मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

एसवाई कुरैशी। अप्रैल 2018 में आरटीआइ के माध्यम से पता चला कि चुनाव आयोग ने आयकर अधिनियम, आरबीआइ अधिनियम, जनप्रतिनिधित्व कानून (आरपीए) और कंपनी अधिनियम में किए गए संशोधनों पर सवाल उठाते हुए इलेक्टोरल बांड्स की पूरी योजना को पीछे ले जाने वाला कदम बताया है।

2017-18 में चुनावी चंदे के लिए लगभग 222 करोड़ रुपये के बांड खरीदे गए। सत्तारूढ़ दल को कुल बांड का 95 फीसद प्राप्त हुआ। उनके कुल दान का 91.6 फीसद कारपोरेट घराने से आया। यह भी पता चला है कि कुल बांड का 99.9 फीसद बांड 10 लाख रुपये और उससे अधिक मूल्य वाले खरीदे गए। इसका मतलब यह है कि इतनी अधिक राशि के बांड आम आदमी की जगह कारपोरेट घराने खरीद रहे हैं।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स की 2017 की रिपोर्ट बताती है कि पिछले दशक में कुल दान का 69 फीसद गुमनाम हुआ करता था। इनमें संदिग्ध स्नोत शामिल थे, संभवत: विदेशी धन भी शामिल होगा। इसलिए पिछली प्रणाली में तत्काल सुधार की जरूरत थी, लेकिन सुधार के रूप में लायी गयी इलेक्टोरल बांड योजना आगे की सोच नहीं है। लोकतंत्र के लिए यह बहुत खतरनाक भी है।

वित्त मंत्री द्वारा अपने बजट भाषण में इस स्कीम की घोषणा करने के बाद से ही इसे लोकप्रिय सुधार नहीं माना जा रहा है। यह चुनाव आयोग नामक संस्था को भी कमजोर करता है। जुलाई, 2017 में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तनसीम जैदी ने जैसाकि कहा है, ‘हम यहां जनता के लिए काम करने को बैठे हैं, लेकिन इस कामकाज में समझौता करना पड़ रहा है, भले ही लोगों के सूचना का अधिकार सर्वोच्च हो या न हो।’ नवंबर, 2018 में सेवानिवृत्त हो रहे मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने भी चिंता जताते हुए कहा कि बांड योजना के बारे में हमारी चिंताओं का संज्ञान नहीं लिया गया।

मेरा मानना है कि कोई भी सुधार अच्छा सुधार होता है, लेकिन इस मामले में मैं अपनी राय बदलने को मजबूर हूं। जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 29 (ए) में संशोधन के बाद कंपनियों द्वारा करोड़ों रुपये का भुगतान अब मुक्त रूप से किया जा सकता है। अब इसे चुनाव आयोग के समक्ष भी उन्हें घोषित करने की जहमत नहीं उठानी है। क्या इससे लोकतंत्र का मखौल नहीं बन रहा है? यह सही है कि कोई भी कारपोरेट सत्ताधारी दल को चंदा देने से परहेज नहीं करना चाहेगी, वे सभी को समान रूप से चंदा देने का ढोंग कर सकते हैं। अब चूंकि यह दिखावा खत्म हो गया है और दानदाता की पहचान सुरक्षित है तभी सत्ताधारी दल को कुल में से 95 फीसद चंदा मिलता है।

अप्रैल, 2017 में एक मीडिया जांच में बांड पर छिपे अल्फान्यूमेरिक नंबर का पता चला। चूंकि दानदाता को बांड खरीदने के लिए अपना केवाईसी देना होता है, लिहाजा दोनों का मिलान करके दानदाता की पहचान पार्टियां कर सकती है आम लोग नहीं। मतदाताओं से इलेक्टोरल बांड पर लिखे नंबर छिपाए क्यों जा रहे हैं? क्या फोरेंसिक लैब में इसके परीक्षण की दरकार नहीं है?

दानदाताओं द्वारा राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले दान पर लगी अधिकतम सीमा को भी हटा दिया गया है, जो कि तीन साल के औसत मुनाफे का 7.5 फीसद हुआ करती थी। अब मुनाफे का 100 फीसद किसी भी पार्टी को दान किया जा सकता है। चुनाव आयोग के मुताबिक, यह राजनीतिक दलों को दान देने के एकमात्र उद्देश्य के लिए शेल कंपनियों की संभावना को खोलता है।

विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम, 2010 में संशोधन कर दिया गया है जो पार्टियों को विदेशी फंड की जांच से छूट देता है। 42 वर्षों के पूर्व प्रभाव के साथ अब पार्टियां विदेशी धन प्राप्त करने में सक्षम हैं। इससे पारदर्शिता कैसे बढ़ती है?

 (पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त)

Posted By: Dhyanendra Singh

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