रांची, [जागरण स्‍पेशल]। Jharkhand Lok Sabha Election 2019 - सात चरणों में हो रहा लोकसभा चुनाव छठे पायदान पर आ पहुंचा है। झारखंड की 14 लोकसभा सीटों में से आधे पर बीते दो चरणों में चुनाव हो चुका है। जबकि आधे पर दो चरणों में चुनाव होंगे। छठे चरण की चार लोकसभा सीटों धनबाद, जमशेदपुर, सिंहभूम और गिरिडीह में रविवार, 12 मई को मतदान होगा। 2014 के चुनाव में इन चारों सीटों पर भाजपा ने कब्‍जा जमाया था। हालांकि, इस बार यहां विपक्षी महागठबंधन मुकाबले में है। एनडीए के उम्‍मीदवारों की सीधी लड़ाई महागठबंधन के प्रत्‍याशियों से है।

2019 के लोकसभा चुनाव की बात करें तो भाजपा ने चार में से तीन स्थानों धनबाद, जमशेदपुर और सिंहभूम में पुराने प्रत्याशियों पर ही दांव लगाया है। गिरिडीह सीट गठबंधन के तहत आजसू पार्टी को दी गई है। यहां से झारखंड सरकार के मंत्री चंद्र प्रकाश चौधरी चुनावी मैदान में हैं। कहा जा रहा है कि यह प्रयोग सफल रहा तो इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन का विस्तारित स्वरूप नजर आएगा।

उधर विपक्षी गठबंधन के तहत झारखंड मुक्ति मोर्चा ने जमशेदपुर और गिरिडीह में अपने प्रत्याशी उतारे हैं जबकि कांग्रेस प्रतिष्ठित धनबाद सीट के अलावा सिंहभूम से किस्मत आजमा रही है। धनबाद से क्रिकेटर सह राजनेता कीर्ति झा आजाद के उतरने से यह सीट राष्ट्रीय स्तर पर लोगों की निगाह में है। जबकि सिंहभूम की चर्चा भाजपा प्रदेश अध्‍यक्ष लक्ष्‍मण गिलुवा और झारखंड के पूर्व मुख्‍यमंत्री मधु कोड़ा की पत्‍नी गीता कोड़ा के कारण हो रही है।

धनबाद में कीर्ति के लिए कठिन है पिच
भाजपा से निकलकर कांग्रेस के पक्ष में बल्लेबाजी कर रहे कीर्ति झा आजाद के लिए धनबाद की पिच कठिन है। इसकी कई वजहें हैं। झारखंड में उनकी पार्टी कांग्रेस संगठनात्मक तौर पर सशक्त नहीं है। नेताओं में सिर फुटौव्वल भी इस कदर है कि वे एक-दूसरे को नहीं सुहाते। जबकि भाजपा का ट्रैक रिकॉर्ड बेहतर है। धनबाद संसदीय क्षेत्र में भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में लगभग तीन लाख वोटों के बड़े अंतर से जीत हासिल की थी। इस संसदीय क्षेत्र में एकमात्र निरसा सीट को छोड़ सभी विधानसभा क्षेत्रों पर भाजपा का कब्जा है। धनबाद नगर निगम भी भाजपा के अधीन है। इसके अलावा मोदी फैक्टर भी भाजपा के पक्ष में है। हालांकि कीर्ति झा आजाद ने टिकट मिलने के बाद माहौल बनाने की कोशिश की है। उनके पक्ष में कांग्रेस के स्टार प्रचारक राहुल गांधी ने रोड शो किया। विपक्षी महागठबंधन के कई नेताओं ने भी उनके पक्ष में प्रचार किए। भाजपा ने भी प्रचार वार में कोई कमी नहीं की। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से लेकर मुख्यमंत्री रघुवर दास ने यहां सभाएं की हैं। भाजपा प्रत्याशी पशुपतिनाथ सिंह ने पिछले दो चुनावों में लगातार जीत हासिल की है। उन्होंने कांग्रेस और कम्युनिस्टों के गढ़ को वापस पाने में कामयाबी पाई है। इससे पहले नब्बे के दशक में हुए चार चुनावों में लगातार भाजपा की डॉ. रीता वर्मा ने इस सीट पर कब्जा किया था। असंगठित कोयला मजदूरों की बुरी स्थिति, झरिया में विस्थापन-पुनर्वास का मसला, कोयला कंपनियों में कम होती नौकरी आदि मुद्दे भी चुनाव को प्रभावित कर रहे हैं। कुछ श्रमिक संगठनों ने भी अपनी-अपनी पसंद के लिहाज से राजनीतिक दलों को समर्थन किया है।

गिरिडीह में कुर्मी महारथियों की जंग
गिरिडीह संसदीय सीट में सीधी लड़ाई एनडीए समर्थित आजसू पार्टी और विपक्षी महागठबंधन के झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रत्याशी के बीच है। कुर्मी-कोइरी बहुल इस संसदीय क्षेत्र में आदिवासी, मुस्लिम समेत सामान्य जातियों का भी दबदबा है। हालांकि दोनों दलों ने कुर्मी जाति के प्रत्याशियों पर ही दांव लगाया है। आजसू पार्टी से रामगढ़ के विधायक और राज्य सरकार में मंत्री चंद्रप्रकाश चौधरी को झारखंड मुक्ति मोर्चा के कद्दावर नेता और डुमरी के विधायक जगरनाथ महतो टक्कर दे रहे हैं। इस संसदीय क्षेत्र में झारखंड के अन्य इलाकों की अपेक्षा चुनाव प्रचार ज्यादा ही आक्रामक तरीके से हो रहा है। जगह-जगह दोनों दलों के चुनावी कार्यालय हैं, जहां स्थानीय स्तर पर रणनीति को अंजाम दिया जा रहा है। सबसे ज्यादा उठापटक प्रभावी वोटर समूहों को आकर्षित करने की है। इनका झुकाव प्रत्याशियों के जीत की राह आसान बनाएगा। कई क्षेत्रों में नक्सलियों का भी दबदबा है, जहां वे चुनाव को प्रभावित करने की भरसक कोशिश कर सकते हैं। हालांकि दोनों प्रतिद्वंद्वी पार्टियां यहां भितरघात से भी दो-चार हैं। भाजपा ने अपने सिटिंग एमपी रविंद्र पांडेय का टिकट काट दिया। आरंभ में लगा था कि रविंद्र बगावत करेंगे लेकिन भविष्य में त्याग का फल पाने की चाहत में उन्होंने चुप्पी साध ली है। उधर गिरिडीह सीट से टिकट की दौड़ में पिछड़े झारखंड मुक्ति मोर्चा के मांडू विधायक जयप्रकाश भाई पटेल ने खुलेआम बगावत कर दी है। वे पार्टी से निकाले जा चुके हैं और एनडीए का प्रचार कर रहे हैं। जयप्रकाश के पिता टेकलाल महतो गिरिडीह के सांसद रह चुके हैं। इसी आधार पर उन्होंने टिकट की दावेदारी की थी। यहां शहरी वोटरों की अपेक्षा ग्रामीण इलाकों के वोटरों का झुकाव प्रत्याशी की जीत-हार तय करेगा।

सिंहभूम में मुकाबला गिलुवा-गीता में, दांव पर मोदी-राहुल की प्रतिष्ठा
सिंहभूम संसदीय सीट से भाजपा और कांग्रेस दोनों की प्रतिष्ठा जुड़ी है। इस सीट से भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुवा दूसरी बार चुनाव मैदान में हैं उनका सीधा मुकाबला महागठबंधन की कांग्रेस उम्मीदवार गीता कोड़ा से है। झारखंड की एकमात्र ऐसी संसदीय सीट है जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी दोनों ने हुंकार भरी है। आदिवासी बहुल इस सीट के सियासी समीकरण काफी उलझे हुए हैं। मुद्दों की धुरी जल, जंगल, जमीन पर आकर टिक गई है जो इन्हें साध लेगा दिल्ली तक पहुंच जाएगा। सिंहभूम में प्रचार के अंतिम दिन दोनों ही दलों ने मोटरसाइकिल रैली निकालकर अपना दम दिखाया है। यहां भाजपा की ताकत उसके संगठन की मजबूती है जबकि महागठबंधन की ताकत उनकी एकजुटता। महागठबंधन की ताकत उसकी कमजोरी भी बताई जा रही है, कांग्रेस को सहयोगी दल झामुमो के सभी विधायकों का वैसा सहयोग नहीं मिल रहा है, जैसा आकलन किया गया था।

जमशेदपुर में गुरु-चेला की भिड़ंत
जमशेदपुर संसदीय सीट पर भी मुकाबले की तस्वीर तकरीबन पूरी तरह साफ है। यहां चुनाव मैदान में कुल 23 प्रत्याशी जोर आजमाइश कर रहे हैं लेकिन मुकाबला भाजपा के वर्तमान सांसद विद्युत वरण महतो और झामुमो के चंपई सोरेन के बीच ही है। दोनों पुराने साथी सियासी रण में एक दूसरे के खिलाफ नए पैतरे आजमा रहे हैं। भाजपा ने यहां अपनी पूरी ताकत लगाई है।राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और गृह मंत्री राजनाथ सिंह की जनसभा तो हुई ही है मुख्यमंत्री रघुवर दास का गृह क्षेत्र होने के कारण इस सीट पर उन्होंने भी पूरा समय दिया है। शहरी क्षेत्र में भाजपा की हवा दिखती है तो ग्रामीण क्षेत्रों में तीर धनुष की पकड़ को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। जमशेदपुर में शहरी मतदाताओं की संख्या करीब 7.11 लाख बताई जाती तो ग्रामीण वोटरों की संख्या 8.20 लाख है। यहां मुद्दों को दरकिनार कर राजनीतिक दल क्षेत्रीय और जातिगत समीकरण साध अपनी नैया पार लगाने में जुटे हैं। जमशेदपुर संसदीय क्षेत्र का जातीय गणित किसी एक पक्ष में जाता नहीं दिखाई देता। यहां वोटों की एकजुटता और बिखराव का परिणाम पर असर पड़ेगा। संयोग की बात है कि दोनों प्रतिद्वंद्वी कभी एक ही दल में हुआ करते थे। 

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Posted By: Alok Shahi

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