बोकारो, बीके पाण्डेय। नोटबंदी की असली मार तो अब पड़ी है। चुनाव के मौसम में खुलनेवाली मौसमी वोट की दुकान का शटर तक नहीं उठ पा रहा है। लोग 2014 से इसी मौसम के इंतजार में बैठे थे कि कुछ राष्ट्रीय, कुछ राज्य तथा कुछ फ्री लांसर ग्राहक वोट के खरीदार के रूप में प्रकट होंगे, लेकिन राष्ट्रीय ग्राहकों के गठबंधन ने पूरा धंधा चौपट कर दिया है।
वोट व्यवसायियों की दुकान पर मानों ताला लग गया है। बाजार में  वोट के खरीदार नहीं मिल रहे। प्रत्येक चौक-चौराहे पर दर्जन भर जवान माला पहनने के लिए पूरा दिन बिता दे रहा है। शाम तक भी पान बहार तक का भी इंतजाम मुश्किल से हो पा रहा है। नयामोड़ में पहलवान की दुकान पर चाय हाथ में लेकर लोग भगवान बिरसा को देखकर लोग कह रहे हैं, हे भगवान बिरसा, क्या इसी दिन के लिए झारखंड बनाया था कि चुनाव में भी बेरोजगारी  झेलना पड़े।
गठबंधन की खुल गई है गांठ : नोटबंदी से प्रभावित नगर के  तीर-धनुष वाले मन को मनाने के लिए  पश्चिम दिशा की ओर पलायान कर रहे हैं। न तो उनका कुर्ता-पायजामा आयरन हो रहा है और न ही मुंह में पान की लाली दिख रही है। एक-एक सप्ताह ऐसे ही बीत जा रहा है। पहले के चुनाव में कोई चाय के लिए बोलता था तो रसमलाई तक खिला देते थे। इसी प्रकार लालटेन वाले कह रहे हैं कि आदमी नहीं है तो अंजोर किसके लिए करेंगे। रह गए कंघी वाले प्रोफेसर साहब तो बेचारे को अभी तक साइड नहीं मिला है कि कहां से कहां तक का वोट कंघी से सीधा करेंगे। बेचारे इज्जत बचाने के लिए बिहार बार्डर पर अपने बॉस के लिए काम कर रहे हैं। बड़का घर की दोनों बहुरिया को  समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करें।  जहां देखिए नोटबंदी की मार ने सबको बेजार कर दिया है। 
विरोधी कस रहे तंज :  केसरिया वाले विरोधी दल के एक नेता ने चाय की दुकान पर हाथवाले पर तंज कसते हुए कहा कि बहुत बोल रहे थे, कि पूरा गुलाबी बक्सा दिल्ली से आदमी लेकर आ रहा है। सबको लाले-लाल कर देगा। आप लोग तो सीधे सूख गए हैं। विरोधी का तंज सीधे सीने पर लगा तो नेताजी अपने को रोक नहीं सके, कहने लगे भाई का बताएं, लाल के आशा में थे यहां तो हरा पत्ता भी नहीं दिख रहा है। लेन-देन क्या होगा  कुछ जमा पूंजी भी खर्चा करा दे रहे हैं। दो-चार दिन देखते हैं, नहीं तो किसी वोटकटवा के साथ सटना पड़ेगा। असली नोटबंदी तो अब जाकर महसूस हुआ है।

Posted By: mritunjay

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