहारिक बताया और कई बार उन पर सीधी जिम्‍मेदारी नहीं लेने का आरोप भी लगाया। इससे पार्टी कैडर में भी हताशा गई और लोग दूसरी पार्टी की तरफ रुख करने लगे। अब बालासाहेब की तरह उद्धव के लिए यह कहने का समय चला गया कि मनोहर जोशी ने काम नहीं किया या फिर नारायण राणे ने धोखा दिया। यही कारण है कि उन्‍होंने शिवसेना के अस्तित्‍व में आए लगभग 53 साल बाद अपने परिवार के वारिस को सीधी राजनीति में उतारने का फैसला किया है।

परंपरागत रूप से शिवसेना के अंदर परिवार से बाहर के जो भी लोग सत्‍ता में रहे, उन्‍होंने खुद के हित साधने के अलावा अपने लोगों को भी खूब उपकृत किया। इससे वे लगातार मजबूत होते गए और उनका दबदबा राजनीति से लेकर बिजनेस की दुनिया में लगातार बढ़ता चला गया। पार्टी के छुटभैये नेता भी करोड़ों के मालिक बन गए। और फिर जब वे पार्टी छोड़कर या फिर निकाले जाने पर बाहर गए तो खुद के साथ पार्टी का आधार भी लेकर चले गए। तभी तो गांवों की पार्टी मानी जाने वाली शिवसेना का आधार ग्रामीण इलाकों में ही लगातार कम होता गया और आज यह गांवों के बदले शहरी पार्टी हो गई है। अब उम्‍मीद की जा रही है कि आदित्‍य के सत्‍ता में आने से ठाकरे परिवार की चमक एक बार फिर बढ़ेगी, जैसा कि परिवार आधारित दलों के साथ होता है। यह बात मुलायम परिवार से लेकर लालू यादव, ओम प्रकाश चौटाला, भजनलाल, शरद पवार समेत सभी पर लागू होती है।

कोई शक नहीं कि आदित्‍य में बाला साहेब या फिर फडनवीस या राज ठाकरे वाली मुखरता नहीं है, लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं कि वे अपने पिता से अधिक सतर्क, सधे और लगातार तैयारी करते हुए दिखते हैं। पिछले कुछ वर्षों में वे पार्टी की छात्र इकाई के प्रमुख भी रहे हैं और हाल के महीनों में राज्‍य में पांच हजार किलोमीटर से अधिक की यात्रा कर उन्‍होंने लोगों के साथ सीधा कनेक्‍ट भी बनाया है। इससे न सिर्फ आदित्‍य की राजनीतिक समझ में इजाफा हुआ है, बल्कि विभिन्‍न कारणों से वे चर्चा में भी हैं, जो राजनीति के लिहाज से जरूरी है। इसी का असर है कि वर्तमान चुनाव के लिए भाजपा के साथ सीट बंटवारे से पहले उद्धव ने एक पब्लिक रैली में यहां तक कह दिया था कि इस बार मुख्‍यमंत्री शिवसेना का होगा। हालांकि वर्तमान हकीकत को समझते हुए बाद में उन्‍होंने अपना बयान बदल लिया था।

उद्धव ने इस बार बेटे की सीट के चुनाव में भी राजनीतिक सूझबूझ दिखाई है। वर्ली सीट पर आदित्‍य का मुकाबला एनसीपी के सुरेश माने से है, जिन्‍हें तुलनात्‍मक रूप से हल्‍का उम्‍मीदवार माना जा रहा है। वैसे भी एनसीपी के लिए यहां अधिक है भी नहीं। 1990 से 2004 तक शिवसेना ने यहां से लगातार पांच जीत दर्ज की है। हालांकि 2009 में एनसीपी के सचिन अहिर ने शिवसेना को हरा दिया था, लेकिन 2014 में सेना ने फिर यहां से जीत दर्ज की। खास बात यह है कि 2009 में एनसीपी की जीत में पार्टी नहीं, बल्कि अहिर का बड़ा रोल था और अहिर चंद दिनों पहले ही शिवसेना के हो चुके हैं। ऐसे में आदित्‍य के लिए यह चुनाव एक तरह से केकवॉक भी साबित हो सकता है।

यहां इस बात का उल्‍लेख करना जरूरी है कि 2014 के चुनाव में बड़े भाई की अपनी हैसियत बनाए रखने के लिए शिवसेना ने अलग चुनाव लड़ा और 288 सीटों वाले विधानसभा में उसे महज 63 सीटों से संतोष करना पड़ा था। जबकि भाजपा को 122 सीटें मिली थीं। इसीलिए 2014 के चुनाव से पहले सीना चौड़ा करने वाली शिवसेना को चुनाव नतीजे के बाद भाजपा के साथ बगैर खास मान-मनौव्‍वल के सरकार में आना पड़ा और उपमुख्‍यमंत्री की दावेदारी भी उसे छोड़नी पड़ी। अलबत्‍ता भाजपा को सरकार बनाने में समर्थन देने के कई महीने बाद सेना को सरकार में जगह मिल पाई थी।

इससे नाराज सेना राज्‍य और केंद्र दोनों जगहों पर भाजपा नीत सरकारों को लगातार घेरती रही। हालांकि भाजपा ने सधी हुई रणनीति के तहत शिवसेना को गठबंधन में बनाए रखा। भाजपा जानती है कि महाराष्‍ट्र में जब तक उसे बहुमत लायक आधार नहीं मिल जाता है, तब तक शिवसेना से अधिक विश्‍वसनीय पार्टनर उसे नहीं मिल सकता। इस बार चुनावपूर्व गठबंधन के तहत भाजपा जहां 150 सीटों पर लड़ रही है, वहीं सेना को 124 सीटें ही मिली हैं। गौरतलब है कि कांग्रेस को 2014 के चुनाव में 42 और एनसीपी को 41 सीटें मिली थीं।

साफ तौर पर इस बार की संभावित फडनवीस सरकार पहले के मुकाबले अधिक मजबूत होगी। बीते पांच साल में फडनवीस एक कुशल प्रशासक के रूप में उभरे हैं। जब‍कि पिछली बार वे प्रशासनिक मामलों में अनुभवहीन थे। इस बार बिखरे विपक्ष के कारण उन्‍हें और मजबूती मिली है और वे मास लीडर के रूप में भी उभरे हैं। राज्‍य अब उनमें भविष्‍य का नेतृत्‍व भी देख रहा है। यह कहना गलत नहीं होगा कि फडनवीस के उभार ने आदित्‍य ठाकरे को भी चुनावी राजनीति में आने के लिए एक तरह से बाध्‍य कर दिया। शिवसेना को इस बात का अब पूरा अंदेशा है कि अगर वक्‍त रहते ठाकरे परिवार का कोई सदस्‍य सामने नहीं आता है तो उसकी जमीन और सिमट जाएगी।

पिछले एक दशक में कोंकण, विदर्भ और मराठवाड़ा में सेना के आधार में बड़ी कमी आई है। यहां तक कि पुणे और नासिक जैसे मजबूत गढ़ भी टूटते हुए दिखे। नासिक वेस्‍ट सीट से भाजपा उम्‍मीदवार उतारने के कारण नासिक सिटी यूनिट के अधिकांश लोगों ने पार्टी छोड़ दी। मुंबई में भी सेना इस बार महज 19 सीटों पर लड़ रही है, जबकि यहां 36 सीटें हैं। साफ तौर पर सेना एक तरह से अस्तित्‍व के संकट से भी गुजर रही है। उसके अधिकांश वरिष्‍ठ नेता 65 साल से अधिक के हो चुके हैं। ऐसे में आदित्‍य को आगे कर सेना अपने अपने अस्तित्‍व बचाने के साथ ही युवाओं को आकर्षित करने में भी सफल हो सकती है।

ऐसे में उम्‍मीद की जा रही है कि चुनाव बाद बनने वाली भाजपा-सेना सरकार में फिलहाल आदित्‍य ड्राइवर तो नहीं, लेकिन ड्राइवर के सहायक यानी उपमुख्‍यमंत्री जरूर बन सकते हैं। यह आदित्‍य के लिए लाभकारी होगा, क्‍योंकि ऐसा करके वे चुनावी राजनीति ही नहीं, बल्कि सत्‍ता की राजनीति के भी गुर सीख लेंगे। इससे बाद राजनीतिक मोलभाव और तोड़जोड़ उनके लिए आसान हो जाएगी, जो आज की राजनीति के लिए जरूरी है।

कोई शक नहीं कि आदित्‍य की तुलना में फडणवीस काफी आगे निकल चुके हैं। नितिन गडकरी जैसे नेता भी अब खुद को फडणवीस के आसपास नहीं देख पा रहे हैं, जो कभी उनके गुरु रहे थे। लेकिन राजनीति अनिश्चितताओं का खेल है। फडणवीस युवा हैं और उनकी उम्र अभी 50 के लगभग है, लेकिन आदित्‍य की उम्र उनकी तुलना में लगभग 20 साल कम है। ऐसे में वक्‍त कब पलटी मारेगा, कहना मुश्किल है।

Posted By: Umanath Singh

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