लखनऊ, जेएनएन। चुनावी गठबंधन की सियासत में राष्ट्रीय लोकदल अध्यक्ष अजित सिंह एक बार फिर गच्चा खा गए। दलित-मुस्लिम वोटों के गणित को देखकर सपा-बसपा से गठबंधन करने के बावजूद सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव मेें पार्टी का खाता खोलने की उनकी मंशा पूरी न हो सकी। गठबंधन के खेल में रालोद के लिए भाजपा से मिलकर चुनाव लड़ना ही फायदे का सौदा रहा है। सपा-बसपा गठबंधन में रालोद अपना वोट बैंक सहयोगी दलों को ट्रांसफर कराने में कामयाब नहीं हो सका।

लोकसभा के पिछले दो और वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव के नतीजों से साफ हो गया कि चौधरी चरण सिंह की विरासत संभालने वाले अजित सिंह जाटों के सर्वमान्य नेता नहीं रह गए हैं। जाट बहुल क्षेत्रों में भी भाजपा का दबदबा कायम रहा। अजित व उनके पुत्र जयंत चौधरी की सीटों के साथ जाट बहुल तीसरी सीट मथुरा भी रालोद नहीं जीत सका।

अमूमन प्रत्येक चुनाव में गठबंधन के नए प्रयोग करने वाले रालोद के रिकार्ड पर गौर करें तो वर्ष 2009 में भाजपा से गठबंधन में लोकसभा चुनाव लडऩे पर रालोद के पांच सांसद विजयी हुए थे। तब सीटों के बंटवारे में रालोद के कोटे में सात सीटें आयीं और यह अब तक का उसका सबसे बेहतर प्रर्दशन रहा। वर्ष 2002 में भाजपा से गठबंधन कर विधानसभा चुनाव लड़ना भी रालोद के लाभदायक रहा। तब रालोद के कुल 14 विधायक जीते थे। वर्ष 2012 में कांग्रेस के साथ मिलकर रालोद ने विधानसभा चुनाव लड़ा और नौ सीटों पर सिमट गया। वर्ष 2014 से अजित सिंह के बुरे दिन आरंभ हुए। कांग्रेस से गठबंधन के बावजूद रालोद का लोकसभा चुनाव में खाता न खुल सका। वर्ष 2017 में भी कांग्रेस से मिलकर लड़ने के बाद भी एक विधानसभा सीट छपरौली ही जीत पाए और वह विधायक भी भाजपा में चला गया।

सपा-बसपा गठबंधन प्रयोग भी फेल

इस लोकसभा चुनाव में जीतने के लिए रालोद ने सपा-बसपा से गठबंधन पर दांव लगाया। गठबंधन में शामिल होने के लिए रालोद को उनकी शर्तों पर समझौता करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। रालोद के खाते में जाटों के दबदबे वाली बागपत, मुजफ्फरनगर और मथुरा सीटें आईं, लेकिन तीनों पर गठबंधन को पराजय का सामना करना पड़ा। रालोद को सीट जीतने में कामयाब नहीं मिली अलबत्ता वोटों में 0.81 फीसद की वृद्धि हुई।

रालोद को सपा-बसपा के वोटों का लाभ मिला लेकिन अपना वोटबैंक ट्रांसफर न करा सका। इसी कारण आगरा, फतेहपुर सीकरी, मेरठ, अलीगढ़, बुलंदशहर, हाथरस, कैराना और गाजियाबाद जैसी सीटों पर भाजपा ही भारी रही। जानकारों का कहना है कि रालोद के लिए आगामी विधान सभा चुनाव में भी राह आसान नहीं होगी क्योंकि पश्चिम उप्र में धुव्रीकरण दिनोंदिन गाढ़ा हो रहा है।

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Posted By: Umesh Tiwari

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