प्रेमविजय पाटिल, धार। सोशल मीडिया के दौर में चुनाव प्रचार बहुत हद तक इस माध्यम पर ही निर्भर होने लगा है। निर्वाचन आयोग भी इस माध्यम के बढ़ते इस्तेमाल के बाद प्रत्याशियों के सोशल मीडिया अकाउंट से लेकर अन्य गतिविधियों पर सीधी नजर रख रहा है। लेकिन अब भी कई इलाके ऐसे हैं जो सोशल मीडिया की पहुंच से बेहद दूर हैं। यहां आज भी परंपरागत लोकगीतों से मतदाताओं तक अपनी बात पहुंचाई जाती है। धार जिले के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में कार्यकर्ता ऐसे गीतों के माध्यम से अपनी बात कहते देखे जाते हैं।

दरअसल जिले की कई आदिवासी विधानसभाओं में मोबाइल नेटवर्क अपने आप में दुर्लभ है। गरीब आदिवासी वर्ग के पास ऐसे मोबाइल नहीं हैं, जिससे कि वे फेसबुक या वाट्सएप चला सकें। स्मार्टफोन तो दूर उनके पास में सामान्य फोन भी नहीं है। ऐसी स्थिति में परंपरागत रूप से आदिवासी अंचल में प्रचार-प्रसार के लिए लोकगीतों का ही सहारा लिया जा रहा है।

लोकगीत बनाने वाले कलाकारों से लेकर उनको गाने वाले गायकों की मांग भी बढ़ गई है। चाहे भाजपा हो या कांग्रेस दोनों ही राजनीतिक दल के लोग ऐसे लोकगीत तैयार करवाते हैं। तिरला विकासखंड के भीतरी क्षेत्र में देखा जाए तो कई इलाके ऐसे हैं जहां आज भी मोबाइल नेटवर्क नहीं है। भले ही चुनाव के दौरान ईवीएम मशीन से मतदाता वोट करते हों और अब तो वीवीपेट मशीन तक का दौरा आ गया है।  

Posted By: Prashant Pandey