पटना [सुनील राज]। बदलते दौर में राजनीति भी बदल चुकी है। आदर्श और नैतिकता के मायने बदल चुके हैं। चुनावी दौर में अच्छे से अच्छे दोस्त भी दुश्मन हो जाते हैं। अभी दस साल पहले तक राजनीति में दोस्ती के अपने आदर्श हुआ करते थे। चुनावी इतिहास के पन्ने पलटने पर ऐसे कई किस्से पढऩे-सुनने को मिल जाते हैं। ऐसा ही एक किस्सा है शेखर सुमन का, जब उन्न्होंने शत्रुघ्न सिन्हा से गले मिलकर उनके खिलाफ चुनाव लडऩे के लिए अफसोस जताया था तथा ये वादा किया था कि आगे कभी ऐसा नहीं करेंगे। शत्रुघ्न सिन्हा को भी राजेश खन्ना के खिलाफ चुनाव लडऩे का अफसोस रहा।

शेखर ने शत्रुघ्न से दूर किए शिकवे

1991 जैसे ही हालात 2009 में भी बने। पटना साहिब सीट पर भारतीय जनता पार्टी ने शत्रुघ्न सिन्हा को अपना उम्मीदवार बनाया तो कांग्रेस ने अभिनेता शेखर सुमन को मुकाबले में खड़ा कर दिया। कदमकुआं में रहने वाले दो पुराने जानकार और सिने अभिनेता एक सीट पर आमने-सामने थे। शत्रुघ्न जीत गए।

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जाहिर है, टिकट ने दोनों दोस्तों के बीच एक फासला तो बना ही दिया था, लेकिन यह मलाल ज्यादा दिनों तक नहीं रहा। शेखर सुमन ने अपनी मां के 88वें जन्मदिन पर पार्टी आयोजित की। शत्रुघ्न सिन्हा को भी आमंत्रित किया और वे पहुंचे भी। तब शत्रुघ्न सिन्हा के  गले लगकर शेखर सुमन ने कहा था कि मुझसे बड़ी भूल हुई, जो आपके खिलाफ चुनाव मैदान में उतरा। यह पहली और आखिरी गलती थी। भविष्य में ऐसा नहीं होगा।
शत्रुघ्न सिन्हा ने भाई जैसे मित्र को गले लगाया और कहा कि जो हुआ उसे भूल जाओ। शेखर ने वादा किया था कि वे भविष्य में शत्रुघ्न के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ेंगे और उसे निभाया भी। 2014 में एक बार फिर कांग्रेस ने चुनाव लडऩे का ऑफर किया, लेकिन शेखर सुमन ने ऑफर ठुकरा दिया।

राजेश खन्ना को हुआ था मलाल

बात करीब 28-29 साल पुरानी है। 1991 में भारतीय जनता पार्टी ने नई दिल्ली सीट पर लालकृष्ण आडवाणी को अपना उम्मीदवार बनाया था। कांग्रेस ने इस सीट के लिए फिल्म स्टार राजेश खन्ना को आडवाणी के सामने मैदान में उतारा। राजेश खन्ना चुनाव हार गए। तब आडवाणी गांधीनगर से भी चुनाव जीते थे। वे नई दिल्ली की सीट छोड़कर गांधीनगर पर कायम रहे।

नई दिल्ली सीट पर उप चुनाव हुआ। भाजपा ने शत्रुघ्न सिन्हा को प्रत्याशी बनाया। कांग्रेस ने एक बार फिर राजेश खन्ना को मैदान में उतारा। शत्रुघ्न सिन्हा चुनाव हार गए। जीत के बाद भी राजेश खन्ना को यह मलाल रह गया कि शत्रुघ्न सिन्हा जैसा उनका मित्र उनके मुकाबले मैदान में उतर आया।

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शत्रुघ्न के मन में भी चुभ रही थी फांस
राजेश खन्ना की तरह ही शत्रुघ्न सिन्हा के मन में भी यह फांस चुभ रही थी। उन्हें लग रहा था कि इसके लिए राजेश खन्ना से मिलकर खेद प्रकट करना चाहिए। नियति को यह मंजूर नहीं था। शत्रुघ्न सिन्हा के मन में जब यह विचार आया तब राजेश खन्ना बीमार होकर अस्पताल में भर्ती थे। शत्रुघ्न सिन्हा ने सोचा कि स्वस्थ होने पर राजेश खन्ना से मिलकर खेद प्रकट किया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राजेश खन्ना लंबे समय तक बीमार रहे और अस्पताल से घर नहीं लौट पाए।

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Posted By: Amit Alok

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