लखनऊ [अजय जायसवाल]। लोकसभा चुनाव 2019 में नरेंद्र मोदी लहर के चलते सूबे में सपा-बसपा और रालोद गठबंधन भी कोई कमाल नहीं दिखा सका। इस बार मोदी लहर 2014 के मुकाबले में काफी तेज रही।

उत्तर प्रदेश में गठबंधन से सबसे ज्यादा फायदे में जहां बसपा रही है वहीं सपा और रालोद को झटका लगा है। शून्य से खाता खोलते हुए बसपा 10 सीटों पर पहुंच गई जबकि सपा पांच सीटों पर ही सिमट कर रह गई है। सपा-बसपा का साथ मिलने के बावजूद रालोद का एक बार फिर खाता तक नहीं खुल सका है।

वर्षों तक एक-दूसरे की कट्टर विरोधी रही सपा-बसपा, अपना-अपना वजूद बचाए रखने के लिए अबकी गठबंधन कर चुनाव मैदान में उतरी थी। पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों को देखते हुए गठबंधन का गणित काफी मजबूत भी दिख रहा था। दोनों पार्टियों के नेताओं के दावे के साथ ही राजनीति के जानकारों का मानना था कि सपा-बसपा गठबंधन भाजपा को चित करने में सक्षम रहेगा लेकिन मोदी की आंधी ने अबकी गठबंधन को भी धाराशायी कर दिया है। लोकसभा की 80 सीटों में से गठबंधन के तहत 38 पर लडऩे वाली बसपा जहां सिर्फ 10 सीटें जीतने में कामयाब रही वहीं सपा 37 सीट में से सिर्फ पांच पर ही जीती है। तीन सीट पर लडऩे वाली रालोद का एक बार फिर खाता तक नहीं खुल सका। गठबंधन ने अमेठी और रायबरेली सीट को कांग्रेस के लिए छोड़ा था लेकिन कांगे्रस, अमेठी सीट को नहीं बचा सकी।

दरअसल, 80 लोकसभा सीटों वाले सूबे में सपा, बसपा और रालोद की अलग-अलग क्षेत्र और जातियों पर मजबूत पकड़ रही है। खासतौर से दलित वोट बैैंक जहां बसपा के साथ रहा है वहीं सपा से पिछड़ी जातियों में खासतौर से यादव जुड़ा रहा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट बिरादरी पर राष्ट्रीय लोकदल की पकड़ रही है। तकरीबन 19 फीसद मुस्लिम वोट बैैंक का रुख तो समय-समय पर इन पार्टियों में उसकी ओर रहा है जो भाजपा को हराने की स्थिति में रही। पिछले लोकसभा चुनाव में तीनों ही पार्टियां अलग-अलग लड़ी थी जिससे वोटों का बंटवारा होने का सर्वाधिक फायदा भाजपा को मिला था। गौर करने की बात यह है कि वोटों के बंटवारे से पिछले चुनाव में एक भी मुस्लिम प्रत्याशी जीतने में कामयाब नहीं हो सका था। वोटों के बंटवारे और मोदी लहर के चलते 2014 में सहयोगी अपना दल के साथ भाजपा जहां रिकार्ड 73 सीटों पर कब्जा जमाने में कामयाब रही थी वहीं बसपा व रालोद का खाता तक नहीं खुला था। सपा भी मात्र पांच सीट पर सिमट कर रह गई थी। कांगे्रस के हाथ सिर्फ दो सीटेें लगीं थीं।

एक-दूसरे को ट्रांसफर नहीं हुए वोट

अपने-अपने वजूद को लेकर फिक्रमंद सपा-बसपा-रालोद नेताओं को भले ही गठबंधन से बड़ी उम्मीदें थी लेकिन नतीजे बताते हैैं कि मतदाताओं ने इसे पसंद नहीं किया। गठबंधन के 15 सीटों पर सिमटने से साफ है कि धरातल पर तीनों ही पार्टियों के वोट एक-दूसरे को ट्रांसफर नहीं हुए हैैं। पार्टी नेताओं के लाख चाहने के बावजूद दलित, मुस्लिम, जाट और यादव सहित अन्य पिछड़ी जातियों का वोट गठबंधन के साथ रहने के बजाय बंटा जिससे तीनों ही पार्टियों को अपेक्षानुसार सफलता नहीं मिली है। मोदी अपने काम और नाम के दम पर एक बार फिर इन पार्टियों के परम्परागत वोट में गहरी सेेंध लगाने में कामयाब रहे हैैं। कुछ सीटों पर जरूर कांगे्रस, प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) व अन्य छोटे दलों ने भी गठबंधन को नुकसान पहुंचाया है।

चार फीसदी खिसका गठबंधन का वोट

चुनाव परिणाम से साफ है कि गठबंधन में शामिल सपा और बसपा का वोट पिछली बार से चार फीसद खिसक गया है। 2014 के चुनाव में अलग-अलग लड़ी सपा-बसपा और रालोद का कुल वोट बैैंक 42.98 फीसद था जबकि देर रात तक घोषित नतीजे के अनुसार अबकी गठबंधन का कुल वोट 38.93 फीसद ही रह गया है। इसमें सपा का सर्वाधिक 4.39 फीसद वोट खिसका है जबकि बसपा का 0.47 फीसद घटा है। रालोद सीट जीतने में तो कामयाब नहीं रही है लेकिन उसके वोट में 0.81 फीसद का इजाफा हुआ है।

यूं भाजपा पर भारी दिख रहा था गठबंधन का गणित

पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजे से तो यही लग रहा था कि गठबंधन का गणित, भाजपा पर भारी पड़ेगा। पिछले चुनाव में जहां भाजपा और सहयोगी दल को सूबे में 42.65 फीसद वोट मिले थे वहीं बसपा को 19.77 और सपा को 22.35 फीसद वोट मिले थे जो कि 42.12 फीसद होता है। 0.86 फीसद वोट हासिल करने वाले रालोद के शामिल होने पर गठबंधन, भाजपा पर भारी नजर आ रहा था।

सपा की सीटें

आजमगढ़, मैनपुरी, मुरादाबाद, रामपुर, संभल।

बसपा की सीटें

अंबेडकरनगर, अमरोहा, गाजीपुर, घोसी, जौनपुर, लालगंज, नगीना, सहारनपुर, बिजनौर, श्रावस्ती। 

लोकसभा चुनाव और क्रिकेट से संबंधित अपडेट पाने के लिए डाउनलोड करें जागरण एप

Posted By: Dharmendra Pandey

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप