नई दिल्ली, जेएनएन। Lok Sabha Election 2019 Result भाजपा के 'मोदी है तो मुमकिन' नारे की आंधी में कांग्रेस का 'चौकीदार चोर है' का नारा उड़ गया। लोकसभा चुनावों के दौरान विपक्ष ने समय-समय पर अलग-अलग नारे गढ़ने की कोशिश की। लेकिन भाजपा का 'हम सब चौकीदार' का सकारात्मक नारा विपक्ष के तमाम नकारात्मक नारों पर भारी पड़ा। भाजपा ने शुरू से ही अपने चुनावी अभियान को विकास और राष्ट्रवाद पर केंद्रित रखा और इसी हिसाब से उसके रणनीतिकारों ने नारों की रचना की।

जनता की भावनाओं को समझे बगैर विपक्ष ने गढ़े थे नारे
भाजपा 'हम सब चौकीदार', 'मोदी है तो मुमकिन है' और 'काम रुके ना, देश झुके ना' जैसे प्रमुख नारों के साथ जनता के बीच में थी। जहां 'हम सब चौकीदार' का नारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक था। वहीं 'मोदी है तो मुमकिन है' के पीछे राष्ट्रवाद की प्रेरणा थी। परंतु विकास और राष्ट्रवाद दोनों के मेल से 'काम रुके ना, देश झुके ना' की रचना की गई थी। जनता को ये सभी नारे पसंद आए और उसने इन्हें मोदी के 'मन की बात' समझ कर हृदय से अंगीकार किया। इसके विपरीत विपक्ष के नारे जनता की भावनाओं को समझे बगैर गढ़े गए।

जनता को नागवार गुजरा 'चौकीदार चोर है' का नारा
'चौकीदार चोर है' का कांग्रेस का नारा जनता को एकदम नागवार गुजरा। लोगों ने इसे प्रधानमंत्री की स्वच्छ छवि के खिलाफ भोंडा आक्रमण मानते हुए सिरे से खारिज कर दिया। और इसके जवाब के रूप में 'आएगा तो मोदी ही' तथा 'फिर एक बार, मोदी सरकार' के नारों को अंगीकार किया। न्यूनतम आय योजना के जरिए हर परिवार को सालाना 72 हजार रुपये देने के वादे पर आधारित कांग्रेस का 'अब होगा न्याय' का नारा भी जनता का विश्वास जीतने में नाकाम रहा।

प्रतिक्रियावादी नारे कांग्रेस पर पड़े भारी
भाजपा के मुकाबले कांग्रेस ने अपनी प्रचार सामग्री तैयार करने में देरी की। उसके नारे भाजपा के नारों के जवाब में आए जिनमें भविष्य के प्रति दृष्टि का अभाव था। पार्टी के प्रचार प्रकोष्ठ ने कुछ सकारात्मक और भविष्योन्मुखी नारे तैयार किए थे। जैसे कि 'बेहतर भारत, बेहतर कल', 'पक्का वादा, नेक इरादा'। लेकिन आलाकमान ने उनके बजाय 'चौकीदार चोर है' जैसे नकारात्मक और प्रतिक्रियावादी नारे को प्रमुखता दी। इसके मुकाबले भाजपा ने अपने नारों को मोदी और उनकी टीम को एक और मौका देकर बेहतर परिणाम पाने की संभावनाओं पर केंद्रित किया।

भविष्य की उम्मीदों पर केंद्रित रहा भाजपा का प्रचार
पिछले लोकसभा चुनावों में भाजपा के 'कांग्रेस मुक्त भारत' के नारे को लोगों का समर्थन मिला था। परिणामस्वरूप दस साल तक सत्ता पर काबिज रही कांग्रेस को लोकसभा में प्रमुख विपक्षी दल का ओहदा पाने के लाले पड़ गये। लेकिन सरकार में आने के बाद भाजपा ने अपने प्रचार की रणनीति में बदलाव करते हुए उसे विपक्ष के बजाय प्रधानमंत्री मोदी के व्यक्तित्व, उनकी सरकार की उपलब्धियों तथा भविष्य की उम्मीदों पर केंद्रित करने की सूझबूझ दिखाई।

अलग-अलग राज्यों में भाजपा के अलग अलग नारे
अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग प्रतिद्वंद्वियों के मद्देनजर अपने नारों को भी नया रंग देने की भाजपा की रणनीति कारगर साबित हुई। मसलन, पश्चिम बंगाल में मोदी का 'चुपचाप, कमल छाप' का नारा लोगों को भा गया। भाजपा कार्यकर्ताओं ने जब कोलकाता में 'जय श्रीराम' के नारे लगाए तो ममता ने कहा कि उनकी पार्टी का नारा 'जय श्रीराम' नहीं, वरन 'जय हिंद' और 'वंदे मातरम्' है। जनता को उनकी ये बात नहीं जमी। क्योंकि भाजपा स्वयं 'वंदे मातरम्' की समर्थक है और 'जय हिंद' का उसने कभी विरोध नहीं किया।

सपा-बसपा के नारों का घालमेल नहीं आया काम
उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के बीच गठबंधन के बाद 'बुआ-बबुआ' की जोड़ी खूब चर्चा में रही। नतीजतन, दोनो पार्टियों के नारों का भी आपस में घालमेल हो गया। बसपा प्रमुख मायावती ने अपनी चुनावी रैलियों में पार्टी के 'जय भीम, जय भारत' नारे के साथ 'जय लोहिया' को भी जोड़ कर 'जय भीम, जय भारत, जय लोहिया' का नया नारा देने की कोशिश की। लेकिन उनके अस्वाभाविक गठजोड़ की तरह उनके इस नारे को भी जनता न हवा में उड़ा दिया। चुनाव के दौरान सपा की ओर से 'हमारे पास गठबंधन है और भाजपा के पास सीबीआइ' तथा 'सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं' जैसे नारों के पोस्टर भी लगवाए गए थे, पर मोदी के तूफान में इनकी चिंदी बिखर गई।

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Posted By: Krishna Bihari Singh