प्रदीप सिंह। जनादेश एक बार फिर कांग्रेस के खिलाफ गया है। देश के 21 राज्यों में उसका सफाया हो गया है। बात साफ है कि राहुल गांधी को कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और नेताओं ने भले ही अध्यक्ष के रूप में स्वीकार कर लिया हो, पर देश के मतदाता उन्हें स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। राहुल गांधी को पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया था कि वे कांग्रेस की समस्याओं का समाधान करेंगे, पर जनादेश कह रहा है कि राहुल गांधी खुद समस्या हैं।

कांग्रेस के सामने आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह पार्टी का क्या करे उससे पहले उसे यह सोचना है कि राहुल गांधी का क्या करे। इसमें कोई संदेह नहीं रह गया है कि जिसे बाड़ समझ रहे थे वही खेत खा रही है। इस लोकसभा चुनाव में जो जनादेश आया है वह केवल राहुल गांधी के लिए ही खतरे की घंटी नहीं है, बल्कि देश के सारे वंशवादियों के लिए संदेश है। देश ने आजादी के बाद से तीन बार वंशवाद का तिरस्कार किया।

पहली बार राजघरानों का भारतीय संघ में विलय करके। दूसरी बार गणतंत्र बनकर इंग्लैंड की महारानी से संबंध तोड़कर और तीसरी बार जमींदारी उन्मूलन करके। इसके बाद जवाहर लाल नेहरू के 17 साल के शासन ने देश को विरासत में लोकतांत्रिक वंशवाद का उपहार दिया। गांधी-नेहरू परिवार के बाहर का जो भी कांग्रेसी नेता प्रधानमंत्री बना वह हमेशा इस परिवार से परेशान रहा या उसे कृपा पर रहना पड़ा। लाल बहादुर शास्त्री, पीवी नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की यही कहानी है।

कांग्रेस में और उसके बाहर जो भी कांग्रेस समर्थक हैं वे प्रियंका गांधी को राहुल गांधी के विकल्प के रूप में देखते हैं, पर सवाल फिर वही है कि क्या कांग्रेस राहुल गांधी की ही तरह अब प्रियंका गांधी को पंद्रह साल तक आजमाने का जोखिम लेगी? प्रियंका गांधी महिला हैं। अच्छी वक्ता हैं। पंचायती राज के कारण देश में महिलाओं में राजनीतिक जागरूकता बढ़ी है। पहली बार मतदान में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुष मतदाताओं के बराबर आ गई है। तो क्या केवल महिला होने के कारण लोग एक वंशवादी को स्वीकार कर लेंगे।

प्रियंका के राहुल गांधी का विकल्प बनने से पहले कांग्रेस को एक और समस्या से जूझना पड़ेगा। उसे राहुल गांधी को पार्टी से हटाना पड़ेगा। यह संदेश देना पड़ेगा कि अब प्रियंका गांधी के हाथों में नेतृत्व है। क्या ऐसा हो पाएगा? उससे भी पहले यह सवाल है कि क्या सोनिया गांधी ऐसा होने देंगी। ये सारी बाधाएं पार हो भी जाएं तो प्रियंका गांधी अपने पति राबर्ट वाड्रा का क्या करेंगी। राबर्ट वाड्रा के कारनामे उन्हें जेल से कब तक बाहर रख पाएंगे कहना कठिन है।

कांग्रेस की समस्या के बारे में प्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी ने 1977 में लिखा था कि ‘तीस साल का इतिहास साक्षी है कांग्रेस ने हमेशा संतुलन की राजनीति को बनाए रखा। जो कहा वह किया नहीं, जो किया वह बताया नहीं, जो बताया वह था नहीं, जो था वह गलत था। र्अंहसा की नीति पर विश्वास किया और उस नीति को संतुलित किया लाठी और गोली से। सत्य की नीति पर चली, पर सच बोलने वाले से सदा नाराज रही।’ करीब 42 साल बाद भी कांग्रेस का यह मर्ज कम होने के बजाय बढ़ा ही है।

1978 में कांग्रेस के विभाजन के बाद इंदिरा गांधी ने इस पार्टी को अपना जेबी संगठन बना लिया। धीरे-धीरे हालत यह हो गई कि राज्यों में जो भी जनाधार वाला नेता था उसे हाशिये पर धकेल दिया। पार्टी में चापलूसों का बोलबाला हो गया। पार्टी या सरकार में कुछ पाने के लिए सबसे बड़ी योग्यता वफादारी हो गई। पर यह सब अतीत की बात है। वर्तमान राहुल गांधी से राजनीतिक कुर्बानी मांग रहा है।

मतदाता ने कांग्रेस को साफ संदेश दिया है कि उसे राहुल गांधी के नेतृतव पर भरोसा नहीं है। कांग्रेस की एक और समस्या है। पार्टी में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो मानते हैं कि नेहरू-गांधी परिवार के बिना कांग्रेस एक रह ही नहीं सकती। कांग्रेस को यदि प्रासंगिक रहना है और भाजपा का विकल्प बनना है तो उसे पुनर्जन्म लेना पड़ेगा, पुनर्नवा होना पड़ेगा। जो लोग कांग्रेस में अपना भविष्य देखते हैं उन्हें इस परिवार से कहना पड़ेगा कि आपके परिवार का देश के लिए बहुत योगदान है। देश ने भी आपके परिवार को बहुत कुछ दिया है। अब हमें मुक्ति दीजिए। अपना रास्ता खुद बनाने दीजिए। हिंदू धर्म में पुनर्जन्म की अवधारणा है।

इस लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक और महाराष्ट्र (एनसीपी) जैसे राज्यों और राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का वंशवाद उतार पर है। वहीं दूसरी ओर तमिलनाडु, महाराष्ट्र (शिवसेना), तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में नई वंशवादी राजनीति अंगड़ाई ले रही है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 1999 में लोकसभा में विश्वास मत के दौरान कही गई बात को कांग्रेस ने गंभीरता से नहीं लिया। वाजपेयी ने कहा था ‘आज हमारी सरकार मात्र एक वोट से गिर गई है। हमारे कम सदस्य होने पर कांग्रेस हम पर हंस रही है, लेकिन कांग्रेस ये बात कतई न भूले कि एक दिन ऐसा आएगा जब पूरे देश में हमारी सरकार होगी और पूरा देश कांग्रेस पर हंस रहा होगा।’ इससे पहले 1996 में भी अपनी 13 दिन की सरकार के विश्वास की बहस के भाषण में उन्होंने पूरे सदन को आगाह किया था कि इस देश का हिंदू अपने को कमतर महसूस कर रहा है। यह चिंता की बात है, पर 2004 में सत्ता में वापसी के बाद कांग्रेस ने ये बातें याद रखने की जरूरत नहीं समझी।

आज कांग्रेस जहां खड़ी है वहां से आगे का रास्ता उसे खुद ही तय करना है। उसे सोचना पड़ेगा कि आखिर पार्टी और नेतृत्व ने ऐसा क्या किया कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, महाराष्ट्र में शरद पवार जैसे नेता पार्टी से बाहर निकले और उसके लिए ही चुनौती बन गए। ऐसा क्या हुआ कि जिन तीन राज्यों में पांच महीने पहले उसकी सरकारें बनीं वहां मोदी की प्रचंड लहर चल रही है। उसे यह भी तय करना है कि आगे रास्ता नेहरू-गांधी परिवार के साथ बेहतर और सुगम नजर आता है कि उसके बिना।

इस कठिन और अप्रिय फैसले के बाद ही आगे की रणनीति तय हो पाएगी। राहुल गांधी और पूरी कांग्रेस पार्टी 2014 की शर्मनाक हार के बाद भी हवा के घोड़े से नहीं उतरे। राहुल गांधी को उनके एक सलाहकार ने राय दी कि मोदी को आक्रामक तरीके से गाली दीजिए, लोग पसंद करेंगे। इसी के प्रभाव में उन्होंने चौकीदार चोर है का नारा लगवाया। राफेल का फर्जी मुद्दा उठाया। उनका सामंतवादी दंभ ही उन्हें ले डूबा। कांग्रेस जितनी जल्दी इस बात को समझ ले और मान ले उतना ही अच्छा है कि राहुल गांधी उसका भविष्य नहीं हैं। 

(राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ स्तंभकार)

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Posted By: Dhyanendra Singh

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