सोमनाथ, नीलू रंजन। गुजरात में मतदान के केवल दो दिन बचे हैं। लेकिन चुनावी गर्मी का कहीं नामोनिशान नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की रैलियों में भी लोग जुट जाते हैं , लेकिन जमीन पर चुनावी पारा चढ़ने का नाम नहीं ले रहा है। खासकर सौराष्ट्र के इलाके में, जहां सिर्फ डेढ़ साल पहले विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा और कांग्रेस के बीच भीषण भिड़ंत हुई थी, वहां मतदाताओं की चुप्पी चौंकानेवाली है। यहां 23 अप्रैल को राज्य की सभी लोकसभा सीटों के लिए मतदान होगा।

जामनगर के आगे हाईवे के किनारे शाम को कुछ बुजुर्ग बैठे है। पास ही कुछ नौजवान भी कुर्सियों पर बैठ बातचीत में मशगूल हैं। चुनाव में वोट किसको देंगे के बारे पूछने पर एक बुजुर्ग कहते हैं कि अभी तक कोई आया नहीं है। आसपास बैठे नौजवानों ने भी सवाल को अनसुना कर दिया। ज्यादा कुरेदने पर यह कहते हुए चर्चा को यह कहते हुए खत्म कर दिया कि पंचायत में तय करेंगे कि किसको वोट देना है। राहुल गांधी और कांग्रेस भले ही लगातार हर रैली में 72 हजार रुपये सालाना की न्यूनतम आय और 22 लाख नौकरियां देने की बात कर रहे हों, लेकिन युवाओं ने इसे भी चर्चा के लायक नहीं समझा। यही स्थिति अहमदाबाद से लेकर सुरेन्द्रनगर, राजकोट, जामनगर, द्वारिका, पोरबंदर से लेकर सोमनाथ तक देखने को मिली।

ठंडे माहौल को समझने के दो सीन काफी हैं। पांच दिन पहले मुख्यमंत्री विजय रूपाणी विसावदर में रैली करने पहुंचे, लेकिन कुर्सियां खाली थीं। जाहिर है उन्हें उलटे पैर लौटना पड़ा। दूसरी तरफ राहुल की महुआ रैली से भी भीड़ नदारद थी। वैसे, ये दोनों किस्से ग्रामीण क्षेत्रों के हैं, जहां अमूमन चुनावी माहौल में भीड़ जुट ही जाती है। शहरों की हालत भी ऐसी ही है। हालात यह है कि उम्मीदवारों की जनसंपर्क सभाओं में भी लोग नहीं आ रहे हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ मिली बढ़त के बाद से ही गुजरात और खासकर सौराष्ट्र को लेकर कांग्रेस के हौसले बुलंद थे।

राहुल गांधी को लगने लगा था कि मोदी के सामने उनके ही घर में चुनौती पेश करना असंभव नहीं है। यही कारण है कांग्रेस चुनाव के ठीक पहले राष्ट्रीय कार्यकारिणी अहमदाबाद में कर अपना मंसूबा जता दिया था। जिसमें राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और सोनिया गांधी समेत कांग्रेस के तमाम दिग्गज नेता मौजूद थे। 12 मार्च को कार्यकारिणी की बैठक के बाद राहुल गांधी ने अहमदाबाद में रोडशो भी किया था। लेकिन उस समय कांग्रेसी नेताओं को अंदाजा नहीं था कि चुनाव के वक्त जनता इस कदर चुप्पी साध लेगी। विधानसभा चुनाव में सौराष्ट्र में लंबी छलांग लगाने वाली कांग्रेस के लिए यह चिंता की बात है। कुल 47 विधानसभा सीटों वाले सौराष्ट्र में कांग्रेस ने 28 सीटें जीती थी, जो 2012 के मुकाबले 16 ज्यादा है। वही भाजपा की सीटें सिमटकर 30 से 19 रह गई थी। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जिन मुद्दों को गरम किया था वह सब लोकसभा चुनाव में गायब हैं।

चुनाव में मुद्दों का अभाव कांग्रेस की तुलना में भाजपा के लिए ज्यादा बड़ा सिरदर्द है। 2014 में मोदी लहर पर सवार भाजपा ने गुजरात की सभी 26 सीटों पर कब्जा कर लिया था। उसके सामने इसे दोहराने की चुनौती है। जबकि कई स्थानों पर भाजपा के पुराने उम्मीदवारों के प्रति व्यक्तिगत नाराजगी साफ देखी जा सकती है। नाराजगी का यही भाव राज्य की रूपानी सरकार के खिलाफ भी है। भाजपा के लिए सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति लोगों और खासकर युवाओं का आकर्षण अब भी बरकरार है। जूनागढ़ लोकसभा के अंतर्गत आने वाले गांगड़ा गांव में होटल भागीरथ में बैठे 22 वर्षीय कनिक्ष गोहिल सीधे मोदी को वोट देने की बात करते हैं। कारण पूछने पर कहते हैं कि बस मोदी अच्छे लगते हैं और उनके जैसा कोई नेता नहीं है। मोदी के अलावा हिन्दुत्व का भी मुद्दा कहीं न कहीं काम करता दिख रहा है। 

Posted By: Dhyanendra Singh

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