मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

इंदौर, डॉ. जितेंद्र व्यास कांग्रेस की जीत में अहम योगदान देने वाले मालवा-निमाड़ क्षेत्र को सरकार में भरपूर प्रतिनिधित्व मिला है। 37 में से 26 सीटें देकर सत्ता सौंपने वाले इंदौर संभाग से सात मंत्री बनाए गए हैं, जबकि उज्जैन संभाग से सिर्फ दो विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। दोनों संभागों के 15 में से नौ जिले ऐसे हैं जहां से किसी को मौका नहीं मिल सका। बीते तीन चुनावों से भाजपा का गढ़ रहे मालवा-निमाड़ क्षेत्र ने कांग्रेस को उम्मीद से बेहतर परिणाम दिए।

बीते चुनाव में कांग्रेस को यहां की 66 में से सिर्फ नौ सीटें ही मिली थीं। इसी तरह उज्जैन संभाग की 29 सीटों में से सिर्फ एक सीट हासिल करने वाली कांग्रेस ने इस बार 11 सीटें जीतीं। भाजपा का गढ़ ढहाने वाले जिलों से मंत्रिमंडल में दो-दो मंत्रियों को शामिल किया गया है। धार जिले की सात में से छह सीटें इस बार कांग्रेस को मिलीं। यहां से उमंग सिंघार और सुरेंद्रसिंह बघेल (हनी) को शामिल किया गया है। इसी तरह भाजपा के गढ़ इंदौर से भी कांग्रेस को चार सीटें मिलीं। यहां से तुलसी सिलावट और जीतू पटवारी को शामिल किया गया।

खरगोन जिले की छह में से तीन सीटें पिछली बार भाजपा को मिली थीं लेकिन इस चुनाव में पांच सीटें कांग्रेस ने जीत लीं, जबकि एक सीट पर जीते निर्दलीय ने भी बाद में कांग्रेस को समर्थन दे दिया। यहां से सचिन यादव और वरिष्ठ कांग्रेस नेत्री व पूर्व मंत्री विजयलक्ष्मी साधौ को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। मालवा-निमाड़ के नौ जिले आगर, खंडवा, बुरहानपुर, आलीराजपुर, झाबुआ, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर व नीमच से मंत्रिमंडल में किसी को भी स्थान नहीं मिला है।

उज्जैन में समीकरण उलझे : उज्जैन संभाग में मंत्रिमंडल गठन को लेकर सबसे ज्यादा खींचतान भी हुई। संभाग को प्रतिनिधित्व देने के दौरान हुकुमसिंह कराड़ा, दिलीप गुर्जर, हरदीपसिंह डंग, रामलाल मालवीय और सज्जनसिंह वर्मा ही अनुभवी विधायकों के रूप में सामने थे। शेष ज्यादातर विधायक नए हैं। फॉर्मूले के तहत पहली बार चुने गए विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया। गुर्जर, डंग और मालवीय जातिगत समीकरणों के फॉर्मूले से पिछड़ गए। उन्होंने आखिरी दौर तक जोर लगाया था। यहां से कराड़ा और वर्मा को मंत्रिमंडल में जगह दी गई

66 में से 31 सीटें अजा/अजजा वर्ग की, यहां से छह मंत्री

लवा-निमाड़ के 66 में से 31 सीटें अजा/अजजा वर्ग की हैं। यहां से छह मंत्री बनाए गए हैं। तुलसी सिलावट, बाला बच्चन, विजयलक्ष्मी साधौ, उमंग सिंघार, हनी बघेल और सज्जन सिंह वर्मा। कांग्रेस हमेशा से इन वर्गों को अपना वोट बैंक मानती आई है लेकिन बीते दो चुनावों में इन क्षेत्रों ने भाजपा का साथ दिया। इस बार धार, झाबुआ, खरगोन, आलीराजपुर, बड़वानी जैसे इलाकों के मतदाताओं का मन बदलने में कांग्रेस सफल रही।

भाजपा सरकार में थे छह मंत्री, इंदौर को नहीं मिला था मौका भाजपा शासन के दौरान मालवा-निमाड़ से छह मंत्री पारस जैन, दीपक जोशी, अंतरसिंह आर्य, विजय शाह, बालकृष्ण पाटीदार और अर्चना चिटनिस को ही मौका मिला था। इंदौर जिले से कैलाश विजयवर्गीय के मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने के बाद किसी को प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया

35 सीटें सामान्य/ पिछड़ा वर्ग की, फिर भी तीन ही मंत्री

मालवा-निमाड़ की शेष 35 सीटें सामान्य और पिछड़ा वर्ग की हैं, लेकिन नई सरकार में इन वर्गों से केवल तीन मंत्री हुकुमसिंह कराड़ा, सचिन यादव और जीतू पटवारी बनाए गए हैं। दरअसल, जातिगत समीकरणों को साधने की कोशिश में इस वर्ग को पहले दौर में कम स्थान मिल सका है। हालांकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेतृत्व ने अगले विस्तार के दौरान इस बात का ध्यान रखने का आश्वासन दिया है।

मंत्रिमंडल के साथ ही लोकसभा चुनावों की तैयारी

मंत्रिमंडल गठन में इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि आने वाले महीनों में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस सभी गुटों-वर्गों को संतुष्ट कर सके। मालवा-निमाड़ क्षेत्र की 66 सीटों पर दोबारा फोकस कर कांग्रेस लोकसभा सीटें भी ज्यादा से ज्यादा हासिल करना चाहती है। मंदसौर-नीमच क्षेत्र जहां किसान आंदोलन सहित सत्ता विरोधी लहर से कांग्रेस को जितने लाभ की उम्मीद थी, उतना उसे मिल नहीं सका। इन कारणों की पड़ताल कर लोकसभा चुनाव में इस नुकसान को पाटने की जिम्मेदारी भी मालवानिमाड़ के मंत्रियों पर रहेगी।  

Posted By: Prashant Pandey

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