जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। महाराष्ट्र में शिवसेना की दबाव की राजनीति के सामने भाजपा घुटने नहीं टेकेगी। न तो बारी बारी से मुख्यमंत्री पद की दावेदारी मानी जाएगी और न ही गृह, वित्त, पीडब्लूडी जैसे सभी अहम मंत्रालयों की जिद। उपमुख्यमंत्री पद जरूर दिया जा सकता है। केंद्र में उसकी हिस्सेदारी भी बढ़ाई जा सकती है।

महाराष्ट्र का पहिया घूमकर 2014 की स्थिति में पहुंच गया है। उस वक्त भी भाजपा बहुमत के आंकड़े 145 से पीछे थी और शिवसेना की ओर से दबाव बढ़ाना शुरू हो गया था। उस वक्त राकांपा नेता शरद पवार की ओर से सरकार को बाहर से समर्थन देने की बात के बाद शिवसेना ने तत्काल भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने की हामी भर दी थी।

इस बार पवार ने शिवसेना और भाजपा दोनों से दूरी बढ़ाकर रखी है। लेकिन यह सच्चाई है कि प्रदेश में भाजपा ही न सिर्फ सबसे बड़ी पार्टी है बल्कि दूसरे नंबर की शिवसेना से लगभग दोगुना ज्यादा है। जो राजनीतिक स्थिति है उसमें शिवसेना, राकांपा और कांग्रेस मिलकर भी सरकार बनाने से बचेगी। इसमें राजनीतिक हित नहीं है। वैसे भी पहली बार विधायक बने शिवसेना के आदित्य ठाकरे के पास अभी ऐसा अनुभव नहीं है कि वह मुख्यमंत्री पद संभाल सकें। यानी घूमफिर कर बात वहीं आकर टिक रही है कि शिवसेना भाजपा के साथ ही रहकर दबाव से कुछ हासिल करना चाहता है।

सोमवार को भाजपा के मुख्यमंत्री दावेदार देवेंद्र फड़नवीस के बाद शिवसेना के प्रतिनिधि भी प्रदेश के राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी से मिले। भाजपा नेतृत्व का मानना है कि शिवसेना बहुत जल्द शांत होकर भाजपा से तर्कसंगत बातें करेगा और वह माना जाएगा। यानी मुख्यमंत्री पद की दावेदारी के बहाने सभी अहम मंत्रालयों की जिद भी नहीं मानी जाएगी। चुनाव नतीजा आने के बाद से सेना के मुखपत्र सामना में लगातार केंद्र सरकार को निशाना बनाया जा रहा है। लोकसभा में गठबंधन की घोषणा तक यह जारी रहा था।

गौरतलब है कि प्रदेश में नौ नवंबर से पहले सरकार बननी है। अभी दस दिन से ज्यादा वक्त बाकी है। इस बीच, जाहिर तौर पर राकांपा नेता शरद पवार पर भी सबकी नजरें रहेंगी। यह जरूर है कि विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा और राकांपा नेताओं के बीच तीखे वाकयुद्ध हुए हैं। पवार परिवार पर भ्रष्टाचार को लेकर भाजपा ने तीखा हमला किया और राकांपा की ओर से भाजपा पर राजनीति के आरोप लगाए गए। लेकिन प्रदेश की राजनीति में पवार ऐसे नेता माने जाते हैं, जो वक्त के अनुसार फैसले लेते हैं और जिनके बयानों के गूढ़ अर्थ होते हैं।

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Posted By: Sachin Mishra

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