मुंबई [ओमप्रकाश तिवारी]। चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनावों की घोषणा कर दी है। इसके साथ ही दोनों राज्यों में राजनीतिक गहगहमी एकदम से तेज हो गई है। महाराष्ट्र में दो दिन पहले ही अपनी महाजनादेश यात्रा का समापन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में करने वाले मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस, इस बार पूर्ण जनादेश की उम्मीद में जनता के बीच जाने को तैयार हैं। वहीं विपक्ष के हौसले पस्त दिखाई दे रहे हैं।

लंबी अवधि के बाद महाराष्ट्र में एक ही मख्यमंत्री के शासनकाल में किसी सरकार ने अपने पांच वर्ष पूरे किए हैं। वह भी किसी गैरमराठा के मुख्यमंत्री रहते। चुनौतियां भी कम नहीं थीं। ये चुनौतियां विपक्ष की ओर से तो थी हीं, सत्ता में भाजपा की सहयोगी शिवसेना भी इस सरकार के लंबे समय तक भाजपा और मुख्यमंत्री फड़नवीस के कटु आलोचक की ही भूमिका में नजर आती रही। उसका यह रवैया लोकसभा चुनाव के कुछ समय पहले ही बदला, जब पिछले विधानसभा चुनाव में टूटा दोनों दलों का गठबंधन लोकसभा चुनाव के लिए फिर से हो गया।

फड़नवीस को मराठा आरक्षण आंदोलन, किसान आंदोलन और वाम विचारधारा से प्रेरित भीमा-कोरेगांव जैसे आंदोलनों का भी सामना करना पड़ा। लेकिन वह न केवल इन सभी आंदोलनों से सरकार को उबारने में सफल रहे, बल्कि इनमें से कई वर्गों को तो संतुष्ट करने में भी सफल रहे। किसानों के लिए कर्जमाफी योजना तथा जलयुक्त शिवार योजना ने जहां उनकी साख ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत की, वहीं मराठा समुदाय को कारगर तरीके से शिक्षा एवं नौकरियों में 16 फीसद आरक्षण दिलाकर सूबे के एक बड़े वर्ग का दिल जीतने में सफल रहे। किसान एवं आरक्षण का लाभ पानेवाला मराठा वर्ग लगभग एक ही है। राज्य में 32 फीसद आबादी मराठा समुदाय की रही है। अब तक यह वर्ग कांग्रेस का प्रतिबद्ध मतदाता रहा है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठन होने के बाद मराठों का झुकाव इसकी ओर हो गया।

इस बार समीकरण बदले हुए हैं। हाल ही में मराठा समुदाय के सबसे बड़े प्रतीक छत्रपति शिवाजी महाराज के वंशज उदयनराजे भोसले स्वयं भाजपा में आ चुके हैं। उनके अलावा भी कांग्रेस और राकांपा के कई बड़े जनाधार वाले नेता भी भाजपा अथवा शिवसेना का दामन थाम चुके हैं। कभी शहरी जनाधारवाली पार्टी समझी जानेवाली भाजपा अब जिला पंचायत एवं ग्रामीण स्तर तक अपना विस्तार कर चुकी है।

यहां तक उसकी सहयोगी शिवसेना के तेवर भी अब नरम दिखाई दे रहे हैं। पिछले चुनाव में भाजपा को बराबरी की सीटें भी न देने को तैयार एवं इसी मुद्दे पर गठबंधन तोड़ लेनेवाली शिवसेना आज न सिर्फ गठबंधन करके लड़ने को तैयार है, बल्कि उसके नेता आज खुद बराबरी की सीटों की बात करने लगे हैं। जबकि उम्मीद की जा रही है कि इस बार वह भाजपा से भी कम सीटें लेकर गठबंधन में रहने को तैयार हो जाएगी।

शिवसेना-भाजपा तथा कांग्रेस-राकांपा के अलावा तीसरे गठबंधन के रूप में प्रकार आंबेडकर और असदुद्दीन ओवैसी की वंचित बहुजन आघाड़ी भी पूरी ताकत से लड़ने की योजना बना रही है। लोकसभा चुनाव में इस आघाड़ी के कारण कांग्रेस-राकांपा को करीब एक दर्जन सीटों पर नुकसान पहुंचा चुकी है। इस बार तो मुख्यमंत्री फड़नवीस पहले से उम्मीद जता रहे हैं कि चुनाव बाद नेता विरोधीदल वंचित बहुजन आघाड़ी से होगा। यानी भाजपा को पूरा भरोसा है कि इस दलित-मुस्लिम गठजोड़ का पूरा लाभ भी भाजपा-शिवसेना गठबंधन को ही मिलनेवाला है।

Posted By: Amit Singh

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